Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
Bhagavad Gita 13.16
मूल श्लोक :
बहिरन्तश्च भूतानामचरं चरमेव च
सूक्ष्मत्वात्तदविज्ञेयं दूरस्थं चान्तिके च तत्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
वे परमात्मा सम्पूर्ण प्राणियोंके बाहरभीतर परिपूर्ण हैं और चरअचर प्राणियोंके रूपमें भी वे ही हैं एवं दूरसेदूर तथा नजदीकसेनजदीक भी वे ही हैं। वे अत्यन्त सूक्ष्म होनेसे जाननेका विषय नहीं हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
परमात्मा की सर्वव्यापकता को यहाँ उपनिषदों की अननुकरणीय शैली में इंगित किया गया है।वह भूतमात्र के अन्तर्बाह्य है सभी व्यष्टि उपाधियों में व्यक्त चेतन तत्त्व सर्वव्यापी है। अन्तर्बाह्य से तात्पर्य है कि जहाँ शरीरादि उपाधियाँ हैं? वहाँ तो वह विशेष रूप से व्यक्त हुआ विद्यमान रहता ही है? परन्तु जहाँ कोई उपाधि नहीं है वहाँ भी वह केवल सत्य रूप से स्थित रहता है। जिस प्रकार? जहाँ रेडियो है वहाँ ध्वनि तरंगों का अस्तित्व स्पष्ट ज्ञात होता है? परन्तु जहाँ रेडियो नहीं है? वहाँ उन तरंगों का अभाव नहीं कहा जा सकता।वह चर है और अचर भी जो अपनी स्वेच्छा से विचरण करता रहता है? वह चर प्राणी है? तथा गतिहीन वस्तु अचर वर्ग में आती है। इस वाक्य का अर्थ इस प्रकार भी किया जाता है कि आत्मतत्त्व अचर होते हुये भी चर है इसका तात्पर्य यह है कि आत्मा सर्वव्यापी होने से स्वस्वरूप की दृष्टि से अचर है? परन्तु वही आत्मा गतिमान् उपाधियों से अवच्छिन्नसा होकर चरवत् प्रतीत होता है। उदाहरणार्थ? किसी गतिमान वाहन में कोई व्यक्ति स्वयं अपने स्थान पर बैठा हुआ (अचर) ही मीलों लम्बी यात्रा तय कर लेता है इस प्रकार? हमारे व्यक्तित्व का सारभूत तत्त्व एक? सनातन व परिपूर्ण है जो अन्तर्बाह्य सर्वत्र व्याप्त है। उसके बिना कोई भी क्रिया संभव नहीं है ? इसलिये वह सभी क्रियाओं में विद्यमान है। वह सत्स्वरूप से सर्वत्र ही स्थित है। तब? फिर क्या कारण है कि हम उसे इन्द्रियों द्वारा नहीं देख सकते? या मन और बुद्धि से अनुभव नहीं कर पाते भगवान् कहते हैं कि? वह अत्यन्त सूक्ष्म होने से अविज्ञेय है।गुणवान् वस्तु स्थूल होती है। जिस वस्तु में अधिक गुण होते हैं वह उतनी ही अधिक स्थूल होती है और एकाधिक इन्द्रियों के द्वारा ग्रहण की जा सकती है। जैसे? पृथ्वी का ज्ञान पाँचों इन्द्रियों के द्वारा होता है। जबकि वायु का केवल श्रोत्र और स्पर्शेन्द्रिय से। अत पृथ्वी स्थूलतम तत्त्व है और आकाश में केवल शब्द गुण होने से वह सूक्ष्मतम है।कार्य की अपेक्षा कारण सदैव सूक्ष्म होता है। आकाश तत्त्व सृष्ट वस्तु होने से उसका भी कारण होना आवश्यक है। आकाश का भी कारण वह नित्य अधिष्ठान ब्रह्म है जिससे पंच महाभूतों की उत्पत्ति होती है। स्वाभविक ही है कि वह ब्रह्म आकाश से भी सूक्ष्म होने के कारण हमारे उपलब्ध प्रमाणों के द्वारा दृश्य रूप में नहीं जाना जा सकता है वह अविज्ञेय है।वह दूरस्थ और समीपस्थ है एक साकार परिच्छिन्न वस्तु को किसी स्थान विशेष पर यहाँ या वहाँ स्थित बताया जा सकता है। उन वस्तुओं के द्रष्टा की स्थिति से उनकी दूरी नापी जाकर उन्हें दूरस्थ या समीपस्थ कहा जा सकता है। परन्तु जो सर्वव्यापी है वह एक ही समय यहाँ होगा और वहाँ भी होगा और इसलिये वह दूरस्थ और समीपस्थ भी है। इन दो शब्दों की व्याख्या इस प्रकार भी की जा सकती है कि परमात्मा सर्व नामरूपों की उपाधियों से मुक्त दूरस्थ है किन्तु वही परमात्मा इन नामरूपों में भी समीपस्थ है। श्रीशंकराचार्य अपने भाष्य में लिखते हैं कि यह आत्मा अज्ञानियों को अत्यन्त दूर स्थित हुआ भासता है? जबकि ज्ञानी जन तो उसे अत्यन्त समीप से आत्मरूप से ही अनुभव करते हैं।संक्षेप में? विरोधाभास की भाषा की सुन्दरता से युक्त यह श्लोक उन पाठकों को सहसा जगा देता है? जो केवल बौद्धिक ज्ञान से ही सन्तुष्ट हो जाते हैं। यह श्लोक उन्हें मनन या ध्यान के द्वारा परमात्मा के सर्वव्यापक एवं सर्वातीत स्वरूप का साक्षात् अनुभव करने के लिए प्रेरित करता है।इसी ज्ञेय के विषय में भगवान् आगे कहते है
English Translation By Swami Sivananda
Without and within (all) beings the unmoving and also the moving; because of Its subtlety, unknowable; and near and far away is That.
Transliteration
bahir antaś ca bhūtānām acaraṃ caram eva ca
sūkṣmatvāt tad avijñeyaṃ dūrasthaṃ cāntike ca tatअनुवाद
वह समस्त भूतों के बाहर और भीतर भी है, और चर तथा अचर भी वही है। अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण वह जानने योग्य तत्व अविज्ञेय है, और वह बहुत दूर स्थित होने पर भी अत्यंत समीप ही है।
भावार्थ
इस श्लोक में परमात्मा की सर्वव्यापकता और उनकी अचिन्त्य प्रकृति का वर्णन किया गया है। परमात्मा सभी प्राणियों के भीतर आत्मा रूप में और बाहर भी व्याप्त हैं। वे सूक्ष्म होने के कारण इंद्रियों और बुद्धि की साधारण समझ से परे हैं। अज्ञानी के लिए वे अत्यंत दूर हैं, परंतु ज्ञानी के लिए वे अपने ही हृदय में अत्यंत निकट हैं।
Translation
He exists outside and inside of all living beings, and He is both the unmoving and the moving. Because of His subtlety, He is incomprehensible; He is far away, and yet He is very near.
Meaning
This verse describes the omnipresence and the inconceivable nature of the Supreme Truth. The Divine exists both inside and outside of all living entities, pervading everything as the moving and the unmoving. Due to His extreme subtlety, He cannot be perceived by the material senses. To the ignorant, He seems infinitely far away, but to the self-realized, He is closest of all, residing within their own hearts.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| बहिः | बाहर |
| अन्तः | भीतर |
| च | और |
| भूतानाम् | समस्त प्राणियों के |
| अचरम् | अचर (न चलने वाला) |
| चरम् | चर (चलने वाला) |
| एव | ही |
| च | भी |
| सूक्ष्मत्वात् | अत्यंत सूक्ष्म होने के कारण |
| तत् | वह (परमात्मा) |
| अविज्ञेयम् | अविज्ञेय (न जानने योग्य) |
| दूरस्थम् | अत्यंत दूर स्थित |
| च | और |
| अन्तिके | समीप में |
| च | भी |
| तत् | वह |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| bahiḥ | outside |
| antaḥ | inside |
| ca | and |
| bhūtānām | of all living beings |
| acaram | the unmoving |
| caram | the moving |
| eva | indeed |
| ca | also |
| sūkṣmatvāt | due to being subtle |
| tat | that (Supreme) |
| avijñeyam | incomprehensible |
| dūrastham | situated far away |
| ca | and |
| antike | near |
| ca | also |
| tat | that |