श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Bhagavad Gita 13.23

मूल श्लोक :

उपद्रष्टाऽनुमन्ता च भर्ता भोक्ता महेश्वरः
परमात्मेति चाप्युक्तो देहेऽस्मिन्पुरुषः परः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

यह पुरुष प्रकृति(शरीर) के साथ सम्बन्ध रखनेसे उपद्रष्टा? उसके साथ मिलकर सम्मति? अनुमति देनेसे अनुमन्ता? अपनेको उसका भरणपोषण करनेवाला माननेसे भर्ता? उसके सङ्गसे सुखदुःख भोगनेसे भोक्ता? और अपनेको उसका स्वामी माननेसे महेश्वर बन जाता है। परन्तु स्वरूपसे यह पुरुष परमात्मा कहा जाता है। यह देहमें रहता हुआ भी देहसे पर (सम्बन्धरहित) ही है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इस भ्रमित दुखी क्षेत्रज्ञ पुरुष से भिन्न? क्षेत्रोपाधि से असंस्पृष्ट शुद्ध परम पुरुष है। प्रत्येक प्रतिबिम्ब के अस्तित्व के लिये एक बिम्बभूत सत्य वस्तु की आवश्यकता होती है। प्रतिबिम्ब की स्थिति दर्पण या जल आदि की सतह पर निर्भर करती है? किन्तु बिम्बभूत सत्यवस्तु को उस सतह का स्पर्श तक नहीं होता। जैसे? चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब पात्र के जल पर निर्भर करता है? किन्तु चन्द्रमा अपने प्रकाशस्वरूप में ही स्थित रहता है।चित्स्वरूप आत्मा क्षेत्र की उपाधि से क्षेत्रज्ञ बनता है। इससे सिद्ध होता है कि आत्मा अपने स्वरूप से निरुपाधिक अर्थात् सर्व उपाधिरहित है।,इस श्लोक में? वैज्ञानिक पद्धति से अध्ययन और विश्लेषण करने की दृष्टि से? भगवान् श्रीकृष्ण उक्त दो प्रकार के पुरुषों  सोपाधिक और निरुपाधिक का निर्देश करते हैं। यहाँ इस बात का स्मरण रहे कि वस्तुत पुरुष एक ही है।यहाँ विभिन्न नामों के द्वारा एक ही परमात्मा को इंगित किया गया है। ये विभिन्न नाम जीव की मनस्थिति अर्थात् अज्ञान आवरण की सघनता और विरलता की दृष्टि से दिये गये हैं। आत्मस्वरूप के विषय में पूर्ण अज्ञानी तथा रागद्वेषादि वृत्तियों से पूर्ण मन वाले व्यक्ति में आत्मा मानो केवल उपद्रष्टा बनकर रहता है अर्थात इस पुरुष के अपराधपूर्ण कार्यों को भी साक्षीभाव से प्रकाशित मात्र करता है वैसे भी आत्मा सममस्त प्राणियों की वृत्तियों का उपद्रष्टा मात्र है। परन्तु जब उस व्यक्ति का चित्त कुछ मात्रा में शुद्ध होता है और वह सत्कर्म में प्रवृत्त हौता है? तब परमात्मा मानो अनुमन्ता बनता है? अर्थात् उसके सत्कर्मों को अपनी अनुमति प्रदान करता है।अन्तकरण के और अधिक शुद्ध होने पर वह व्यक्ति जब अपने दिव्य स्वरूप के प्रति जागरूक हो जाता है तब ईश्वर उसके कर्मों को पूर्ण करने वाला भर्ता बन जाता है। अर्पण की भावना से किये गये कर्मों में ईश्वर की कृपा से सफलता ही प्राप्त होती है। ऐसा प्रतीत होता है? मानो? ईश्वर उस साधक के अल्प प्रयत्नों को भी पूर्णता प्रदान करता है।जब वह साधक अपने अहंकार को भुलाकर पूर्णतया योगयुक्त हो जाता है? तब ऐसे व्यक्ति के हृदय में आत्मा ही भोक्ता बनी प्रतीत होती है। इस श्लोक की समाप्ति इस कथन के साथ होती है कि आत्मा ही महेश्वर है। वही इस देह में परम पुरुष है।प्रकृति और पुरुष के तत्त्व को जानने वाले साधक के विषय में कहते हैं कि

English Translation By Swami Sivananda

The Supreme Soul in this body is also called the spectator, the permitter, the supporter, the enjoyer, the great Lord and the Supreme Self.

Transliteration

upadraṣṭānumantā ca bhartā bhoktā maheśvaraḥ
paramātmeti cāpyukto dehe'sminpuruṣaḥ paraḥ

अनुवाद

इस शरीर में स्थित वह परम पुरुष उपद्रष्टा (साक्षी), अनुमन्ता (अनुमति देने वाला), भर्ता (भरण-पोषण करने वाला), भोक्ता (अनुभव करने वाला), महेश्वर (महान ईश्वर) और परमात्मा भी कहा गया है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण शरीर के भीतर स्थित जीवात्मा से परे परम सत्य (परमात्मा) के स्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। यद्यपि वह इस भौतिक शरीर के भीतर निवास करता है, फिर भी वह प्रकृति के गुणों से लिप्त नहीं होता। वह केवल एक साक्षी (उपद्रष्टा) और अनुमति देने वाले (अनुमन्ता) के रूप में कार्य करता है, और वास्तव में वही सबका परम स्वामी और भरण-पोषण करने वाला है।

Translation

The Supreme Purusha in this body is also called the Witness, the Permitter, the Supporter, the Experiencer, the Great Lord, and the Supreme Self

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the nature of the Supreme Soul (Paramatman) residing within the physical body. Although dwelling within the body alongside the individual soul, He remains unaffected by the material modes of nature. He acts as the ultimate observer (witness), permitter, supporter, and the supreme controller of all activities.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
उपद्रष्टासाक्षी या देखने वाला
अनुमन्ताअनुमति देने वाला
चऔर
भर्ताभरण-पोषण करने वाला (स्वामी)
भोक्ताभोगने वाला (अनुभव करने वाला)
महेश्वरःमहान ईश्वर (परमेश्वर)
परमात्मापरम आत्मा
इतिइस प्रकार
चभी
अपिभी
उक्तःकहा गया है
देहेशरीर में
अस्मिन्इस
पुरुषःपुरुष (भोक्ता)
परःदिव्य या परम

Word by word

WordMeaning
upadraṣṭāthe witness
anumantāthe permitter
caand
bhartāthe supporter
bhoktāthe experiencer
maheśvaraḥthe great Lord
paramātmāthe Supreme Self
itithus
caand
apialso
uktaḥis said
dehein the body
asminthis
puruṣaḥthe enjoyer/purusha
paraḥtranscendental/supreme