Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
Bhagavad Gita 13.15
मूल श्लोक :
सर्वेन्द्रियगुणाभासं सर्वेन्द्रियविवर्जितम्
असक्तं सर्वभृच्चैव निर्गुणं गुणभोक्तृ चHindi Translation By Swami Ramsukhdas
वे (परमात्मा) सम्पूर्ण इन्द्रियोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषयोंको प्रकाशित करनेवाले हैं आसक्तिरहित हैं और सम्पूर्ण संसारका भरणपोषण करनेवाले हैं तथा गुणोंसे रहित हैं और सम्पूर्ण गुणोंके भोक्ता हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अनिर्देश्य परम ब्रह्म का आत्मरूप से निर्देश करने की एक विधि यह है कि उसे विरोधाभास की भाषा में इंगित करे। एक वाक्य को सुनकर जब बुद्धि उसके विषय में कोई धारणा बना लेती है? तब दूसरा वाक्य उस धारणा का खण्डन कर देता है। इस प्रकार स्वाभाविक है कि वह बुद्धि कल्पना शून्य होकर अपने निर्विकल्प स्वरूप के अनुभव में स्थित हो जाती है। यह विरोधाभास की भाषा आध्यात्मिक ग्रन्थों की विशेषता है। परन्तु शास्त्रों का सतही अध्ययन करने वाले लोग? शास्त्रोपदेश की विधि के मर्म को न समझ कर? अपने अविश्वास या नास्तिकता को न्यायोचित सिद्ध करने के लिए इस प्रकार के श्लोक उद्धृत करते हैं। यह श्लोक उपनिषद् से लिया गया है।आत्मचैतन्य के सम्बन्ध से ही समस्त इन्द्रियाँ अपनाअपना व्यापार करती हैं। परन्तु ऐसा प्रतीत होता है कि उनसे अवच्छिन्न आत्मा ही कार्य करता है तथा वह इन इन्द्रियों से युक्त है। किन्तु विश्लेषण करने पर ज्ञात होता है कि इन्द्रियाँ भौतिक पदार्थ हैं और नाशवान भी हैं? जबकि उनमें व्यक्त होकर उन्हें चेतनता प्रदान करने वाला आत्मा सनातन और अविकारी है। संक्षेप में? उपाधियों की दृष्टि से आत्मा उनका धारक प्रतीत होता है? किन्तु स्वस्वरूप से वह सर्वेन्द्रिय विवर्जित है।विद्युत् शक्ति न तो बल्ब का प्रकाश है और न हीटर की उष्णता तथापि इन उपकरणों में व्यक्त होकर विद्युत् ही प्रकाश और उष्णता के रूप में प्रतीत होती है।वह असक्त किन्तु सबको धारण करने वाला है ब्रह्म को अनासक्त धारक के रूप में समझ पाना प्रारम्भिक विद्यार्थियों के लिए सरल नहीं है। तथापि अपने देश के महान् आचार्यों द्वारा इसे दृष्टान्तों और उपमाओं के द्वारा समझाने का प्रयत्न किया गया है। कोई भी तरंग सम्पूर्ण समुद्र नहीं है समस्त तरंगे सम्मिलित रूप में भी समुद्र नहीं है। हम यह नहीं कह सकते हैं कि समुद्र उन तरंगों में आसक्त है? क्योंकि वह तो उन सबका स्वरूप ही है। असक्त होते हुए भी उन सबको धारण करने वाला समुद्र के अतिरिक्त और कोई नहीं होता। कपास सभी वस्त्रों में है? किन्तु वस्त्र कपास नहीं है। तथापि? कपास ही वस्त्र को धारण करने वाला होता है। इसी प्रकार? विविधता की यह सृष्टि चैतन्य ब्रह्म नहीं है? परन्तु ब्रह्म ही सर्वभृत है।वह निर्गुण? किन्तु गुणों का भोक्ता है मनुष्य का मन सदैव सत्त्व? रज और तम इन तीन गुणों के प्रभाव में कार्य करता है। इन तीनों गुणों के प्रभावों को आत्मा सदा प्रकाशित करता रहता है। प्रकाशक प्रकाश्य के धर्मों से मुक्त होने के कारण आत्मा गुणरहित है। किन्तु एक चेतन मन ही इन गुणों का अनुभव कर सकता है? इसलिए यहाँ कहा गया है कि आत्मा स्वयं निर्गुण होते हुए भी मन की उपाधियों के द्वारा गुणों का भोक्ता भी है।इस प्रकार इस श्लोक में आत्मा का सोपाधिक (उपाधि सहित) और निरुपाधिक (उपाधि रहित) इन दोनों दृष्टिकोणों से निर्देश किया गया है।इतना ही नहीं? वरन् एक व्यष्टि उपाधि में व्यक्त आत्मा ही सर्वत्र समस्त प्राणियों में स्थित है
English Translation By Swami Sivananda
Shining by the functions of all the senses, yet without the senses; unattached, yet supporting all; devoid of alities, yet their experiencer.
Transliteration
sarvendriyaguṇābhāsaṃ sarvendriyavivarjitam
asaktaṃ sarvabhṛccaiva nirguṇaṃ guṇabhoktṛ caअनुवाद
वह परमात्मा समस्त इन्द्रियों के विषयों को प्रकाशित करने वाला है, फिर भी समस्त इन्द्रियों से रहित है। वह सर्वथा अनासक्त होने पर भी सबका भरण-पोषण करने वाला है और गुणों से रहित होने पर भी गुणों का भोक्ता है।
भावार्थ
इस श्लोक में ज्ञेय परमात्मा के विरोधाभासी और दिव्य स्वरूप का वर्णन किया गया है। परमात्मा सभी इन्द्रियों के कार्यों और विषयों को जानने और प्रकाशित करने वाले हैं, किन्तु भौतिक इन्द्रियों से सर्वथा परे हैं। वे किसी भी सांसारिक वस्तु से आसक्त नहीं हैं, फिर भी संपूर्ण सृष्टि के आधार और पोषक हैं, तथा त्रिगुणों से अतीत होने पर भी उनके भोक्ता हैं।
Translation
He appears to possess the qualities of all the senses, yet He is devoid of all senses. Unattached, He is yet the sustainer of all; and free from the modes of nature, He is yet the enjoyer of those modes.
Meaning
This verse describes the paradoxical and transcendental nature of the Supreme Soul (the object of knowledge). Although He illuminates the functions of all senses, He is entirely free from material senses. He remains completely unattached yet sustains everything, and while being beyond the three modes of material nature (gunas), He is the ultimate enjoyer of them.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सर्व | सभी |
| इन्द्रिय | इन्द्रियों के |
| गुण | विषयों या कार्यों को |
| आभासम् | प्रकाशित करने वाला |
| सर्व | सभी |
| इन्द्रिय | इन्द्रियों से |
| विवर्जितम् | रहित |
| असक्तम् | अनासक्त (आसक्ति रहित) |
| सर्व-भृत् | सबका भरण-पोषण करने वाला |
| च | और |
| एव | ही |
| निर्गुणम् | गुणों से रहित (प्राकृत गुणों से परे) |
| गुण-भोक्तृ | गुणों का भोक्ता |
| च | और |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| sarva | of all |
| indriya | senses |
| guṇa | of the qualities/functions |
| ābhāsam | the illuminator/possessor |
| sarva | all |
| indriya | senses |
| vivarjitam | devoid of |
| asaktam | unattached |
| sarva-bhṛt | the sustainer of all |
| ca | and |
| eva | indeed |
| nirguṇam | without material qualities |
| guṇa-bhoktṛ | the enjoyer of the qualities |
| ca | and |