श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग

Bhagavad Gita 11.8

मूल श्लोक :

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा
दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे योगमैश्वरम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

तू अपनी इस आँखसे अर्थात् चर्मचक्षुसे मेरेको देख ही नहीं सकता। इसलिये मैं तुझे दिव्य चक्षु देता हूँ? जिससे तू मेरी ईश्वरसम्बन्धी सामर्थ्यको देख।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

हम पहले ही वर्णन कर चुके हैं कि एक सारतत्व को उससे बनी विभिन्न वस्तुओं में देख पाना अपेक्षत सरल कार्य है? किन्तु इसके विपरीत अनेक को एक तत्त्व में देखने के लिए दर्शनशास्त्र के सम्यक् ज्ञान से सम्पन्न सूक्ष्म बुद्धि की आवश्यकता होती है। किसी कविता को पढ़ने मात्र के लिए केवल वर्णमाला का ज्ञान होना आवश्यक है परन्तु उसके सूक्ष्म सौन्दर्य को समझने के लिए तथा उसी के समान अन्य कविताओं के साथ उसका तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए एक ऐसे प्रवीण मन की आवश्यकता होती है? जिसने सर्वश्रेष्ठ साहित्यिक रचनाओं के रसास्वादन के आनन्द में अपने आप को डुबो दिया हो। इसी प्रकार? एक को अनेक में देखना श्रद्धा से परिपूर्ण हृदय का कार्य है परन्तु अनेक को एक में अनुभव करने के लिए हृदय के अतिरिक्त ऐसी शिक्षित बुद्धि की आवश्यकता होती है? जिसे दार्शनिकों की युक्तियों को समझने की योग्यता प्राप्त हुई हो। जानने और अनुभव करने की क्षमता का विकास होने पर ही एक शिक्षित बुद्धि को असाधारण का दर्शन करने की विशिष्ट सार्मथ्य प्राप्त होती है।एक सर्वविदित प्रत्यक्ष तथ्य को बताते हुए भगवान् कहते हैं? तुम मुझे अपने इन्हीं नेत्रों के द्वारा नहीं देख सकते मैं तुम्हें दिव्यचक्षु देता हूँ। अनेक समालोचक या व्याख्याकार हैं? जो इस दिव्यचक्षु का वर्णन अनेक हास्यास्पद कल्पनाओं तथा असंभव सिद्धांतों के द्वारा करने का प्रयत्न करते हैं। इससे प्रतीत होता है कि इन व्याख्याकारों ने हिन्दू शास्त्रोंउपनिषदों की शैली का भलीभाँति अध्ययन नहीं किया है। सभी उपनिषदों में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से बारम्बार इस बात पर बल दिया गया है कि मनुष्य अपनी ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा सूक्ष्म वस्तुओं का अवलोकन नहीं कर सकता है। इन्द्रियां केवल बाह्य जगत् की स्थूल वस्तुओं को ही ग्रहण कर सकती हैं। सामान्य व्यवहार में जब हम कहते हैं? इस विचार को देखो तो यह देखना इन दो नेत्रों से नहीं होता है। वहाँ देखने से तात्पर्य बौद्धिक ग्रहण से है तथा ऐसे सूक्ष्म विषय का ग्रहण करने की बौद्धिक क्षमता को ही दिव्यचक्षु कहा गया है।अर्जुन को यह दिव्यचक्षु भगवान् के ईश्वरीय योग को देखने के लिए प्रदान किया गया है। इस योग के द्वारा सम्पूर्ण विश्व भगवान् के रूप में धारण किया गया है। इसके पूर्व भी इस योगशक्ति का उल्लेख प्राय समान शब्दों में दो विभिन्न स्थानों पर आ चुका है।अब दृश्य परिवर्तन होता है। हस्तिनापुर के राजमहल में बैठा संजय धृतराष्ट्र से कहता है

English Translation By Swami Sivananda

But thou art not able to behold Me with these thine own eyes; I give thee the divine eye; behold My lordly Yoga.

Transliteration

na tu māṃ śakyase draṣṭumanenaiva svacakṣuṣā
divyaṃ dadāmi te cakṣuḥ paśya me yogamaiśvaram

अनुवाद

परन्तु तुम मुझे अपनी इन आँखों से देखने में समर्थ नहीं हो मैं तुम्हें दिव्य चक्षु देता हूँ, मेरे ऐश्वर्यमय योग को देखो

भावार्थ

भगवान कृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि उनकी प्राकृत आँखें उनके विराट रूप को देखने में असमर्थ हैं। इसलिए, वे अर्जुन को अलौकिक या दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं। इस दिव्य दृष्टि के माध्यम से ही अर्जुन भगवान के परम ऐश्वर्य और योगशक्ति का दर्शन कर सकते हैं।

Translation

But you cannot see Me with these eyes of yours I give you divine vision; behold My majestic mystic power

Meaning

Lord Krishna explains to Arjuna that his physical eyes are incapable of beholding the cosmic form. Therefore, He bestows upon Arjuna divine vision or spiritual eyes. Only through this supernatural sight can Arjuna perceive the supreme majesty and mystic power of the Lord.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
नहीं
तुपरन्तु
माम्मुझको
शक्यसेतुम समर्थ हो
द्रष्टुम्देखने के लिए
अनेनइस
एवही
स्वचक्षुषाअपनी आँखों से
दिव्यम्अलौकिक / दिव्य
ददामिमैं देता हूँ
तेतुम्हें
चक्षुःदृष्टि / आँखें
पश्यदेखो
मेमेरे
योगम्योगशक्ति को
ऐश्वरम्ईश्वरीय / ऐश्वर्यमय

Word by word

WordMeaning
nanot
tubut
māmMe
śakyaseyou are able
draṣṭumto see
anenawith this
evaindeed
svacakṣuṣāyour own eyes
divyamdivine
dadāmiI give
teto you
cakṣuḥvision / eyes
paśyabehold
meMy
yogammystic power
aiśvarammajestic / divine