Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.9
मूल श्लोक :
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा ततो राजन्महायोगेश्वरो हरिः
दर्शयामास पार्थाय परमं रूपमैश्वरम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
सञ्जय बोले -- हे राजन् ऐसा कहकर फिर महायोगेश्वर भगवान् श्रीकृष्णने अर्जुनको परम ऐश्वररूप दिखाया। (टिप्पणी प0 580)
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
बहुमुखी प्रतिभा के धनी महर्षि व्यासजी ने साहित्य के जिस किसी पक्ष को स्पर्श किया उसे पूर्णत्व के सर्वोत्कृष्ट शिखर तक उठाये बिना नहीं छोड़ा। व्यासजी की प्रतिभा का वर्णन कौन कर सकता है उनमें अतुलनीय काव्य रचना की कल्पनातीत क्षमता? अनुपम गध शैली? विशुद्ध वर्णन? कलात्मक साहित्यिक रचना? आकृति और विचार दोनों में ही मौलिक नव निर्माण की सार्मथ्य? ये सब गुण पूर्ण मात्रा में थे। तेजस्वी दार्शनिक? पूर्ण ज्ञानी और व्यावहारिक ज्ञान में कुशल व्यासजी कभी राजभवनों में तो कभी युद्धभूमि में दिखाई देते? कभी बद्रीनाथ में तो कभी पुन शान्त एकान्त हिमशिखरों का मार्ग तय करते विशाल मूर्ति महर्षि व्यास? हिन्दू परम्परा और आर्य संस्कृति में जो कुछ सर्वश्रेष्ठ है? उस सबके साक्षात् मूर्तरूप थे। ऐसा सर्वगुण सम्पन्न प्रतिभाशाली पुरुष विश्व के इतिहास में कभी किसी अन्य काल में नहीं जन्मा होगा? जिसने अपने जीवन काल में व्यासजी के समान इतनी अधिक उपलब्धियां प्राप्त की हों।भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को संकेत किया कि विश्वरूप में वह क्या देखने की अपेक्षा रख सकता है तथा विराट् स्वरूप का यह दर्शन उसे कहां होगा। अब? व्यासजी एक अत्यन्त अल्प से प्रकरण का उल्लेख करते हैं? जिसमें संजय? दुष्ट कौरवों के अन्ध पिता धृतराष्ट्र के लिए युद्धभूमि के वृतान्त का वर्णन करता है।साहित्य की दृष्टि से इस श्लोक का प्रयोजन केवल यह बताना है कि श्रीकृष्ण ने अपने दिये हुए वचनों के अनुसार? वास्तव में? अर्जुन को अपना विश्वरूप दर्शाया। परन्तु इसके साथ ही? महाभारत के कुशल रचयिता व्यासजी? हमारे लिए? संजय के मन के भावों को तथा पाण्डवों के प्रति उसकी सहानुभूति का चित्रण भी करना चाहते हैं। हम पहले ही कह चुके हैं कि संजय हमारा विशेष संवाददाता है। स्पष्ट है कि उसकी सहानुभूति भगवान् के मित्र पांडवों के साथ है। उसकी यह प्रवृत्ति निसंशय रूप से यहाँ स्पष्ट झलकती है? जब वह धृतराष्ट्र को केवल राजन् शब्द से संबोधित करता है जब कि श्रीकृष्ण को महायोगेश्वर तथा हरि के नाम से। हरण करने वाला हरि कहलाता है?अर्थात् जो मिथ्या का नाश करके सत्य की स्थापना करने वाला है।संजय के इन शब्दों के साथ श्रोतृसमुदाय तथा गीता के अध्येतृ वर्ग का ध्यान युद्ध की भूमि से हटाकर राजप्रासाद की ओर आकर्षित किया जाता है। पाठकों को यह स्मरण कराने के लिए कि गीता के तत्त्वज्ञान का व्यावहारिक जीनव से घनिष्ठ संबंध है तथा उसकी जीवन में उपयोगिता भी है? सम्भवत ऐसे दृश्य परिवर्तन की आवश्यकता है। संजय धृतराष्ट्र को सूचना देता है कि महायोगेश्वर हरि ने अर्जुन को अपना ईश्वरीय रूप दिखाया। संजय के मन में अभी भी कहीं क्षीण आशा है कि यह सुनकर कि विश्वविधाता भगवान् श्रीकृष्ण पाण्डवों के साथ हैं? सम्भवत अन्धराजा अपने पुत्रों की भावी पराजय को देखें? और विवेक से काम लेकर? विनाशकारी युद्ध को रोक दें।अगले श्लोकों में संजय विश्वरूप में दर्शनीय वस्तुओं का वर्णन करने का प्रयत्न करता है
English Translation By Swami Sivananda
Sanjaya said Having thus spoken, O king, the great Lord of Yoga, hari (Krishna), showed to Arjuna His supreme form as the Lord.
Transliteration
sañjaya uvāca
evam uktvā tato rājan mahā-yogeśvaro hariḥ
darśayāmāsa pārthāya paramaṃ rūpam aiśvaramअनुवाद
संजय ने कहा — हे राजन! ऐसा कहकर, उसके बाद महायोगेश्वर हरि ने अर्जुन को अपना परम ऐश्वर्यमय रूप दिखाया
भावार्थ
संजय धृतराष्ट्र को युद्धभूमि का वृत्तांत सुनाते हुए कहते हैं कि भगवान कृष्ण ने अर्जुन को अपना विराट रूप दिखाने से पूर्व यह वचन कहे। इसके पश्चात, योग के परम स्वामी श्रीहरि ने अर्जुन के समक्ष अपने अत्यंत दिव्य और ऐश्वर्यशाली विश्वरूप को प्रकट किया। यह रूप सामान्य चर्मचक्षुओं से परे और केवल दिव्य दृष्टि द्वारा ही देखा जा सकता था।
Translation
Sanjaya said: O King, having spoken thus, the great Lord of Yoga, Hari, then revealed His supreme, divine form to Arjuna
Meaning
Sanjaya narrates the events of the battlefield to Dhritarashtra, explaining that after speaking those words, Krishna revealed His cosmic form. As the supreme Lord of all mystic power, Hari manifested His divine, majestic, and limitless form to Arjuna. This supreme form represents the totality of the universe, which Arjuna was now empowered to see with his newly granted divine vision.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सञ्जयः | संजय ने |
| उवाच | कहा |
| एवम् | इस प्रकार |
| उक्त्वा | कहकर |
| ततः | उसके बाद |
| राजन् | हे राजा (धृतराष्ट्र) |
| महा-योग-ईश्वरः | योग के महान ईश्वर |
| हरिः | श्रीहरि (कृष्ण) ने |
| दर्शयामास | दिखाया |
| पार्थाय | पृथापुत्र अर्जुन को |
| परमम् | परम / दिव्य |
| रूपम् | रूप |
| ऐश्वरम् | ऐश्वर्ययुक्त / ईश्वर का |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| sañjayaḥ | Sanjaya |
| uvāca | said |
| evam | thus |
| uktvā | having spoken |
| tataḥ | then |
| rājan | O King |
| mahā-yoga-īśvaraḥ | the great Lord of Yoga |
| hariḥ | Hari (Krishna) |
| darśayāmāsa | revealed |
| pārthāya | unto the son of Pṛthā (Arjuna) |
| paramam | supreme |
| rūpam | form |
| aiśvaram | divine / sovereign |