श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग

Bhagavad Gita 11.54

मूल श्लोक :

भक्त्या त्वनन्यया शक्यमहमेवंविधोऽर्जुन
ज्ञातुं दृष्टुं च तत्त्वेन प्रवेष्टुं च परंतप

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

परन्तु हे शत्रुतापन अर्जुन इस प्रकार (चतुर्भुजरूपवाला) मैं अनन्यभक्तिसे ही तत्त्वसे जाननेमें? सगुणरूपसे देखनेमें और प्राप्त करनेमें शक्य हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

,भक्ति के विषय में आचार्य शंकर कहते हैं कि? सभी मोक्ष साधनों में भक्ति ही श्रेष्ठ है और यह भक्ति स्वस्वरूप के अनुसंधान के द्वारा आत्मस्वरूप बन जाती है।प्रिय के साथ तादात्म्य ही प्रेम का वास्तविक मापदण्ड है। भक्त अपने व्यक्तिगत जीवभाव के अस्तित्व को विस्मृत कर? जब प्रेम में अपने प्रिय भगवान् के साथ तादात्म्य को प्राप्त हो जाता है? तब उस प्रेम की परिसमाप्ति पराभक्ति या अनन्य भक्ति कहलाती है। आत्मज्ञान का जिज्ञासु आध्यात्मिक विधान के अनुसार उपाधियों के साथ अपने निम्नस्तर को त्यागने के लिए बाध्य होता है। अनात्मा के तादात्म्य को त्यागने पर ही शुद्ध आत्मस्वरूप की पहचान हो सकती है।केवल वे साधकगण? जो इस जगत् को एक सूत्र में धारण करने वाले सत्य के साथ तादात्म्य कर सकते हैं? वे ही मुझे इस रूप में अर्थात् विराटरूप में अनुभव कर सकते हैं।जिन तीन क्रमिक सोपानों में सत्य का साक्षात्कार होता है? उसका निर्देश भगवान् इन तीन शब्दों से करते हैं  जानना देखना और प्रवेश करना। सर्व प्रथम एक साधक को अपने साध्य तथा साधन का बौद्धिक ज्ञान आवश्यक होता है? जिसे यहां जानना शब्द से सूचित किया गया है और इसका साधन है श्रवण।इस प्रकार कुछ ज्ञान प्राप्त कर लेने पर मन में सन्देह उत्पन्न होते हैं इन सन्देहों की निवृत्ति के लिए प्राप्त ज्ञान पर युक्तिपूर्वक मनन करना अत्यावश्यक होता है। सन्देहों की निवृत्ति होने पर तत्त्व का दर्शन (देखना) होता है। तत्पश्चात् निदिध्यासन के अभ्यास से मिथ्या उपाधियों के साथ तादात्म्य को सर्वथा त्यागकर आत्मस्वरूप के साथ एकरूप हो जाना ही उसमें प्रवेश करना है। आत्मा का यह अनुभव स्वयं से भिन्न किसी वस्तु का नहीं? वरन् अपने स्वस्वरूप का है। प्रवेश शब्द से साधक और साध्य के एकत्व का बोध कराया गया है। स्वप्नद्रष्टा के स्वाप्निक दुखों का तब अन्त हो जाता है? जब वह जाग्रत पुरुष में प्रवेश करके स्वयं जाग्रत पुरुष बन जाता है।स्वयं भगवान् ही अपनी प्राप्ति का उपाय बताते हैं

English Translation By Swami Sivananda

But by single-minded devotion can I, of this Form, be known and seen in reality and also entered into, O Arjuna.

Transliteration

bhaktyā tv ananyayā śakyam aham evaṃvidho 'rjuna
jñātuṃ draṣṭuṃ ca tattvena praveṣṭuṃ ca paraṃtapa

अनुवाद

हे अर्जुन! अनन्य भक्ति के द्वारा ही इस प्रकार का मैं तत्त्व से जानने, देखने और प्रवेश करने के लिए शक्य हूँ, हे परंतप

भावार्थ

भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को समझाते हैं कि उनके इस चतुर्भुज या विश्वरूप के दर्शन केवल वेदों के अध्ययन, तपस्या या दान से संभव नहीं हैं। इसे केवल अनन्य भक्ति (बिना किसी अन्य आश्रय के की जाने वाली भक्ति) के द्वारा ही प्राप्त किया जा सकता है। ऐसी भक्ति से ही साधक भगवान को तत्त्व से जान सकता है, उनके साक्षात् दर्शन कर सकता है और अंततः उनमें लीन हो सकता है।

Translation

But by undivided devotion alone, O Arjuna, can I in this form be known, truly seen, and entered into, O scorcher of foes

Meaning

Lord Krishna explains to Arjuna that His supreme cosmic form cannot be perceived through mere Vedic study, penances, or charity. It is only through unswerving, single-minded devotion (ananya-bhakti) that a seeker can truly comprehend, behold, and enter into His divine essence. Devotion is established here as the ultimate path to complete union with the Divine.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
भक्त्याभक्ति के द्वारा
तुलेकिन / ही
अनन्ययाअनन्य (बिना किसी अन्य के)
शक्यःसंभव हूँ
अहम्मैं
एवम्-विधःइस प्रकार का
अर्जुनहे अर्जुन
ज्ञातुम्जानने के लिए
द्रष्टुम्देखने के लिए
और
तत्त्वेनतत्त्व से (वास्तविकता में)
प्रवेष्टुम्प्रवेश करने के लिए
और
परंतपहे शत्रुओं को तपाने वाले (अर्जुन)

Word by word

WordMeaning
bhaktyāby devotion
tubut / indeed
ananyayāby unswerving / single-minded
śakyaḥam possible
ahamI
evam-vidhaḥof this kind / in this form
arjunaO Arjuna
jñātumto be known
draṣṭumto be seen
caand
tattvenain truth / in reality
praveṣṭumto be entered into
caand
paraṃtapaO chastiser of foes