Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
Bhagavad Gita 13.24
मूल श्लोक :
य एवं वेत्ति पुरुषं प्रकृतिं च गुणैःसह।सर्वथा वर्तमानोऽपि न स भूयोऽभिजायते।।13.24।।
Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
।।13.24।।इस प्रकार पुरुषको और गुणोंके सहित प्रकृतिको जो मनुष्य अलगअलग जानता है? वह सब तरहका बर्ताव करता हुआ भी फिर जन्म नहीं लेता।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
।।13.24।। अब तक किये गये विवेचन का सारांश यह है कि पुरुष स्वस्वरूप से नित्यमुक्त होते हुए भी प्रकृति के साथ तादात्म्य के कारण जीव बनकर संसार के दुखों को भोगता है। इसी तादात्म्य के कारण उत्पन्न वासनाओं के अनुरूप विभिन्न योनियों में उसे जन्म लेना पड़ता है।परन्तु? जो साधक साधन सम्पन्न होकर गुरु के उपदेश से प्रकृति? पुरुष उनके परस्पर सम्बन्ध तथा प्रकृति के विविध प्रकार के प्रभाव रखने वाले गुणों को तत्त्वत जान लेता है? वही वास्तव में ज्ञानी पुरुष है? जो सदा के लिए संसार के बन्धनों से मुक्त हो जाता है।किसी वस्तु को पूर्णत जानने के लिए हमें उससे विलग रहना चाहिए। यदि हम स्वयं ही किसी परिस्थिति में उलझे हुए हों? तो हम उसका वस्तुनिष्ठ अध्ययन नहीं कर सकते। अत प्रकृति के विकारों (देहादि) और गुणों (सुखदुखादि) को जानने के लिए हमें उन सबका द्रष्टा बनकर स्थित होना चाहिए? तभी हम सर्वाधिष्ठान परमात्मा का साक्षात्कार कर सकते हैं। इस अनन्तस्वरूप ब्रह्म को अपने आत्मस्वरूप से जानने का अर्थ ही अविद्या को नष्ट करना है। ऐसे पूर्ण ज्ञानी पुरुष का पुन प्रकृति के साथ मिथ्या तादात्म्य होने के लिए कोई कारण ही नहीं रह जाता है। इसलिए यहाँ भगवान् कहते हैं कि? सब प्रकार से रहते हुए भी उसका पुन जन्म नहीं होता है। इसका अभिप्राय यह है कि ज्ञानी पुरुष जगत् में कर्म करता हुआ भी सामान्य मनुष्यों के समान नईनई वासनाओं को उत्पन्न करके उनके बन्धन में नहीं आता है क्योंकि उसका अहंकार सर्वथा नष्ट हो चुका होता है।ब्रह्मवित् ब्रह्म ही बन जाता है और उसके समस्त कर्म नष्ट हो जाते हैं यह सभी उपनिषदों के द्वारा प्रतिपादित सत्य है।अब? आत्मदर्शन के लिए अनेक उपाय बताते हैं
English Translation By Swami Sivananda
13.24 He who thus knows the Spirit and Matter together with the alities, in whatever condition he may be, he is not born again.