Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.44
मूल श्लोक :
तस्मात्प्रणम्य प्रणिधाय कायं प्रसादये त्वामहमीशमीड्यम्
पितेव पुत्रस्य सखेव सख्युः प्रियः प्रियायार्हसि देव सोढुम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
इसलिये शरीरसे लम्बा पड़कर स्तुति करनेयोग्य आप ईश्वरको मैं प्रणाम करके प्रसन्न करना चाहता हूँ। जैसे पिता पुत्रके? मित्र मित्रके और पति पत्नीके अपमानको सह लेता है? ऐसे ही हे देव आप मेरे द्वारा किया गया अपमान सहनेमें समर्थ हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अर्जुन स्वयं को सर्वशक्तिमान भगवान् के समक्ष पाकर अपने में वाक्कौशल और तर्क करने की सूक्ष्म क्षमता को व्यक्त हुआ पाता है। यद्यपि हिन्दुओं में पूजनीय व्यक्ति का चरणस्पर्श करके अभिवादन किया जाता है? जो कि शारीरिक कर्म है किन्तु उसका जो वास्तविक अभिप्राय है उसे हृदय के आन्तरिक भाव के रूप में प्राप्त करना होता है। अहंकार के समर्पण के द्वारा आध्यात्मिक उन्नति को प्राप्त करना ही वास्तविक प्रणाम या साष्टांग प्रणिपात है। अनात्म जड़ उपाधियों के साथ तादात्म्य से उत्पन्न अहंकार और तत्केन्द्रित मिथ्या कल्पनाओं के कारण अपने ही हृदयस्थ आत्मा का हमें साक्षात् अनुभव नहीं हो पाता है। जिस मात्रा में ये मिथ्या धारणाएं नष्ट हो जाती हैं? उस्ाी मात्रा में निश्चित ही? हम आत्मा के शान्त सौन्दर्य का अनुभव कर सकते हैं जो हमारा शुद्ध स्वरूप ही है। वास्तव में देखा जाये? तो अहंकार के इस समर्पण में हम अपनी अशुद्ध पाशविक वासनाओं की उस गठरी को ही अर्पित कर रहे होते हैं? जो हमारी मूढ़ता और कामुकता के कारण दुर्गन्धित होती हैअत स्वाभाविक है कि? जब कोई भक्त? भक्ति और प्रपत्ति की भावना से भगवान् के चरणों के समीप पहुँचता है? तो अपनी अशुद्धियों के लिए क्षमा याचना करता है।यहाँ अर्जुन भगवान् से अनुरोध करता है कि वे उसके किए अपराधों को ऐसे ही सहन करे? जैसे पिता पुत्र के? मित्र अपने मित्र के? प्रिय अपने प्रिया के अपराधों को सहन करता है। इन तीन उदाहरणों में वे सब घृष्टतापूर्ण अपराध सम्मिलित हो जाते हैं? जो एक मनुष्य अज्ञानवश अपने प्रभु भगवान् के प्रति कर सकता है।अर्जुन भगवान् से सामान्य रूप धारण करने तथा इस सर्वातीत? सार्वभौमिक भयंकर रूप का त्याग करने के लिए प्रार्थना करता है
English Translation By Swami Sivananda
Therefore, bowing down, prostrating my body, I crave Thy forgiveness, O adorable Lord. As a father forgives his son, a friend his (dear) friend, a lover his beloved, even so shouldst Thou
forgive me, O God.
Transliteration
tasmāt praṇamya praṇidhāya kāyaṃ prasādaye tvām aham īśam īḍyam
piteva putrasya sakheva sakhyuḥ priyaḥ priyāyārhasi deva soḍhumअनुवाद
इसलिए मैं शरीर को साष्टांग दण्डवत प्रणाम करके, आपके चरणों में झुकाकर, आप पूजनीय ईश्वर को प्रसन्न करना चाहता हूँ। हे देव! जिस प्रकार पिता अपने पुत्र के, मित्र अपने मित्र के, और पति अपनी प्रियतमा के अपराधों को सहन कर लेता है, उसी प्रकार आप भी मेरे अपराधों को सहन करने के योग्य हैं।
भावार्थ
अर्जुन भगवान कृष्ण के विश्वरूप के दर्शन करके अत्यंत विस्मित और भयभीत हैं। वे अपनी पूर्व की अनजाने में की गई भूलों के लिए क्षमा मांग रहे हैं। वे भगवान से प्रार्थना करते हैं कि वे उनके अपराधों को उसी प्रकार क्षमा कर दें जैसे एक पिता, मित्र या प्रेमी अपने प्रियजनों के अपराधों को सहज ही क्षमा कर देते हैं।
Translation
Therefore, bowing down and prostrating my body, I seek to please You, the adorable Lord. As a father forgives his son, a friend his friend, and a lover his beloved, so should You, O Lord, forgive me.
Meaning
Arjuna is deeply awed and humbled after witnessing the cosmic form of Lord Krishna. He begs for forgiveness for any past familiarity or unintentional disrespect. He appeals to Krishna’s grace, asking Him to tolerate his faults just as a father, a dear friend, or a lover forgives the mistakes of their loved ones.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तस्मात् | इसलिए |
| प्रणम्य | प्रणाम करके |
| प्रणिधाय | दण्डवत झुकाकर |
| कायम् | शरीर को |
| प्रसादये | प्रसन्न करने की प्रार्थना करता हूँ |
| त्वाम् | आपको |
| अहम् | मैं |
| ईशम् | ईश्वर को |
| ईड्यम् | पूजनीय |
| पिता | पिता |
| इव | की भाँति |
| पुत्रस्य | पुत्र के |
| सखा | मित्र |
| इव | की भाँति |
| सख्युः | मित्र के |
| प्रियः | प्रियतम |
| प्रियायाः | प्रियतमा के |
| अर्हसि | आप योग्य हैं |
| देव | हे देव |
| सोढुम् | सहन करने के |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| tasmāt | therefore |
| praṇamya | bowing down |
| praṇidhāya | prostrating |
| kāyam | the body |
| prasādaye | I seek to please |
| tvām | You |
| aham | I |
| īśam | the Lord |
| īḍyam | adorable |
| pitā | a father |
| iva | as |
| putrasya | of a son |
| sakhā | a friend |
| iva | as |
| sakhyuḥ | of a friend |
| priyaḥ | a lover |
| priyāyāḥ | of the beloved |
| arhasi | You ought |
| deva | O Lord |
| soḍhum | to forgive / tolerate |