श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Bhagavad Gita 13.13

मूल श्लोक :

ज्ञेयं यत्तत्प्रवक्ष्यामि यज्ज्ञात्वाऽमृतमश्नुते
अनादिमत्परं ब्रह्म न सत्तन्नासदुच्यते

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

(टिप्पणी प0 687.1) जो ज्ञेय है? उस(परमात्मतत्त्व) को मैं अच्छी तरहसे कहूँगा? जिसको जानकर मनुष्य अमरताका अनुभव कर लेता है। वह (ज्ञेयतत्त्व) अनादि और परम ब्रह्म है। उसको न सत् कहा जा सकता है और न असत् ही कहा जा सकता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

पूर्व के पाँच श्लोकों में ज्ञान को बताने के पश्चात्? अब भगवान् ज्ञेय वस्तु को बताने का वचन देते हैं। परन्तु? प्रथम वे इसे जानने का फल बताते हैं? जिसकी कुछ लोग आलोचना करते हैं। किन्तु? यह आलोचना उपयुक्त नहीं है? क्योंकि ज्ञान के फल की स्तुति करने से उसके साधन के अनुष्ठान में प्रवृत्ति? रुचि और उत्साह उत्पन्न होता है।जिसे जानकर? साधक अमृत्व को प्राप्त होता है  जड़ पदार्थ का धर्म है मरण। इन जड़ उपाधियों के साथ तादात्म्य के कारण अमरणधर्मा आत्मा इनसे अवच्छिन्न हुआ व्यर्थ ही मिथ्या परिच्छिन्नता और मरण का अनुभव करता है। आत्मानात्मविवेक के द्वारा अपने आत्मस्वरूप को पहचान कर उसमें दृढ़ स्थिति प्राप्त करने से मरण का यह मिथ्या भय समाप्त हो जाता है और अमृतस्वरूप आत्मा के परमानन्द का अनुभव होता है। ऐसे श्रेष्ठतम लक्ष्य को पाने के लिए पूर्व वर्णित गुणों के द्वारा हमको अपने अन्तकरण को साधन सम्पन्न बनाना चाहिए।अनादिमत्परं ब्रह्म  किसी नित्य अधिष्ठान के सन्दर्भ में ही किसी वस्तु के अनादि अर्थात् प्रारम्भ की कल्पना और गणना की जा सकती है। जो परमात्मा काल का भी अधिष्ठान है? उसकी उत्पत्ति नहीं मानी जा सकती।ब्रह्म को न सत् कहा जा सकता है और न असत्। सामान्य दृष्टि से जो वस्तु प्रमाणगोचर होती है? उसे हम सत् कहते हैं। परन्तु जो चैतन्य द्रष्टा है? वह कभी भी इन्द्रिय? मन और बुद्धि का ज्ञेय नहीं हो सकता? इसलिए कहा गया है कि वह सत् नहीं है। चैतन्य तत्त्व समस्त वस्तुओं का प्रकाशक होते हुए स्वयं समस्त अनुभवों के अतीत है।यदि वह सत् नहीं है? तो हम उसे असत् समझ लेगें? इसलिए यहाँ उसका भी निषेध किया गया है। अत्यन्त अभावरूप वस्तु को असत् कहते हैं? जैसे आकाश? पुष्प? बन्ध्यापुत्र इत्यादि। ब्रह्म को असत् नहीं कह सकते. क्योंकि वह सम्पूर्ण जगत् का कारण है। उसका ही अभाव होने पर जगत् की सिद्धि कैसे हो सकती है  इसलिए? उपनिषदों में उसे नेति? नेति (यह नहीं) की भाषा में निर्देशित किया गया है।शंकराचार्य जी कहते हैं? जाति और गुण से रहित होने के कारण ब्रह्म को सत् नहीं कहा जा सकता? और समस्त शरीरों में चैतन्य रूप में व्यक्त होने के कारण असत् भी नहीं कहा जा सकता है।सत् अर्थात् वस्तु है यह वृत्ति तथा असत् अर्थात् वस्तु नहीं है यह वृत्ति भी बुद्धि में ही उठती है। जो आत्मचैतन्य इन दोनों वृत्तियों का प्रकाशक है? वह दोनों से ही भिन्न है। इस तथ्य की पुष्टि यहाँ पर की गयी है।उपर्युक्त कथन से कोई व्यक्ति उसे शून्य न समझ ले? इसलिए समस्त प्राणियों की उपाधियों के द्वारा ब्रह्म के अस्तित्व का बोध कराते हुए भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

I will declare that which has to be known, knowing which one attains to immortality, the beginningless supreme Brahman, called neither being nor non-being.

Transliteration

jñeyaṃ yattatpravakṣyāmi yajjñātvā'mṛtamaśnute
anādimatparaṃ brahma na sattannāsaducyate

अनुवाद

जो जानने योग्य है, उसे मैं भली-भाँति कहूँगा, जिसे जानकर मनुष्य अमृत (परमानन्द) को प्राप्त करता है। वह अनादि वाला, परम ब्रह्म न सत् कहा जाता है और न असत्।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को उस परम ज्ञेय तत्व (ब्रह्म) के विषय में बता रहे हैं जिसे जानने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। वह परम ब्रह्म अनादि है और प्रकृति के द्वंद्वों से परे है। उसे न तो भौतिक रूप से ‘सत्’ (अस्तित्ववान) कहा जा सकता है और न ही ‘असत्’ (अस्तित्वहीन), क्योंकि वह इंद्रियों और बुद्धि की सीमाओं से परे है।

Translation

I shall now declare to you that which is to be known, knowing which one attains immortality. That is the beginningless supreme Brahman, which is said to be neither existent nor non-existent.

Meaning

In this verse, Lord Krishna promises to reveal the ultimate object of knowledge (Brahman), by knowing which one achieves liberation and immortality. This supreme reality is beginningless and transcends all dualities of the material world. It cannot be defined as either ‘sat’ (effect/existent) or ‘asat’ (cause/non-existent) in a material sense, as it lies beyond the reach of the senses and intellect.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
ज्ञेयम्जानने योग्य
यत्जो
तत्वह
प्रवक्ष्यामिमैं भली-भाँति कहूँगा
यत्जिसको
ज्ञात्वाजानकर
अमृतम्अमृत को (मोक्ष को)
अश्नुतेप्राप्त करता है
अनादिमत्अनादि (बिना आदि वाला)
परम्परम
ब्रह्मब्रह्म
नन
सत्सत् (अस्तित्ववान)
तत्वह
नन
असत्असत् (अस्तित्वहीन)
उच्यतेकहा जाता है

Word by word

WordMeaning
jñeyamto be known
yatwhich
tatthat
pravakṣyāmiI shall speak/declare
yatwhich
jñātvāhaving known
amṛtamimmortality
aśnuteone attains
anādimatbeginningless
paramsupreme
brahmaBrahman
nanot
satexistent (effect)
tatthat
nanot
asatnon-existent (cause)
ucyateis said to be