Chapter 12 · भक्तियोग
Bhagavad Gita 12.8
मूल श्लोक :
मय्येव मन आधत्स्व मयि बुद्धिं निवेशय
निवसिष्यसि मय्येव अत ऊर्ध्वं न संशयःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
तू मेरेमें मनको लगा और मेरेमें ही बुद्धिको लगा इसके बाद तू मेरेमें ही निवास करेगा -- इसमें संशय नहीं है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
ध्यान कोई शारीरिक क्रिया नहीं? वरन् मनुष्य के आन्तरिक व्यक्तित्व के द्वारा विकसित की गई एक सूक्ष्म कला है। प्रत्येक साधक का यह अनुभव होता है कि उसकी बुद्धि जिसे स्वीकार करती है? उसका हृदय उसे समझ नहीं पाता या उसमें रुचि नहीं लेता और जिसके प्रति हृदय लालायित रहता है? बुद्धि उस पर हँसती है। अत बुद्धि और हृदय इन दोनों को परम आनन्द के उसी एक आकर्षक रूप में स्थिर करना ही आन्तरिक व्यक्तित्व को आध्यात्मिक प्रयत्न के साथ युक्त करने का रहस्य है। इस श्लोक में इस कला की साधना का सुन्दरता से वर्णन किया गया है।अपने मन को मुझमें ही स्थिर करो हमारा मन इन्द्रिय अगोचर वस्तु का ध्यान कदापि नहीं कर सकता है। इसलिए? मुरलीधर गोपाल के आकर्षक रूप पर ध्यान करके मन को सरलता से भगवान् के चरणों में लीन किया जा सकता है। भगवान् सर्वव्यापी होने के कारण एक ही समय में समस्त नाम और रूपों का दिव्य अधिष्ठान है। अत भक्त का ध्यान किसी ऐसे स्थान पर भटक ही नहीं सकता जो उसे मयूरपंख का मुकुट धारण किये गोपाल कृष्ण की मन्द स्मित का स्मरण न कराये।बालकृष्ण की विभूषित संगमरमर की मूर्ति का ही चिन्तन करते रहना मात्र मनुष्य के आन्तरिक व्यक्ति के लिए पर्याप्त नहीं है। यद्यपि भगवान् के चरणकमलों के समीप बैठने से हृदय तो सन्तुष्ट हो जाता है? परन्तु बुद्धि की जिज्ञासा शान्त नहीं होती। किसी एक अंगविशेष का ही विकास होना कुरुपता को ही जन्म देता है समन्वय और एक समान विकास ही पूर्णता है। इसलिए? शास्त्रीय दृष्टि से गीता का यह उपदेश उचित है कि भक्त को चाहिए कि वह अपनी विवेकवती बुद्धि के द्वारा पाषाण की मूर्ति का भेदन करके उस चैतन्य तत्त्व का साक्षात्कार करे जिसकी प्रतीक वह मूर्ति है।अपनी बुद्धि को मुझमें स्थापित करो इसका अर्थ यह है कि अपनी व्यष्टि बुद्धि का तादात्म्य समष्टि बुद्धि के साथ करो? जो भगवान् की उपाधि है। हममें से प्रत्येक व्यक्ति? किसी एक क्षण विशेष में? अपनी समस्त भावनाओं एवं विचारों का कुल योग रूप होता है। यदि हमारा मन भगवान् में स्थिर हुआ है तथा बुद्धि अनन्त की गहराइयों में प्रवेश कर जाती है? तो हमारा व्यक्तिगत अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है और हम सर्वव्यापी? अनन्त परमात्मा में विलीन होकर तत्स्वरूप बन जाते हैं। इसलिए भगवान् ने कहा है कि? तदुपरान्त? तुम मुझमें ही निवास करोगे।सत्यकेमन्दिर के द्वार पर मन में विक्षेप और संकोच के साथ खड़े हुए एक र्मत्य जीव को भगवान् का यह कथन अतिशयोक्तिपूर्ण प्रतीत हो सकता है। उसका तो अपना नित्य का अनुभव यह है कि वह एक परिच्छिन्न र्मत्य व्यक्ति है? जो सहस्रों मर्यादाओं से घिरा? असंख्य दोषों से दुखी और निराशाओं की सेना के द्वारा उत्पीड़ित किया जा रहा जीव है। इसलिए? उसे विश्वास नहीं होता कि वास्तव में वह कभी अपने ईश्वरत्व के स्वरूप का साक्षात्कार भी कर सकता है। अत? एक दयालु गुरु के रूप में? भगवान् श्रीकृष्ण स्पष्ट आश्वासन देते हैं कि? इसमें संशय की कोई बात नहींेहै।यदि यह साधना कठिन प्रतीत हो तो उपायान्तर बताते हुए भगवान् कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Fix thy mind in Me only, thy intellect in Me, (then) thou shalt no doubt live in Me alone hereafter.
Transliteration
mayyeva mana ādhatsva mayi buddhiṃ niveśaya
nivasiṣyasi mayyeva ata ūrdhvaṃ na saṃśayaḥअनुवाद
मुझमें ही अपने मन को स्थिर करो, मुझमें ही अपनी बुद्धि को लगाओ इसके बाद तुम मुझमें ही निवास करोगे, इसमें कोई संशय नहीं है
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अनन्य भक्ति का मार्ग बताते हैं। वे कहते हैं कि साधक को अपने मन और बुद्धि दोनों को पूरी तरह से भगवान में ही लीन कर देना चाहिए। ऐसा करने से मनुष्य मृत्यु के पश्चात या इसी जीवन में भगवद्भाव को प्राप्त होता है और ईश्वर में ही निवास करता है।
Translation
Fix your mind on Me alone, let your intellect dwell in Me Thereafter you shall live in Me alone, of this there is no doubt
Meaning
In this verse, Lord Krishna instructs Arjuna on the path of exclusive devotion. He advises the seeker to absorb both the mind and the intellect entirely in Him. By doing so, the devotee will undoubtedly dwell in the Divine consciousness hereafter.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| मयि | मुझमें |
| एव | ही |
| मनः | मन को |
| आधत्स्व | स्थिर करो |
| मयि | मुझमें |
| बुद्धिम् | बुद्धि को |
| निवेशय | लगाओ |
| निवसिष्यसि | तुम निवास करोगे |
| मयि | मुझमें |
| एव | ही |
| अतः ऊर्ध्वम् | इसके बाद |
| न | नहीं |
| संशयः | संदेह |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| mayi | in Me |
| eva | alone |
| manaḥ | the mind |
| ādhatsva | fix |
| mayi | in Me |
| buddhim | the intellect |
| niveśaya | apply / enter |
| nivasiṣyasi | you shall dwell |
| mayi | in Me |
| eva | alone |
| ataḥ ūrdhvam | thereafter |
| na | no |
| saṃśayaḥ | doubt |