श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Bhagavad Gita 13.22

मूल श्लोक :

पुरुषः प्रकृतिस्थो हि भुङ्क्ते प्रकृतिजान्गुणान्
कारणं गुणसङ्गोऽस्य सदसद्योनिजन्मसु

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

प्रकृतिमें स्थित पुरुष ही प्रकृतिजन्य गुणोंका भोक्ता बनता है और गुणोंका सङ्ग ही उसके ऊँचनीच योनियोंमें जन्म लेनेका कारण बनता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

यद्यपि पूर्ण पुरुष परमात्मा का कोई संसार नहीं है? तथापि प्रकृति से उत्पन्न उपाधियों से अविच्छिन्नसा हुआ वह भोक्ता भाव को प्राप्त होता है। यही प्रकृतिस्थ पुरुष है।शीतउष्ण? रागद्वेष? सुखदुख आदि गुण जड़ प्रकृति (क्षेत्र) के धर्म हैं। किन्तु उपाधियों के साथ अहंभाव से तादात्म्य होने के कारण यह पुरुष उसे अपने ही धर्म मानकर व्यर्थ ही दुखों को भोगता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि पुरुष का दुख प्रकृति के कारण नहीं? वरन् उसके साथ हुए तादात्म्य के कारण है।प्रकृति के गुणों के साथ अत्याधिक आसक्ति हो जाने के कारण यह पुरुष असंख्य शुभ और अशुभ? उत्तम और अधम योनियों में जन्म लेता रहता है। ये असंख्य जन्म उसे उन वासनाओं के अनुसार प्राप्त होते हैं? जिन्हें वह जगत् में कार्य करते और फल भोगते हुए अर्जित करता रहता है।इस प्रकार? पारमार्थिक दृष्टि से सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए भी अविद्यावशात् यह पुरुष कर्ता? भोक्ता? सुखी? दुखी? इहलोक परलोकगामी संसारी जीव बन जाता है  आत्म अज्ञान और प्रकृतिजनित गुणों से आसक्ति ही पुरुष के सांसारिक दुख का कारण है। अत संसार की आत्यन्तिक निवृत्ति के लिए जो ज्ञानमार्ग है? उसके दो अंग हैं  विवेक और वैराग्य। साधक को चाहिए कि वह विवेक के द्वारा आत्मज्ञान प्राप्त करे और वैराग्य के द्वारा मिथ्या आसक्ति का त्याग करे।अगले श्लोक में परमात्मा का ही साक्षात् निर्देश करते हुए भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

The soul seated in Nature experiences the alities born of Nature; attachment to the alities is the cause of its birth in good and evil wombs.

Transliteration

puruṣaḥ prakṛtistho hi bhuṅkte prakṛtijān guṇān
kāraṇaṃ guṇasaṅgo'sya sadasadyonijanmasu

अनुवाद

प्रकृति में स्थित ही पुरुष प्रकृति से उत्पन्न गुणों को भोगता है इन गुणों का संग ही इस जीवात्मा के अच्छी-बुरी योनियों में जन्म लेने का कारण है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि जीवात्मा (पुरुष) जब भौतिक प्रकृति के संपर्क में आता है, तो वह प्रकृति के तीन गुणों (सत्त्व, रज, तम) के प्रभाव में आ जाता है। इन गुणों के प्रति आसक्ति के कारण ही जीव को अपने कर्मों के अनुसार उत्तम और अधम योनियों में बार-बार जन्म लेना पड़ता है। जब तक यह आसक्ति बनी रहती है, तब तक संसार चक्र से मुक्ति संभव नहीं है।

Translation

The purusha (individual soul) situated in prakriti (nature) indeed experiences the qualities born of prakriti attachment to these qualities is the cause of its births in good and evil wombs

Meaning

In this verse, Lord Krishna explains how the individual soul (purusha), when situated in material nature (prakriti), becomes conditioned by the three modes of nature (sattva, rajas, and tamas). Attachment to these material qualities and the desire to enjoy them is the root cause of the soul’s repeated cycle of birth and death in various higher and lower species. Liberation is achieved only when one transcends this attachment to the modes of nature.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
पुरुषःजीवात्मा (पुरुष)
प्रकृतिस्थःप्रकृति में स्थित
हिही
भुङ्क्तेभोगता है
प्रकृतिजान्प्रकृति से उत्पन्न
गुणान्गुणों को
कारणम्कारण
गुणसङ्गःगुणों का संग (आसक्ति)
अस्यइस (जीवात्मा) का
सत्-असत्-योनि-जन्मसुअच्छी और बुरी योनियों में जन्म लेने में

Word by word

WordMeaning
puruṣaḥthe individual soul
prakṛtisthaḥsituated in material nature
hiindeed
bhuṅkteenjoys / experiences
prakṛtijānborn of prakriti (nature)
guṇānthe qualities (modes of nature)
kāraṇamthe cause
guṇasaṅgaḥattachment to the qualities
asyaof this (soul)
sat-asat-yoni-janmasuin births in good and evil wombs