Chapter 12 · भक्तियोग
Bhagavad Gita 12.4
मूल श्लोक :
संनियम्येन्द्रियग्रामं सर्वत्र समबुद्धयः
ते प्राप्नुवन्ति मामेव सर्वभूतहिते रताःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो अपनी इन्द्रियोंको वशमें करके अचिन्त्य? सब जगह परिपूर्ण? अनिर्देश्य? कूटस्थ? अचल? ध्रुव? अक्षर और अव्यक्तकी उपासना करते हैं? वे प्राणिमात्रके हितमें रत और सब जगह समबुद्धिवाले मनुष्य मुझे ही प्राप्त होते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
पूर्व श्लोकों में सगुणोपासक भक्तों के लिए आवश्यक गुणों का वर्णन करने के पश्चात् अब भगवान् श्रीकृष्ण निर्गुण के उपासकों का वर्णन उपर्युक्त दो श्लोकों में करते हैं।अक्षर रूप और गुणों से युक्त सभी वस्तुएं द्रव्य हैं और सभी द्रव्य क्षर अर्थात् नाशवान होते हैं। इन्द्रियों के द्वारा केवल इन द्रव्यों का ही ज्ञान हो सकता है। अत अक्षर शब्द से यह सूचित किया गया है कि इन्द्रियों के द्वारा परमतत्त्व का ज्ञान कदापि संभव नहीं है।अनिर्देश्य जो परिभाषित नहीं किया जा सकता है उसे अनिर्देश्य कहते हैं। सभी परिभाषाएं दृश्य वस्तु के सन्दर्भ में ही दी जा सकती हैं। अत जो इन्द्रियों का दृश्य नहीं होता? उसकी न परिभाषा दी जा सकती है और न ही उसे अन्य वस्तुओं से भिन्न करके जाना जा सकता है।सर्वत्रगम् जो अनन्त तत्त्व गुण रहित होने से व्यक्त नहीं हैं? और इसी कारण अनिर्देश्य है? उसको सर्वव्यापी होना आवश्यक है। यदि परमात्मा से कोई स्थान रिक्त हो? तो परमात्मा को आकार विशेष प्राप्त हो जायेगा। और साकार वस्तु विनाशी भी होगी।अचिन्त्यम् मन के द्वारा जिस वस्तु का चिन्तन किया जा सकता है? वह दृश्य पदार्थ होने के कारण नाशवान् होगी। इसलिए अविनाशी तत्त्व निश्चित ही अकल्पनीय? अग्राह्य और अचिन्त्य होगा।कूटस्थम् (अविकारी) यद्यपि चैतन्यस्वरूप आत्मा वह अधिष्ठान है? जिसके ऊपर सब विकार और परिवर्तन होते रहते हैं? परन्तु वह स्वयं अपरिवर्तनशील और अविकारी ही रहता है। कूट शब्द का अर्थ है निहाई। एक लुहार की दुकान में निहाई पर अन्य लौह खण्डों को रखकर उन पर आघात करके उन्हें विभिन्न आकार दिये जाते हैं? परन्तु निहाई स्वयं अपरिवर्तित ही रहती है। उसी प्रकार चैतन्य के सम्बन्ध से उपाधियों तथा व्यक्तित्व में विकार होता है? किन्तु चैतन्य तत्त्व कूट के समान अविकारी रहता है।अचलम् चलन का अर्थ है वस्तु का देश और काल की मर्यादा में परिवर्तन होना। कोई वस्तु अपने में ही चल नहीं सकती उसका चलन वही पर संभव है? जहाँ पर वह पहले से विद्यमान नहीं है। यहाँ? इस क्षण मैं कुर्सी पर बैठा हूँ। मैं दूसरे क्षण दूसरा स्थान ग्रहण करने जा सकता हूँ। परन्तु? यहीं और इसी क्षण अपनी कुर्सी पर बैठा मैं अपने में ही चल फिर नहीं सकता? क्योंकि मैं स्वयं को पूर्णत व्याप्त किये हुए हूँ। परमात्मा सर्वव्यापी है? और इसलिए? देश या काल में ऐसा कोई स्थान या क्षण नहीं है? जहाँ वह विद्यमान न हो? अत वह अचल कहलाता है। वह यत्र? तत्र? सर्वत्र है उसमें ही भूत? वर्तमान और भविष्य का अस्तित्व है।ध्रुवम् (शाश्वत् सनातन) विकारी वस्तु देश और काल से अवच्छिन्न होती है। परन्तु जो देश और काल का भी अधिष्ठान है? वह परमात्मा इन दोनों से परिच्छिन्न नहीं हो सकता है। अनन्त स्वरूप चैतन्य आत्मा सर्वत्र? सब काल में एक ही है। शैशव? यौवन और वृद्धावस्था में? सर्वत्र? सब काल और सुखदुख? लाभहानि की समस्त परिस्थितियों में आत्मा एक समान ही रहता है। जब हम अपने शरीर? मन और बुद्धि के स्तर पर आते हैं? केवल तभी हम आइन्स्टीन के द्वारा वर्णित देश और काल की सापेक्षता के जगत् में प्रवेश करते हैं। परमात्मा कालविच्छिन्न नहीं है वह काल का भी शासक है। वह ध्रुव है।यहाँ ध्यान देने योग्य बात यह है कि इन दो श्लोकों में प्रयुक्त शब्द उपनिषदों से लिये गये हैं। इन शब्दों के द्वारा उस परमात्मा का निर्देश किया जाता है? जो इस नित्य परिवर्तनशील नाम और रूपों? कर्म और घटनाओं? विषय ग्रहण और भावनाओं? विचारों तथा अनुभवों के जगत् का एकमेव सनातन अधिष्ठान है। सभी उपासकों में निम्नलिखित तीन गुणों का होना आवश्यक है।इन्द्रियसंयम इन्द्रियों के द्वारा अपनी शक्तियों का अपव्यय करना अविचारी एवं निम्न स्तर की रुचि वाले मनुष्यों का कार्य़ होता है। पूर्णत्व के शिखर पर पहुँचकर परमानन्द का अनुभव करने की जिस साधक की महत्त्वाकांक्षा है? उसको चाहिए कि वह इस अपव्यय में कटौती करे? और इस प्रकार उपार्जित शक्तियों का सदुपयोग ध्यान में आत्मानुभव को प्राप्त करने के लिए करे। पांच ज्ञानेन्द्रियां ही वे द्वार हैं? जिनके माध्यम से मन को विचलित करने वाले बाह्य जगत् के विषय चोरी छिपे मन में प्रवेश करके हमारी आन्तरिक शान्ति को नष्ट कर देते हैं। और फिर हमारा मन कर्मेन्द्रियों के द्वारा बाह्य जगत् में अपनी प्रतिक्रियाएं व्यक्त करने को दौड़ पड़ता है। इस प्रकार? विषयग्रहण और प्रतिक्रिया रूप यह व्यवहार मन के सामंजस्य और सन्तुलन को तोड़ देता है। इसलिए? यहाँ श्रीकृष्ण का इन्द्रियसंयम पर बल देना उचित ही है? क्योंकि ध्यानमार्ग की सफलता इसी पर निर्भर करती है।सर्वत्र समबुद्धि सफलता के लिए आवश्यक यह दूसरा गुण है। समस्त प्रकार की परिस्थितियों और अनुभवों में बुद्धि की समता होनी चाहिए। बाह्य विक्षेपरहित दशा की आशा और प्रतीक्षा करना मूर्खता का लक्षण ही है। ऐसी आदर्श परिस्थिति का होना असम्भव है। जगत् की वस्तुएं अपने में ही तथा विशिष्ट संरचनाओं के रूप में भी निरन्तर परिवर्तित होती रहती हैं। इसलिए ऐसे नित्य परिवर्तनशील रचना वाले जगत् में किसी ऐसी इष्ट स्थिति की अपेक्षा रखना जो साधक के ध्यानाभ्यास के लाभ के लिए निरन्तर एक समान बनी रहे? वास्तव में अविवेकपूर्ण ही कहा जा सकता है। यह सर्वथा असंभव है। इसलिए? ऐसे परिवर्तनशील जगत् में साधक को ही चाहिए कि व्ाह अपने बौद्धिक मूल्यांकनों? मन की आसक्तियों तथा बाह्य जगत् के साथ होने वाले सम्पर्कों को विवेकपूर्ण संयमित करके बुद्धि की समता और मन का सन्तुलन बनाये रखे। दृष्टि के समक्ष मन में विकार या विक्षेप उत्पन्न करने वाले विषयों या परिस्थितियों के होने पर भी जो पुरुष अपना सन्तुलन नहीं खोता है? वही समबुद्धि कहलाता है। जिस पुरुष ने अपनी विवेकशक्ति का विकास किया है? वह बड़ी सरलता से सौन्दर्य के उस स्वर्णिम तार को देख और पहचान सकता है? जो इस जगत् की उन समस्त वस्तुओं को धारण किये हुए है? जो सुन्दर और आकर्षक तथा कुरूप और प्रतिकर्षक है। इस क्षमता से सम्पन्न साधक को ही यहाँ समबुद्धि कहा गया है।किसी व्यक्ति का शिशु पुत्र किसी समय मैला है तो दुसरे समय अत्यन्त चंचल प्रात रुदन कर रहा होता है? तो दोपहर में हंसता है संध्याकाल में तंग करता है और रात में उन्मत्त और फिर भी? उसकी इन सब दशाओं में उसका पिता एक पुत्र को ही देखता है? और इसलिए उसके भिन्नभिन्न रूपों में भी उसे समान रूप से ही प्रेम करता है। यह उस प्रेमपूर्ण पिता की समबुद्धि है। इसी प्रकार एक सच्चा साधक अपने जीवन के भयानक दुखान्तों और आनन्ददायक सुखान्तों में तथा अभूतपूर्व सफलताओं और निराशाजनक विफलताओं में भी अपने हृदय के इष्ट देव को पहचानना सीखता है। इसलिए? वह बौद्धिक समता को प्राप्त हो जाता है।भूतमात्र के हित में रत होते हैं सफलता के लिए आवश्यक तीसरे गुण को बताते हुए भगवान् कहते हैं कि साधक को अर्पण की भावना से सदैव यथाशक्ति भूतमात्र की सेवा में रत रहना चाहिए। जब तक मनुष्य इस शरीर को धारण किये जीवित रहता है? तब तक उसके लिये यह सर्वथा असंभव है कि नित्य निरन्तर प्रत्येक समय अपने मन और बुद्धि को आत्मचिन्तन में ही स्थिर कर सके। जगत् के साथ उसे सामान्य व्यवहार करना ही होगा। इस प्रकार के व्यवहारों में उसे निरन्तर अथक प्रय़त्न करके प्राणीमात्र की सेवा करनी चाहिए। यह तो इस ज्ञान का स्वरूप ही है। भूतमात्र को प्रेम करना तो उसका धर्म ही है।इस प्रकार उक्त तीन गुणों से सम्पन्न होकर जो साधकगण अक्षर और अव्यक्त की उपासना करते हैं? वे भी मुझे ही प्राप्त होते हैं यह भगवान् श्रीकृष्ण की घोषणा है।अर्जुन द्वारा पूछा गया प्रश्न वास्तव में विवादास्पद है? जबकि भगवान् द्वारा दिया गया उसका उत्तर एक अविवादास्पद सत्य की घोषणा है। यहाँ महान् दार्शनिक भगवान् श्रीकृष्ण यह बताते हैं कि किस प्रकार दोनों ही उपासक एक ही लक्ष्य को प्राप्त करते हैं। दोनों में ही सफलता के लिए कौन से समान गुणों का होना आवश्यक है। यहाँ वर्णित साधना पद्धतियों का निष्ठापूर्वक और पूर्णतया पालन करने पर सगुणसाकार अथवा निर्गुणनिराकार की उपासना के द्वारा एक ही परमात्मा की प्राप्ति होगी।परन्तु? सामान्यत? बहुसंख्यक साधकों के विषय में वे कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Having restrained all the senses, even-minded everywhere, intent on the welfare of all beings verily they also come unto Me.
Transliteration
saṃniyamyendriyagrāmaṃ sarvatra samabuddhayaḥ
te prāpnuvanti mām eva sarvabhūtahite ratāḥअनुवाद
अपनी सभी इन्द्रियों के समूह को भली-भांति वश में करके, सभी परिस्थितियों में समान बुद्धि वाले और सभी प्राणियों के कल्याण में लगे हुए लोग भी मुझे ही प्राप्त करते हैं
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण निराकार (अव्यक्त) ब्रह्म की उपासना करने वालों की गति का वर्णन करते हैं। जो साधक अपनी इन्द्रियों को पूर्णतः नियंत्रित करते हैं, सुख-दुःख आदि द्वंद्वों में समभाव रखते हैं और प्राणिमात्र के कल्याण में तत्पर रहते हैं, वे भी अंततः परमात्मा को ही प्राप्त करते हैं। यह दर्शाता है कि सगुण और निर्गुण दोनों ही मार्ग एक ही गंतव्य तक ले जाते हैं।
Translation
Restraining the entire group of senses, even-minded everywhere, and engaged in the welfare of all beings, they also attain Me alone
Meaning
In this verse, Lord Krishna describes the path of those who worship the unmanifest, formless Brahman. Those who completely control their senses, maintain equanimity under all circumstances, and are dedicated to the welfare of all living beings, ultimately reach the same Supreme Goal. This emphasizes that both the path of devotion to the personal God and the path of knowledge of the impersonal Absolute lead to the same destination.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| संनियम्य | भली-भांति वश में करके |
| इन्द्रिय-ग्रामम् | इन्द्रियों के समूह को |
| सर्वत्र | सब जगह (सभी परिस्थितियों में) |
| सम-बुद्धयः | समान बुद्धि वाले |
| ते | वे |
| प्राप्नुवन्ति | प्राप्त करते हैं |
| माम् | मुझको |
| एव | ही |
| सर्व-भूत-हिते | सभी प्राणियों के कल्याण में |
| रताः | लगे हुए |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| saṃniyamya | restraining fully |
| indriya-grāmam | the group of senses |
| sarvatra | everywhere |
| sama-buddhayaḥ | those of equal mind |
| te | they |
| prāpnuvanti | attain |
| mām | Me |
| eva | alone |
| sarva-bhūta-hite | in the welfare of all beings |
| ratāḥ | engaged |