श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 12 · भक्तियोग

Bhagavad Gita 12.15

मूल श्लोक :

यस्मान्नोद्विजते लोको लोकान्नोद्विजते च यः
हर्षामर्षभयोद्वेगैर्मुक्तो यः स च मे प्रियः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जिससे किसी प्राणीको उद्वेग नहीं होता और जिसको खुद भी किसी प्राणीसे उद्वेग नहीं होता तथा जो हर्ष? अमर्ष (ईर्ष्या)? भय और उद्वेगसे रहित है? वह मुझे प्रिय है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

इस प्रकरण के द्वितीय भागरूप श्लोक में ज्ञानी भक्त के तीन और लक्षण बताये गये हैं। जिस पुरुष से इस लोक को उद्वेग नहीं होता  ज्ञानी पुरुष वह है? जो लोक में किसी प्रकार का विक्षेप या उद्वेग उत्पन्न नहीं करता है। जहाँ सूर्य है वहाँ अन्धकार नहीं रह सकता वैसे ही? जहाँ शान्त और आनन्दस्वरूप में स्थित ज्ञानी भक्त होगा? वहाँ अशान्ति और उदासी का प्रश्न ही नहीं उठता है। उसके आसपास शान्ति? प्रेम और आनन्द का ही ऐसा वातावरण निर्मित होता है कि वहाँ पहुँचने पर एक क्षुब्ध और दुखी पुरुष भी उस महात्मा पुरुष से प्रभावित होकर अपने दुख को भूलकर शान्ति का अनुभव करता है। वास्तविकता तो यह है कि सारा जगत् उस सन्त के समीप विवश हुआ सा दौड़ पड़ता है  केवल उसके ज्ञान और आनन्द को स्वयं में अनुभव करने के लिए जो स्वयं भी किसी से उद्विग्न नहीं होता है  न केवल वह सबको शान्ति प्रदान करता है बल्कि स्वयं अपनी शान्ति और आनन्द को किसी प्रकार से भी नहीं खोता है। जगत् की कोई भी स्थिति उसे उद्विग्न नहीं कर सकती। बाह्य दुर्व्यवस्था विरोध और प्रतिशोध की भावना से पूर्ण उपद्रवी लोगों के होने पर भी उसके मन में विक्षेप नहीं होता। भौतिक वस्तुओं का यह जगत् सदैव परिवर्तित होता रहता है? और सामान्यत सबको विमूढ और दुखी कर देने वाला मृत्यु का यह ताण्डव सन्त पुरुष की मनशान्ति को रंचमात्र भी विचलित नहीं कर सकता। मानो वह अधिक शक्तिशाली धातु का बना होता है और उसका जीवन सुदृढ़ नीव पर निर्मित होता है।समुद्र की सतह पर अनेक लकड़ियाँ इतस्तत बहती और भटकती रहती हैं? किन्तु समुद्री चट्टानों की दृढ़ नींव पर निर्मित दीपस्तम्भ समुद्र में उठने वाले ज्वारभाटे का अवलोकन करते हुये निश्चल और सीधा खड़ा रहता है ज्ञानी पुरुष का व्यक्तित्व जीवन के अधिष्ठानस्वरूप सत्य वस्तु की अनुभूति में स्थित होने के कारण जीवन की सतही परिस्थितियों से कभी विचलित नहीं होता? क्योंकि उसके मन में किसी वस्तु से कोई आसक्ति नहीं होती। संघर्षमय परिस्थितियों के अन्तर्बाह्य भी वह एक नित्य अपरिवर्तनशील अधिष्टान को देखता है? और प्रकृति के शुद्ध संगीत में मनुष्य के द्वारा उत्पन्न किये जा रहे वर्जित स्वरों में भी वह एक अचल और शुद्ध स्वर का ही श्रवण करता है।वह हर्ष? अमर्ष? भय और उद्वेग से मुक्त होता है। इस प्रकार जो भक्त अपने स्वयं के साथ तथा जगत् के साथ भी सदा शान्ति का अनुभव करता है? और जो परिस्थितियों पर शासन करता है? और उनका शिकार नहीं बनता है? जिसने सामान्य मनुष्य के अवगुणों और प्रतिक्रियाओं को पार कर लिया है? ऐसा भक्त मुझे प्रिय है।इसी विषय में भगवान् आगे कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

He by whom the world is not agitated and who cannot be agitated by the world, and who is freed from joy, anger, fear and anxiety  he is dear to Me.

Transliteration

yasmān nodvijate loko lokān nodvijate ca yaḥ
harṣāmarṣabhayodvegair mukto yaḥ sa ca me priyaḥ

अनुवाद

जिससे कोई भी जीव उद्वेग को प्राप्त नहीं होता और जो स्वयं भी किसी जीव से उद्वेग को प्राप्त नहीं होता, तथा जो हर्ष, अमर्ष, भय और उद्वेगों से मुक्त है, वह मुझे प्रिय है।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण उस भक्त के लक्षणों का वर्णन करते हैं जो उन्हें अत्यंत प्रिय है। ऐसा भक्त संसार में किसी के लिए भी अशांति या दुःख का कारण नहीं बनता और न ही वह स्वयं दूसरों के व्यवहार से विचलित होता है। वह सांसारिक द्वंद्वों जैसे अत्यधिक हर्ष, ईर्ष्या, भय और चिंता से सर्वथा मुक्त होकर मानसिक शांति में स्थित रहता है।

Translation

He by whom the world is not agitated and who is not agitated by the world, and who is free from joy, envy, fear, and anxiety—he is dear to Me.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes the qualities of a devotee who is very dear to Him. Such a devotee does not cause disturbance or distress to any living being, nor is he disturbed by the actions of others. He remains emotionally balanced and free from the dualities of worldly excitement, intolerance, fear, and anxiety.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यस्मात्जिससे
ननहीं
उद्विजतेउद्विग्न होता है (भयभीत या दुखी होता है)
लोकःसंसार (कोई भी जीव)
लोकात्संसार से (किसी भी जीव से)
ननहीं
उद्विजतेउद्विग्न होता है
चऔर
यःजो
हर्षहर्ष (अत्यधिक प्रसन्नता)
अमर्षअमर्ष (क्रोध या ईर्ष्या)
भयभय
उद्वेगैःऔर उद्वेगों से
मुक्तःमुक्त है
यःजो
सःवह
चभी
मेमेरा (मुझे)
प्रियःप्रिय है

Word by word

WordMeaning
yasmātfrom whom
nanot
udvijateis agitated
lokaḥthe world (any living being)
lokātfrom the world
nanot
udvijateis agitated
caand
yaḥwho
harṣajoy
amarṣaenvy (anger)
bhayafear
udvegaiḥand anxiety
muktaḥfreed
yaḥwho
saḥhe
caalso
meto Me
priyaḥdear