श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Bhagavad Gita 13.28

मूल श्लोक :

समं सर्वेषु भूतेषु तिष्ठन्तं परमेश्वरम्
विनश्यत्स्वविनश्यन्तं यः पश्यति स पश्यति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जो नष्ट होते हुए सम्पूर्ण प्राणियोंमें परमात्माको नाशरहित और समरूपसे स्थित देखता है? वही वास्तवमें सही देखता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

जिस अधिष्ठान पर क्षेत्र और क्षेत्रज्ञ के परस्पर मिथ्या तादात्म्य की क्रीड़ा और परिणामत दुखपूर्ण संसार की प्रतीति होती है? वह एक परमेश्वर ही है? जो भूतमात्र में समभाव से स्थित है? जैसे समस्त तरंगों में जल होता है।नश्वर भूतों में अनश्वर  केवल सतही दृष्टि से निरीक्षण करने वाले पुरुष को जगत् में निरन्तर परिवर्तन होता दिखाई देगा। वस्तुएं स्वभावत परिवर्तित होती रहती हैं और उनके परस्पर के सम्बन्ध भी। परिवर्तन होना यह वैषयिक और वैचारिक दोनों ही जगतों का स्थायी धर्म है। इस जगत् की तुलना से कहा गया है कि इन सबमें वह परमेश्वर नित्य और अविकारी अधिष्ठान है? जिसके कारण ये सब परिवर्तन जाने जाते हैं।जन्म? वृद्धि? व्याधि? क्षय और मृत्यु ये वे विकार हैं? जो प्रत्येक अनित्य वस्तु को प्राप्त होते हैं। जिसकी उत्पत्ति हुई हो? उसे ही आगे के विकारों से भी गुजरना पड़ेगा। यहाँ परमेश्वर को अविनाशी कहकर उसके पूर्व के विकारों का भी अभाव सूचित किया गया है। यह अविनाशी चैतन्य ही नाश का प्रकाशक और जगत् का आधार है? जैसे रूपान्तरित होने वाले आभूषणों का आधार स्वर्ण है।वह पुरुष जो इस सम और अविनाशी परमेश्वर को समस्त विषम और विनाशी भूतों में पहचानता है? वही पुरुष वास्तव में उसे देखता है जिसे देखना चाहिए। यहाँ देखने से तात्पर्य आत्मानुभव से है।भौतिक जगत् की वस्तुएं इन्द्रियगोचर होती हैं? जब कि भावनाओं और विचारों का ज्ञान क्रमश मन और बुद्धि से होता है। इसी प्रकार आत्मबोध भी आध्यात्मिक ज्ञानचक्षु से होता है? चर्मचक्षु से नहीं। जैसे हमारे नेत्र विचारों को नहीं देख सकते वैसे ही मन और बुद्धि आत्मा को नहीं देख सकते। स्थूल के द्वारा सूक्ष्म का दर्शन नहीं हो सकता। सूक्ष्मतम आत्मा समस्त उपाधियों से अतीत है।जो (इस समतत्त्व को) देखता है? वही (वास्तव में) देखता है  यह कथन वेदान्त की विशेष वाक्यशैली है? जो अत्यन्त प्रभावपूर्ण है। सभी लोग देखते हैं? परन्तु पारमार्थिक सत्य को नहीं। उनके इस विपरीत दर्शन से ही उनके प्रमाणों (ज्ञान के कारणों) में दोष का अस्तित्व सिद्ध होता है। विभ्रम और वस्तु का अन्यथा दर्शन? मिथ्या कल्पनाएं और विक्षेप  ये सब वस्तु के यथार्थ स्वरूप को आच्छादित कर देते हैं। इसलिए? योगेश्वर श्रीकृष्ण विशेष बल देकर कहते हैं कि जो पुरुष इस सम सत्य को देखता है वही वास्तव में देखता है। शेष लोग तो भ्रान्ति में पड़े रहते हैं।अब यथोक्त सम्यक् दर्शन श्रेष्ठ फल को दर्शाकर उसकी स्तुति करते हैं

English Translation By Swami Sivananda

He sees, who sees the Supreme Lord, existing eally in all beings, the unperishing within the perishing.

Transliteration

samaṃ sarveṣu bhūteṣu tiṣṭhantaṃ parameśvaram
vinaśyatsvavinaśyantaṃ yaḥ paśyati sa paśyati

अनुवाद

जो सभी भूतों में समान रूप से स्थित परमेश्वर को, नष्ट होने वाले शरीरों में अविनाशी रूप से स्थित देखता है, वही वास्तव में देखता है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण वास्तविक दृष्टि की परिभाषा देते हैं। भौतिक शरीर नाशवान हैं, परंतु उनके भीतर वास करने वाली परमात्मा की सत्ता अमर और अविनाशी है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझकर सभी प्राणियों में एक ही ईश्वर को समान रूप से देखता है, वही ज्ञानी है और उसी की दृष्टि सत्य है।

Translation

He who sees the Supreme Lord dwelling equally in all beings, the imperishable within the perishable, he truly sees.

Meaning

In this verse, Lord Krishna defines true vision. While physical bodies are subject to destruction, the Supreme Lord dwelling within them is eternal and imperishable. One who perceives this underlying spiritual unity across all diverse and perishable beings possesses the true, spiritual vision.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
समम्समान रूप से
सर्वेषुसभी
भूतेषुजीवों में
तिष्ठन्तम्स्थित
परम-ईश्वरम्परमेश्वर को
विनाश्यत्सुनष्ट होने वालों में
अविनाश्यन्तम्अविनाशी को
यःजो
पश्यतिदेखता है
सःवह
पश्यतिवास्तव में देखता है

Word by word

WordMeaning
samamequally
sarveṣuin all
bhūteṣubeings
tiṣṭhantamdwelling
parama-īśvaramthe Supreme Lord
vinaśyatsuamong the perishable
avinaśyantamthe imperishable
yaḥwho
paśyatisees
saḥhe
paśyatitruly sees