Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.48
मूल श्लोक :
न वेदयज्ञाध्ययनैर्न दानै र्न च क्रियाभिर्न तपोभिरुग्रैः
एवंरूपः शक्य अहं नृलोके द्रष्टुं त्वदन्येन कुरुप्रवीरHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे कुरुप्रवीर मनुष्यलोकमें इस प्रकारके विश्वरूपवाला मैं न वेदोंके पढ़नेसे? न यज्ञोंके अनुष्ठानसे? न दानसे? न उग्र तपोंसे और न मात्र क्रियाओंसे तेरे (कृपापात्रके) सिवाय और किसीके द्वारा देखा जाना शक्य हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यहाँ भगवान् यह स्पष्ट करते हैं कि किस कारण से अर्जुन इस असाधारण अनुभव को प्राप्त करने में विशेष अभिनन्दन का पात्र है। वे कहते हैं कि केवल वेदों का अध्ययन या यज्ञादि के अनुष्ठान से ही किसी में इस विश्वरूप को देख सकते की पात्रता नहीं आती। उसी प्रकार? दान धर्म या तप के आचरण से प्राप्त पुण्य भी इस दर्शन का अधिकार नहीं प्राप्त करता है। संक्षेप में? कठिन? साधनाओं के अभ्यास से भी जिसे पाना दुर्लभ है? उसे अर्जुन ने प्राप्त कर लिया? और इस कारण वह विशेष अभिनन्दन का पात्र है।भगवान् द्वारा यहाँ कहे गये वचनों का विपरीत अर्थ करके कोई यह नहीं समझे कि उन्होंने वेदाध्ययनादि की निन्दा की है अथवा ये समस्त साधन अनुपयोगी होने के कारण त्याज्य हैं। तात्पर्य यह है कि अध्ययन? यज्ञ? दान और तप ये सब अन्तकरण की शुद्धि तथा एकाग्रता प्राप्ति के साधन हैं? जो अनेकता में एकता के दर्शन करने के लिए अत्यावश्यक है। परन्तु कोई यह भी नहीं समझे कि यज्ञदानादि साधन अपने आप में ही पूर्ण हैं या वे ही साध्य हैं। केवल वेदाध्ययन आदि से ही एकत्व का बोध और साक्षात् अनुभव नहीं हो सकता। जब साधन सम्पन्न मन वृत्तिशून्य हो जाता है केवल तभी उसकी उस अन्तर्मुखी स्थिति में यह दर्शन सम्भव होता है। तात्पर्य यह है कि भोजन पाक सिद्धि अपने आप में क्षुधा शान्ति नहीं कर सकती? किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि पाकसिद्धि अनावश्यक है। इस दृष्टि से हमें इस श्लोक का अर्थ समझना चाहिए।भगवान् आगे कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Neither by the study of the Vedas and sacrifices, nor by gifts nor by rituals nor by severe austerities can I be seen in this form in the world of men by any other than thyself, O great hero of the Kurus (Arjuna).
Transliteration
na vedayajñādhyayanairna dānair na ca kriyābhirna tapobhirugraiḥ
evaṁrūpaḥ śakya ahaṁ nṛloke draṣṭuṁ tvadanyena kurupravīraअनुवाद
न वेदों और यज्ञों के अध्ययन से, न दान से, न क्रियाओं (अनुष्ठानों) से और न ही उग्र तपस्याओं से, इस मनुष्य लोक में तुम्हारे अतिरिक्त किसी अन्य द्वारा मैं इस रूप वाला (विश्वरूप वाला) देखा जा सकता हूँ, हे कुरुश्रेष्ठ अर्जुन।
भावार्थ
भगवान कृष्ण अर्जुन को अपने इस परम ऐश्वर्यशाली विश्वरूप की दुर्लभता के बारे में बता रहे हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि केवल बाहरी धार्मिक अनुष्ठानों, वेदों के अध्ययन, दान या कठिन तपस्या के बल पर इस विराट रूप के दर्शन नहीं किए जा सकते। अर्जुन पर भगवान की विशेष कृपा थी, जिसके कारण उन्हें यह दिव्य दर्शन प्राप्त हुआ।
Translation
Neither by the study of the Vedas and sacrifices, nor by charity, nor by rituals, nor by severe penances, can I be seen in this form in the world of men by anyone other than you, O hero of the Kurus.
Meaning
Lord Krishna explains the extreme rarity of witnessing His cosmic form. He emphasizes that external religious practices, Vedic study, charity, rituals, and severe austerities are insufficient on their own to grant this vision. It was only through Krishna’s special grace and Arjuna’s unalloyed devotion that this divine form was revealed.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| न | नहीं |
| वेद-यज्ञ-अध्ययनैः | वेदों और यज्ञों के अध्ययन के द्वारा |
| न | नहीं |
| दानैः | दानों के द्वारा |
| न | नहीं |
| च | और |
| क्रियाभिः | क्रियाओं (यज्ञ-अनुष्ठानों) के द्वारा |
| न | नहीं |
| तपोभिः | तपस्याओं के द्वारा |
| उग्रैः | उग्र (कठिन) |
| एवम्-रूपः | इस रूप वाला |
| शक्यः | संभव हूँ |
| अहम् | मैं |
| नृलोके | मनुष्य लोक में |
| द्रष्टुम् | देखे जाने के लिए |
| त्वत्-अन्येन | तुम्हारे अतिरिक्त अन्य किसी के द्वारा |
| कुरुप्रवीर | हे कुरुवंश के श्रेष्ठ वीर (अर्जुन) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| na | not |
| veda-yajña-adhyayanaiḥ | by study of the Vedas and sacrifices |
| na | not |
| dānaiḥ | by charity |
| na | not |
| ca | and |
| kriyābhiḥ | by rituals |
| na | not |
| tapobhiḥ | by penances |
| ugraiḥ | severe |
| evam-rūpaḥ | in this form |
| śakyaḥ | possible |
| aham | I |
| nṛloke | in the world of men |
| draṣṭum | to be seen |
| tvat-anyena | by anyone other than you |
| kurupravīra | O best among the Kuru warriors |