Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.45
मूल श्लोक :
अदृष्टपूर्वं हृषितोऽस्मि दृष्ट्वा भयेन च प्रव्यथितं मनो मे
तदेव मे दर्शय देव रूपं प्रसीद देवेश जगन्निवासHindi Translation By Swami Ramsukhdas
मैंने ऐसा रूप पहले कभी नहीं देखा। इस रूपको देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ और (साथहीसाथ) भयसे मेरा मन अत्यन्त व्यथित हो रहा है। अतः आप मुझे अपने उसी देवरूपको (सौम्य विष्णुरूपको) दिखाइये। हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होइये।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
प्रत्येक भक्त अपने इष्ट देवता के रूप में भगवान् से प्रेम करता है। जब उस आकार के द्वारा वह भगवान् के अनन्त? परात्पर? निराकार स्वरूप का साक्षात्कार करता है? तब निसन्देह वह परमानन्द का अनुभव करता है? किन्तु उसी क्षण वह भय से भी अभिभूत हो जाता है। अध्यात्म साधना करने वाले साधकों का प्रारम्भिक अवस्था में यही अनुभव होता है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि? साधना के फलस्वरूप प्राप्त आन्तरिक शान्ति परमानन्द दायक होती है? परन्तु अचानक साधक के मन में विचित्र भय समा जाता है? जो उसे पुन देहभाव को प्राप्त कराकर मन के विक्षेपों का कारण बनता है।आत्मानुभव के उदय पर यह परिच्छिन्न जीव अपने बन्धनों से मुक्त होकर? अदृष्टपूर्व आनन्दलोक में प्रवेश करता है? जहाँ वह अपनी ही विशालता और प्रभाव का अनुभव कर प्रसन्न हो जाता है। इसी बात को अर्जुन दर्शाता है कि ऐसे रूप को देखकर? जो मैंने पूर्व कभी देखा नहीं था? मैं हर्षित हो रहा हूँ। परन्तु प्रारम्भिक प्रयत्नों में एक साधक में यह सार्मथ्य नहीं होती कि वह अपने मन को दीर्घकाल तक वृत्तिशून्य स्थिति में रख सके। ध्यान में निश्चल प्रतीत हो रहा उसका मन पुन जाग्रत होकर क्रियाशील हो जाता है। साधकों का यह अनुभव है कि ऐसे समय मन में सर्वप्रथम जो वृत्ति उठती है वह भय की ही होती है। निराकार अनुभव से भयभ्ाीत होकर मन पुन शरीर भाव में स्थित हो जाता है। ऐसे अवसरों पर भक्तजन प्रेम और भक्ति के साथ अपने साकार इष्टदेव को अपने चंचल मन्दस्मित के रूप में व्यक्त होने के लिए प्रार्थना करते हैं। वे अपने इष्टदेव को पुन सस्मित और कोमल तथा प्रेमपूर्ण दृष्टि और संगीतमय शब्दों के साथ देखना चाहते हैं।अर्जुन श्रीकृष्ण को जिस रूप में देखना चाहता था? उसका वर्णन अगले श्लोक में करता है
English Translation By Swami Sivananda
I am delighted, having seen what has never been seen before; and yet my mind is distressed with fear. Show me that (previous) form only, O God; have mercy, O God of gods, O Abode of the universe.
Transliteration
adṛṣṭapūrvaṃ hṛṣito'smi dṛṣṭvā bhayena ca pravyathitaṃ mano me
tadeva me darśaya deva rūpaṃ prasīda deveśa jagannivāsaअनुवाद
पहले कभी न देखे गए इस रूप को देखकर मैं हर्षित हो रहा हूँ, और मेरा मन भय से अत्यंत व्याकुल भी हो रहा है। हे देव! मुझे अपना वही (सौम्य) रूप दिखाइए। हे देवेश! हे जगन्निवास! प्रसन्न होइए।
भावार्थ
अर्जुन भगवान कृष्ण के अत्यंत विराट और अद्भुत विश्वरूप को देखकर अत्यंत हर्षित हैं क्योंकि ऐसा रूप पहले किसी ने नहीं देखा था। परंतु साथ ही, उस रूप की उग्रता और असीमित शक्ति को देखकर उनका मन भयभीत और व्याकुल भी हो रहा है। इसलिए वे भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे अपने सौम्य, चतुर्भुज या द्विभुज रूप में लौट आएं और उन पर कृपा करें।
Translation
Beholding that which has never been seen before, I am rejoiced, and yet my mind is distressed with fear. Show me, O Lord, only that former form of Yours; have mercy, O Lord of gods, O Abode of the universe.
Meaning
Arjuna is filled with joy upon witnessing the magnificent and unprecedented cosmic form of Lord Krishna. At the same time, the sheer scale and terrifying aspect of this infinite form cause his mind to tremble with fear. Consequently, he begs the Lord to return to His familiar, gentle form and show His grace as the protector of the universe.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अदृष्ट-पूर्वम् | जो पहले कभी न देखा गया हो |
| हृषितः | हर्षित (रोमांचित) |
| अस्मि | हूँ |
| दृष्ट्वा | देखकर |
| भयेन | भय से |
| च | और |
| प्रव्यथितम् | अत्यंत व्याकुल |
| मनः | मन |
| मे | मेरा |
| तत् | वह |
| एव | ही |
| मे | मुझको |
| दर्शय | दिखाइए |
| देव | हे देव |
| रूपम् | रूप |
| प्रसीद | प्रसन्न होइए |
| देवेश | हे देवों के स्वामी |
| जगन्निवास | हे ब्रह्मांड के आश्रय |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| adṛṣṭa-pūrvam | never seen before |
| hṛṣitaḥ | gladdened / rejoiced |
| asmi | I am |
| dṛṣṭvā | having seen |
| bhayena | with fear |
| ca | and |
| pravyathitam | distressed / trembling |
| manaḥ | mind |
| me | my |
| tat | that |
| eva | only |
| me | to me |
| darśaya | show |
| deva | O Lord |
| rūpam | form |
| prasīda | be gracious / have mercy |
| deveśa | O Lord of gods |
| jagannivāsa | O Abode of the universe |