Chapter 12 · भक्तियोग
Bhagavad Gita 12.1
मूल श्लोक :
अर्जुन उवाच
एवं सततयुक्ता ये भक्तास्त्वां पर्युपासते
येचाप्यक्षरमव्यक्तं तेषां के योगवित्तमाःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जो भक्त इस प्रकार निरन्तर आपमें लगे रहकर आप(सगुण भगवान्) की उपासना करते हैं और जो अविनाशी निराकारकी ही उपासना करते हैं? उनमेंसे उत्तम योगवेत्ता कौन हैं
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यद्यपि भगवद्गीता के दार्शनिक प्रवचन संवाद की शैली में लिखे गये हैं? तथापि उनमें विचारों के क्रमिक विकास की कभी भी उपेक्षा नहीं की गई है। उसमें न केवल एक अध्याय के अन्तर्गत विचारों में संगति है? वरन् एक अध्याय से अन्य अघ्यायों के मध्य भी यही संगति देखने को मिलती है। पूर्व अध्याय की समाप्ति भगवान् के इस आश्वासन के साथ हुई थी कि कोई भी साधक भक्त अनन्यभक्ति के द्वारा ईश्वर के विराट् वैभव का स्वयं में साक्षात् अनुभव कर सकता है। इस चुनौती भरे वाक्य ने क्षत्रिय राजपुत्र अर्जुन की महत्त्वाकांक्षा को जगा दिया। जगत् के एक व्यावहारिक पुरुष के रूप में वह जानना चाहता है कि वह परमात्मा के कौन से रूप की उपासना करे।यहाँ प्रश्न बड़ी बुद्धिमत्तापूर्वक रखा गया है। यह सुविदित तथ्य है कि जगत् में दो प्रकार के साधक होते हैं? जो वस्तुत एक ही साध्य को प्राप्त करने के लिए साधनारत होते हैं। कोई साधक परमात्मा के सगुण? साकार व्यक्त रूप की आराधनाउपासना करते हैं? जबकि अन्य साधक निर्गुण? निराकार अव्यक्त का ध्यान करते हैं। दोनों ही निष्ठावान् हैं और अपनेअपने मार्ग पर प्रगति की ओर अग्रसर होते हैं। परन्तु? प्रश्न यह है कि इन दोनों में कौन उत्तम योगवित् या योगनिष्ठ है।दर्शनशास्त्र में इन्द्रियगोचर वस्तु को व्यक्त कहते हैं तथा जो वस्तु प्रमाण गोचर नहीं होती? उसे अव्यक्त कहा जाता है। विद्यार्थी दशा में अर्जुन को यह बताया गया था कि परमात्मा अव्यक्त और सर्वव्यापी है। परन्तु? पूर्व अध्याय में ही उसने ईश्वरी विराट रूप का साक्षात् दर्शन किया था। वह उसका व्यक्तिगत अनुभव था। स्वाभाविक ही है कि आध्यात्मिक विकास के लिए मार्गदर्शन का इच्छुक अर्जुन एक उचित प्रश्न पूछता है कि सगुण और निर्गुण के इन दो उपासकों में कौन साधक श्रेष्ठ है सगुण और निर्गुण में श्रेष्ठता का प्रश्न आज भी विवाद का विषय बना हुआ है। क्या मूर्तिपूजा के द्वारा ईश्वर का ध्यान और साक्षात्कार किया जा सकता है क्या कोई भी प्रतीक परमात्मा का सूचक हो सकता है क्या एक तरंग समुद्र का प्रतीक या प्रतिनिधि बन सकती है प्रथम? भगवान् श्रीकृष्ण सगुणोपासना का वर्णन करते हुए कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Arjuna said Those devotees who, ever steadfast, thus worship Thee and those also who worship the imperishable and the unmanifested which of them are better versed in Yoga?
Transliteration
arjuna uvāca
evaṃ satatayuktā ye bhaktāstvāṃ paryupāsate
ye cāpyakṣaramavyaktaṃ teṣāṃ ke yogavittamāḥअनुवाद
अर्जुन ने कहा — इस प्रकार निरंतर लगे हुए जो भक्त आपकी उपासना करते हैं और जो अविनाशी अप्रकट (निराकार) की उपासना करते हैं, उन दोनों में से कौन उत्तम योगवेत्ता हैं
भावार्थ
यह बारहवें अध्याय का पहला श्लोक है, जहाँ से भक्ति योग का आरम्भ होता है। अर्जुन यहाँ भगवान कृष्ण से सगुण (साकार) और निर्गुण (निराकार) उपासकों की तुलनात्मक श्रेष्ठता के बारे में पूछ रहे हैं। वे जानना चाहते हैं कि साकार रूप में भगवान की निरंतर पूजा करने वाले भक्त और निराकार ब्रह्म की साधना करने वाले साधकों में से कौन योग का अधिक ज्ञाता है।
Translation
Arjuna said: Those devotees who, ever steadfast, thus worship You, and those who worship the imperishable, the unmanifest—of these, who are the best knowers of yoga?
Meaning
This is the opening verse of Chapter 12, which begins the Yoga of Devotion (Bhakti Yoga). Arjuna asks Lord Krishna to compare those who worship Him as a personal deity with those who meditate on the impersonal, unmanifest Brahman. He seeks to understand which of these two paths leads to a superior realization of yoga.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अर्जुनः | अर्जुन |
| उवाच | ने कहा |
| एवम् | इस प्रकार |
| सतत-युक्ताः | निरंतर लगे हुए |
| ये | जो |
| भक्ताः | भक्तगण |
| त्वाम् | आपकी |
| पर्युपासते | उपासना करते हैं |
| ये | जो |
| च | और |
| अपि | भी |
| अक्षरम् | अविनाशी को |
| अव्यक्तम् | अव्यक्त (निराकार) को |
| तेषाम् | उनमें से |
| के | कौन |
| योग-वित्तमाः | योगवेत्ताओं में श्रेष्ठ हैं |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| arjunaḥ | Arjuna |
| uvāca | said |
| evam | thus |
| satata-yuktāḥ | always engaged/steadfast |
| ye | those who |
| bhaktāḥ | devotees |
| tvām | You |
| paryupāsate | worship |
| ye | those who |
| ca | and |
| api | also |
| akṣaram | the imperishable |
| avyaktam | the unmanifested |
| teṣām | of them |
| ke | who |
| yoga-vittamāḥ | the best knowers of yoga |