श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग

Bhagavad Gita 11.55

मूल श्लोक :

मत्कर्मकृन्मत्परमो मद्भक्तः सङ्गवर्जितः
निर्वैरः सर्वभूतेषु यः स मामेति पाण्डव

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे पाण्डव जो मेरे लिये ही कर्म करनेवाला? मेरे ही परायण और मेरा ही भक्त है तथा सर्वथा आसक्तिरहित और प्राणिमात्रके साथ निर्वैर है? वह भक्त मेरेको प्राप्त हो जाता है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अर्जुन ने यह सुना कि अनन्यभक्ति के द्वारा कोई भी भक्त? भगवान् के समष्टि वैभव को न केवल पहचान ही सकता है? वरन् स्वयं में ही उसका साक्षात् अनुभव भी कर सकता है। तब पाण्डव राजपुत्र के मुख पर उस अनुभव या पद को प्राप्त करने की उत्सुकता दिखाई दी। यद्यपि उसने स्पष्ट प्रश्न नहीं किया तथापि उसके मुख के भाव से ही उसे समझकर भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ वर्णन करते हैं कि कोई साधक जीवन में इस पूर्णत्व को कैसे प्राप्त कर सकता है।किसी जीव को ईश्वरत्व प्राप्त करने का श्रीकृष्ण द्वारा उपदिष्ट योजना के पांच अंग हैं। उन पांच अंगों या आवश्यक गुणों को इस श्लोक में बताया गया है। वे गुण हैं  (1) जो ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करता है? (2) जिसका परम लक्ष्य ईश्वर ही है? (3) जो ईश्वर का भक्त है? (4) जो आसक्तियों से रहित है? तथा (5) जो भूतमात्र के प्रति वैरभाव से रहित है।इन पांच आवश्यक गुणों में आत्मसंयम की सम्पूर्ण साधना का सारांश दिया गया है। ईश्वर के अखण्ड स्मरण से ही समस्त उपाधियों के कर्मों में अनासक्ति का भाव दृढ़ होता है। किसी व्यक्ति के प्रति वैरभाव तभी होता है? जब हम उसे पराया समझते हैं। मेरे ही दोनों हाथों के मध्य कोई वैरभाव नहीं हो सकता। आत्मैकत्व के बोध से जब सर्वत्र एकता का दर्शन और अनुभव होता है? केवल तभी समस्त भूतों के प्रति पूर्ण निर्वैरभाव प्राप्त हो सकता है।मन और बुद्धि के स्तर पर सर्वथा अनासक्ति होना असंभव है। मन और बुद्धि किसी वस्तु या व्यक्ति के प्रति आसक्ति के बिना नहीं रह सकते हैं। इसलिए एक साधक? सर्वप्रथम? ईश्वरार्पण की भावना के द्वारा विषयासक्ति को त्यागना सीखता है? और तत्पश्चात् अपने मन को भक्ति के साथ ईश्वर में स्थित कर देता है। इस अंग की पूर्णता के लिए पूर्व कथित गुण निश्चय ही सहायक होते हैं।इस प्रकार? सम्पूर्ण योजना का पुनरावलोकन करने पर ज्ञात होगा कि वह पूर्ण मनोवैज्ञानिक होने के कारण सर्वथा स्वीकार्य है। प्रत्येक उत्तर अंग अपने पूर्व अंग से पोषित होता है। इस श्लोक से यह भी स्पष्ट ज्ञात होता है कि अध्यात्म के साधक की महान् पवित्र तीर्थयात्रा ईश्वरार्पण बुद्धि से कर्म करने से प्रारम्भ होती है। तत्पश्चात् स्वयं ईश्वर ही उसके जीवन का परम लक्ष्य बन जाता है। इसका परिणाम होगा ईश्वर के प्रति परम प्रेम। स्वाभाविक है कि जगत् की अनित्य? परिच्छिन्न वस्तुओं के साथ उसकी आसक्ति समाप्त हो जायेगी और वह आत्मा का दर्शन कर सकेगा। जब स्वयं आत्मस्वरूप ही बनकर वह स्वयं को सर्वत्र? सब भूतों में पहचानेगा? तब उसका किसी भी प्राणी से किसी प्रकार का वैर नहीं होगा।गीता के अनुसार साधना के द्वारा प्राप्त आत्मसाक्षात्कार की पूर्णता की कसौटी है  सबसे प्रेम और किसी से द्वेष नहीं होना।conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषस्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रेश्रीकृष्णार्जुनसंवादे विश्वरूपदर्शनयोगो नाम एकादशोऽध्याय।।इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्रस्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का विश्वरूप दर्शनयोग नामक ग्यारहवां अध्याय समाप्त होता है।इस अध्याय का विश्वरूपदर्शनयोग यह नाम सार्थक है। वेदान्तशास्त्र की परिभाषिक शब्दावली के अनुसार यहाँ प्रयुक्त विश्वरूप शब्द का वास्तविक अर्थ विराट्रूप है। आत्मा एक व्यष्टि स्थूल देह के साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर जाग्रत् अवस्था की घटनाओं का अनुभव करता है। इस अवस्था में स्थित आत्मा को वेदान्त में विश्व कहा जाता है। वही आत्मा समष्टि स्थूल देह  अर्थात् ब्रह्माण्ड के साथ तादात्म्य प्राप्त कर विराट् कहलाता है। यद्यपि यहाँ भगवान् ने अपना विराट्रूप दिखाया है? तथापि इस अध्याय का नाम विश्वरूपदर्शनयोग है। इससे विश्व और विराट् के पारमार्थिक एकत्व का बोध होता है।

English Translation By Swami Sivananda

He who does all actions for Me, who looks upon Me as the Supreme, who is devoted to Me, who is free from attachment, who bears enmity towards no creature, he comes to Me, O Arjuna.

Transliteration

matkarmakṛnmatparamo madbhaktaḥ saṅgavarjitaḥ
nirvairaḥ sarvabhūteṣu yaḥ sa māmeti pāṇḍava

अनुवाद

हे पाण्डव! जो मेरे लिए ही कर्म करने वाला है, मेरे परायण है, मेरा भक्त है, आसक्ति से रहित है और समस्त प्राणियों में वैरभाव से रहित है, वह मुझे ही प्राप्त होता है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को अपनी प्राप्ति का परम और सरल मार्ग बताते हैं। जो मनुष्य अपने सभी कर्मों को भगवान को समर्पित करता है, उन्हें ही अपना परम लक्ष्य मानता है, आसक्ति और द्वेष से मुक्त रहता है, वह अंततः परमात्मा में ही लीन हो जाता है। यह संपूर्ण गीता के व्यावहारिक उपदेशों का सार है।

Translation

O son of Pandu, he who performs actions for Me, who keeps Me as the supreme goal, who is devoted to Me, free from attachment, and without enmity towards all living beings, comes to Me

Meaning

In this verse, Lord Krishna summarizes the ultimate path to reach Him. He explains that a person who dedicates all actions to the Divine, regards the Divine as the supreme goal, remains free from worldly attachments, and harbors no ill-will toward any creature, will certainly attain Him. This is considered the essence of the entire Bhagavad Gita’s teachings.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
मत्-कर्म-कृत्मेरे लिए कर्म करने वाला
मत्-परमःमुझे ही परम मानने वाला
मत्-भक्तःमेरा भक्त
सङ्ग-वर्जितःआसक्ति से रहित
निर्वैरःवैर-भाव से रहित
सर्व-भूतेषुसभी प्राणियों में
यःजो
सःवह
माम्मुझको
एतिप्राप्त होता है
पाण्डवहे पाण्डुपुत्र (अर्जुन)

Word by word

WordMeaning
mat-karma-kṛtdoing actions for Me
mat-paramaḥlooking upon Me as the Supreme
mat-bhaktaḥdevoted to Me
saṅga-varjitaḥfree from attachment
nirvairaḥwithout enmity
sarva-bhūteṣutowards all living beings
yaḥwho
saḥhe
māmto Me
eticomes
pāṇḍavaO son of Pandu