Chapter 13 · क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग
Bhagavad Gita 13.11
मूल श्लोक :
मयि चानन्ययोगेन भक्ितरव्यभिचारिणी
विविक्तदेशसेवित्वमरतिर्जनसंसदिHindi Translation By Swami Ramsukhdas
मेरेमें अनन्ययोगके द्वारा अव्यभिचारिणी भक्तिका होना? एकान्त स्थानमें रहनेका स्वभाव होना और जनसमुदायमें प्रीतिका न होना।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
संभवत अर्जुन के क्रियाशील स्वभाव से बाध्य होकर या फिर भगवान् श्रीकृष्ण के समाज सुधारक होने से? जो कुछ भी हो? भगवद्गीता हमें जिस रूप में उपलब्ध है? वह आत्मोपलब्धि के विषय का अत्यन्त व्यावहारिक शास्त्रग्रन्थ है। जब कभी भी गीताचार्य अपने शिष्य को किसी मानसिक या बौद्धिक गुणविशेष को विकसित करने का उपदेश देते हैं तब तत्काल ही वे उसके सम्पादन का व्यावहारिक अभ्यसनीय उपाय भी बताते हैं।यदि कोई साधक पूर्व के तीन श्लोकों में वणिर्त गुणों का स्वयं में विकास करता है? तो वह निश्चित ही अपने आन्तरिक और बाह्य जीवन व्यवहार में बहुत अधिक शक्ति का संचय कर सकता है। यह श्लोक बताता है कि किस प्रकार इस अतिरिक्त शक्ति का वह सही दिशा में सदुपयोग करे? जिससे कि आत्मविकास में उसका लाभ मिल सके।अनन्ययोग से मुझ में अव्यभिचारिणी भक्ति अनन्यता का अर्थ है मन का ध्येय विषय में एकाग्र हो जाना। इसके लिये विजातीय वृत्तियों का सर्वथा त्याग करके ध्येयविषयक वृत्ति को ही बनाये रखने का अभ्यास आवश्यक होता है। ध्यान या भक्ति में इस स्थिरता के नष्ट होने के लिए दो कारण हो सकते हैं या तो साधक के मन की अस्थिरता या फिर ध्येय का ही निश्चित नहीं होना जब तक ये दोनों ही स्थिर नहीं होते? भक्ति या ध्यान सफल नहीं हो सकता। यदि हमारी भक्ति एक मूर्ति से अन्य मूर्ति में परिवर्तित होती रहती है तो एकाग्रता कैसे सम्भव हो सकती है इसलिये? यहाँ कहा गया है कि योग में प्रगति और विकास के लिए अनन्य योग से परमात्मा की भक्ति आवश्यक है। यहाँ लक्ष्य की स्थिरता के विषय में कहा गया है।अविभाजित ध्यान तथा मन में उत्साह के होने पर पर भक्ति में एकाग्रता आना सरल कार्य हो जाता है। अन्यथा मन ही विद्रोह करके स्वकल्पित मिथ्या आकर्षणों में भटकता रह सकता है।ध्यानाभ्यास के समय मन के अत्यन्त निम्न और घृणित कोटि के विषयों में विचरण करने के विषय में जिस प्रतीकात्मक वाक्य का प्रयोग भगवान् ने किया है उससे ही ज्ञात होता है कि वे मन के इस विचरण की कितनी कठोरता से निन्दा करना चाहते हैं। वे कहते हैं कि साधक की परम्परा में अव्यभिचारी भक्ति होनी चाहिये। व्याभिचार का अर्थ है किसी तुच्छ लाभ के लिये अपनी क्षमताओं एवं सुन्दरता का विक्रय करना। ईश्वर में समाहित चित्त ही ध्यान में एकनिष्ठ हो सकता है। यहाँ अव्यभिचारी शब्द से साधक को यह चेतावनी दी जाती है कि उसका ध्यान अनेक देवीदेवताओं अथवा विचारों में न भटके? वरन् चुने हुये ध्येय के साथ एकनिष्ठ रहे।इस प्रकार का सुगठित जीवन तथा ध्यान की स्थिरता तब सम्भव होती है? जब साधक उनके अनुकूल वातावरण में रहता है। इस बात को इन दो गुणों से दर्शाया गया है (क) एकान्तवास का सेवन? तथा? (ख) जनसमुदाय में अरुचि। मनुष्य का मन जितना अधिक शुद्ध एवं भोगों से विरत होता जाता है? उसकी ज्ञान की जिज्ञासा उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है। स्वाभाविक ही है कि फिर वह ज्ञान की पिपासा को शान्त करने के लिए लोगों के समुदाय से दूर जहाँ ज्ञान उपलब्ध हो वहाँ चला जाता है। यह बात कवि? लेखक? वैज्ञानिक आदि लोगों के विषय में भी सत्य है। इन सबको फिर एक ही लक्ष्य दिखाई देता है और इन्हें लौकिक बातों में कोई रुचि नहीं रह जाती।यहाँ जिस समुदाय में अरुचि रखने को कहा गया है वह असंस्कृत? असभ्य? भोगों में आसक्त जनों के समुदाय के सम्बन्ध में कहा गया है? न कि सन्त पुरुषों के संग से। सत्संग तो ज्ञान का साधक होता है बाधक नहीं। एकान्तवास? तथा जनसमुदाय से अरुचि का कोई व्यक्ति यह विपरीत अर्थ न समझे कि यहाँ जगत् से पलायन या समाज से द्वेष करने को कहा,गया है।
English Translation By Swami Sivananda
Unswerving devotion unto Me by the Yoga of non-separation, resort to solitary places, distaste for the society of men.
Transliteration
mayi cānanyayogena bhaktiravyabhicāriṇī
viviktadeśasevitvamaratirjanasaṃsadiअनुवाद
मुझमें अनन्य योग के द्वारा अव्यभिचारिणी भक्ति तथा एकान्त और शुद्ध देश में रहने का स्वभाव और विषयी मनुष्यों के समुदाय में अरुचि
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण ज्ञान के लक्षणों को आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि परमेश्वर में अनन्य भाव से स्थिर रहने वाली भक्ति ही वास्तविक ज्ञान है। इसके साथ ही, साधना के अनुकूल एकांत और पवित्र स्थानों में रहने की रुचि तथा संसारी व विषयी लोगों की भीड़ से दूर रहने की प्रवृत्ति भी ज्ञान का अंग है। यह साधक को आत्म-चिन्तन में सहायक बनाती है।
Translation
Unswerving devotion to Me through exclusive union, resorting to solitary places, and distaste for the society of worldly people
Meaning
In this verse, Lord Krishna continues listing the qualities of knowledge, emphasizing unswerving and exclusive devotion to the Supreme. He also highlights the importance of seeking solitary, pure environments conducive to spiritual practice, and maintaining a natural disinterest in the company of worldly-minded crowds.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मयि | मुझमें |
| च | और |
| अनन्य-योगेन | अनन्य योग के द्वारा (बिना किसी अन्य के आश्रय के) |
| भक्तिः | भक्ति |
| अव्यभिचारिणी | अव्यभिचारिणी (जो कभी विचलित न हो) |
| विविक्त | एकांत और शुद्ध |
| देश | स्थान का |
| सेवित्वम् | सेवन करने का स्वभाव |
| अरतिः | अरुचि (उदासीनता) |
| जन-संसदि | साधारण मनुष्यों के समाज में |
| इति | यह सब (ज्ञान कहा गया है) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| mayi | in Me |
| ca | and |
| ananya-yogena | by the yoga of exclusive devotion |
| bhaktiḥ | devotion |
| avyabhicāriṇī | unswerving / constant |
| vivikta | solitary / pure |
| deśa | places |
| sevitvam | inclination to resort to |
| aratiḥ | distaste / lack of interest |
| jana-saṃsadi | in the society of worldly people |
| iti | thus (is declared as knowledge) |