Chapter 12 · भक्तियोग
Bhagavad Gita 12.9
मूल श्लोक :
अथ चित्तं समाधातुं न शक्नोषि मयि स्थिरम्
अभ्यासयोगेन ततो मामिच्छाप्तुं धनञ्जयHindi Translation By Swami Ramsukhdas
अगर तू मनको मेरेमें अचलभावसे स्थिर (अर्पण) करनेमें समर्थ नहीं है? तो हे धनञ्जय अभ्यासयोगके द्वारा तू मेरी प्राप्तिकी इच्छा कर।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
आत्म विकास की जो साधना भगवान् ने पूर्व श्लोक में बतायी है वह अपरिवर्तनीय है। साधक को अपना मन भगवान् के चरणों में स्थिर करके बुद्धि के द्वारा उस सगुण रूप के पारमार्थिक स्वरूप को पहचानना चाहिए। इन दोनों प्रक्रियाओं का सम्पादन करने के लिए अत्यन्त सूक्ष्म बुद्धि और मन की एकाग्रता की आवश्यकता होती है। सम्भवत एक सामान्य पुरुष के समान अर्जुन को यह अनुभव हुआ कि इस मार्ग का सफलतापूर्वक अनुकरण करना उसके लिए असंभव ही है। करुणासागर भगवान् श्रीकृष्ण अपने शिष्य के मुख के भावों को समझकर यहाँ एक अन्य उपाय का वर्णन करते हैं।यदि तुम स्थिरतापूर्वक अपने चित्त को मुझमें समाहित नहीं कर सकते हो? तब एक उपाय यह है कि तुम अभ्यासयोग का पालन करो। इस अभ्यासयोग को पूर्व में इस प्रकार बताया गया था कि? जहाँ कहीं यह चंचल और अस्थिर मन विचरण करता है? उसे वहीं संयमित करके आत्मा के ही वश में लाना चाहिए। संक्षेप में? जब कभी कोई साधक अपने मन को चुने हुए ध्येय विषय में समाहित करना चाहता है? तो उसका चंचल मन ध्येय से हटकर विजातीय प्रवृत्तियों के प्रवाह में विचरण करने लगता है। यहाँ उपदेश यह दिया गया है कि जब कभी मन इस प्रकार विचरण करना प्रारम्भ करे साधक उसी क्षण उसके ध्यान को एकत्र कर पुन भगवान् के दिव्य रूप में स्थिर करने का प्रयत्न करे।प्रत्येक साधक को यह स्वीकार करना पड़ेगा कि ध्यानाभ्यास के समय? किसी एक अवधि तक भी? मन सर्वथा ध्येय वस्तु का ही चिन्तन करने में सफल नहीं होता है। कुछ ही क्षणों में मन का अपने कल्पना जगत् में विहार करना प्रारम्भ हो जाता है। उसका यह विहार करना अपने आप में इतनी बड़ी समस्या नहीं हैं? जितनी बड़ी वह बन जाती है? जब यह साधक भी मन के द्वारा अपहृत हुआ उसी कल्पना लोक में ले जाया जाता है। योगेश्वर श्रीकृष्ण केवल यही उपदेश देते हैं कि हमको अपने दिव्य पथ को त्यागकर मन के लुभाने में नहीं आना चाहिए।यत्रतत्र विचरण करने वाले उपद्रवी मन का ध्यान ध्येय बिन्दु में ही समाहित करने के लिए साधक में मन से अलग रहकर उसे साक्षीभाव से देखते रहने की क्षमता होनी चाहिए। मन के साथ तादात्म्य हो जाने पर तो जहाँ मन वहाँ हम? ऐसी स्थिति हो ही जायेगी। इसलिए? मन को संयमित करने के लिए साधक को मन से अलग होकर अपने में ही निहित उस क्षमता के साथ तादात्म्य करना चाहिए? जो मन से भी श्रेष्ठ है और उस पर शासन करके उसे अनुशासित कर सकती है। मन से श्रेष्ठ उसका शासक है? विवेक अर्थात् बुद्धि। बुद्धि की विवेकसार्मथ्य के द्वारा ही हम उससे निम्नतर मन को अनुशासित कर सकते हैं।यह उपाय उन लोगों को लिए बताया गया है जो पूर्व श्लोक में वर्णित विहंगम मार्ग का अनुसरण नहीं कर सकते हैं। दीर्घकाल तक अभ्यासयोग की साधना करने पर हमारा मन इस प्रकार अनुशासित हो जायेगा कि हम आत्मविकास के साक्षात् साधन का अभ्यास करने में समर्थ हो जायेंगे? जिसका वर्णन पूर्व के श्लोक में किया गया है।यदि यह भी सम्भव न हो तो
English Translation By Swami Sivananda
If thou art unable to fix thy mind steadily on Me, then by the Yoga of constant practice do thou seek to reach Me, O Arjuna.
Transliteration
atha cittaṃ samādhātuṃ na śaknoṣi mayi sthiram
abhyāsayogena tato māmicchāptuṃ dhanañjayaअनुवाद
यदि तुम अपने चित्त को मुझमें स्थिर करने में समर्थ नहीं हो तो हे धनंजय! अभ्यास योग के द्वारा मुझे प्राप्त करने की इच्छा करो
भावार्थ
इस श्लोक में श्री कृष्ण अर्जुन को भक्ति का एक व्यावहारिक विकल्प प्रदान कर रहे हैं। यदि कोई साधक अपने मन को स्वाभाविक रूप से भगवान में पूरी तरह स्थिर नहीं कर पाता, तो उसे निराश नहीं होना चाहिए। निरंतर अभ्यास (अभ्यास योग) के द्वारा मन को बार-बार सांसारिक विषयों से हटाकर भगवान में लगाने का प्रयास करना चाहिए।
Translation
If you are unable to fix your mind steadily on Me then, O Dhanañjaya, seek to reach Me by the yoga of constant practice
Meaning
In this verse, Lord Krishna offers a practical alternative for spiritual practice. If one is unable to naturally and steadily fix their mind on the Divine, they should not despair. Through the yoga of constant practice (abhyāsa-yoga), which involves repeatedly bringing the wandering mind back to God, one can gradually develop steady devotion.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अथ | यदि |
| चित्तम् | मन को |
| समाधातुम् | स्थिर करने के लिए |
| न | नहीं |
| शक्नोषि | तुम समर्थ हो |
| मयि | मुझमें |
| स्थिरम् | अचल रूप से |
| अभ्यास-योगेन | अभ्यास के योग द्वारा |
| ततः | तो |
| माम् | मुझे |
| इच्छ | इच्छा करो |
| आप्तुम् | प्राप्त करने की |
| धनञ्जय | हे अर्जुन (धनंजय) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| atha | if |
| cittam | the mind |
| samādhātum | to fix steadily |
| na | not |
| śaknoṣi | you are able |
| mayi | on Me |
| sthiram | unwaveringly |
| abhyāsa-yogena | by the yoga of practice |
| tataḥ | then |
| mām | Me |
| iccha | desire / seek |
| āptum | to attain |
| dhanañjaya | O Dhanañjaya (Arjuna) |