श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग

Bhagavad Gita 11.42

मूल श्लोक :

यच्चावहासार्थमसत्कृतोऽसि    विहारशय्यासनभोजनेषु
एकोऽथवाप्यच्युत तत्समक्षं    तत्क्षामये त्वामहमप्रमेयम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

आपकी महिमा और स्वरूपको न जानते हुए मेरे सखा हैं ऐसा मानकर मैंने प्रमादसे अथवा प्रेमसे हठपूर्वक (बिना सोचेसमझे) हे कृष्ण हे यादव हे सखे इस प्रकार जो कुछ कहा है और हे अच्युत  हँसीदिल्लगीमें? चलतेफिरते? सोतेजागते? उठतेबैठते? खातेपीते समयमें अकेले अथवा उन सखाओं? कुटुम्बियों आदिके सामने मेरे द्वारा आपका जो कुछ तिरस्कार किया गया है? वह सब अप्रमेयस्वरूप आपसे मैं क्षमा करवाता हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

जब कोई सामान्य व्यक्ति अकस्मात् ही परमात्मा के महात्म्य का परिचय पाता है? तब उसके मन में जिन भावनाओं का निश्चित रूप से उदय होता है? उन्हें इन दो सुन्दर श्लोकों के द्वारा नाटकीय यथार्थता के साथ सामने लाया गया है। अब तक अर्जुन? भगवान् श्रीकृष्ण को एक बुद्धिमान् गोपाल से अधिक कुछ नहीं समझता था? जिसे उसने बड़ी उदारता से अपनी राजमैत्री का आश्रय लाभ दिया था। परन्तु? अब श्रीकृष्ण के अनन्तस्वरूप का वास्तविक परिचय पाकर अर्जुन में स्थित जीवभाव उनके समक्ष दृढ़ निष्ठा एवं सम्मान के साथ प्रणिपात करके उनसे दया और क्षमा की याचना करता है।इन दो श्लोकों में अत्यन्त घनिष्ठता का स्पर्श है। यहाँ बौद्धिक दार्शनिक चिन्तन का घनिष्ठ परिचय के भावुक पक्ष के साथ सुन्दर संयोग हुआ है। गीता का प्रयोजन ही यह है कि वेद प्रतिपादित सत्यों की सुमधुर ध्वनि का व्यावहारिक जगत् की सुखद लय के साथ मिलन कराया जाये। घनिष्ठ परिचय के इन भावुक स्पर्शों के द्वारा व्यासजी की कुशल लेखनी? वेदान्त के विचारोत्तेजक महान् सत्यों को? अचानक? अपने घर की बैठक में होने वाले वार्तालाप के परिचित वातावरण में ले आती है। एक घनिष्ठ मित्र के रूप में प्रमाद या प्रेमवश अर्जुन ने भगवान् श्रीकृष्ण की महिमा को न जानते हुए उन्हें प्रिय नामों से सम्बोधित किया होगा? जिसके लिए उनसे अब्ा वह क्षमायाचना करता है।क्योंकि

English Translation By Swami Sivananda

In whatever way I may have insulted Thee for the sake of fun, while at play, reposing, sitting or at meals, when alone (with Thee), O Krishna, or in company  that I implore Thee, immeasurable one, to forgive.

Transliteration

yaccāvahāsārthamasatkṛto'si vihāraśayyāsanabhojaneṣu
eko'thavāpyacyuta tatsamakṣaṃ tatkṣāmaye tvāmahamaprameyam

अनुवाद

और परिहास के लिए विहार, शय्या, आसन और भोजन आदि में अकेले अथवा उन मित्रों के सामने जो भी आपका अनादर हुआ है, हे अच्युत! उस सब के लिए मैं आपसे क्षमा माँगता हूँ, जो कि अप्रमेय (अचिन्त्य प्रभाव वाले) हैं।

भावार्थ

अर्जुन भगवान कृष्ण के विराट रूप को देखकर भयभीत और विस्मित हैं। वे अतीत में अपनी अज्ञानतावश की गई गलतियों के लिए क्षमा याचना कर रहे हैं, जब उन्होंने कृष्ण को केवल एक साधारण मित्र मानकर उनके साथ हँसी-मजाक किया था या उनका अनादर किया था।

Translation

And for whatever disrespect was shown to You in jest, while playing, reposing, sitting, or eating, either alone or in the presence of others, O Achyuta (Infallible One), I crave forgiveness from You, who are immeasurable.

Meaning

Arjuna, overwhelmed by the majestic and terrifying cosmic form of Lord Krishna, seeks forgiveness for his past familiar behavior. He regrets treating the Supreme Lord as a mere human friend and asks for pardon for any disrespect shown during casual moments of recreation, resting, sitting, or dining.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यत्जो
चऔर
अवहास-अर्थम्परिहास या मजाक के लिए
असत्कृतःअनादृत (तिरस्कृत)
असिआप हुए हैं
विहारविहार (खेलने-घूमने)
शय्याशय्या (सोने)
आसनआसन (बैठने)
भोजनेषुऔर भोजन के समय में
एकःअकेले में
अथवाया
अपिभी
अच्युतहे अच्युत (अविनाशी)
तत्-समक्षम्उन (मित्रों) के सामने
तत्उस सबके लिए
क्षामयेक्षमा माँगता हूँ
त्वाम्आपसे
अहम्मैं
अप्रमेयम्अचिन्त्य प्रभाव वाले (अप्रमेय)

Word by word

WordMeaning
yatwhatever
caand
avahāsa-arthamfor the purpose of joke
asatkṛtaḥdishonored
asiyou have been
vihārain sporting
śayyāin resting
āsanain sitting
bhojaneṣuor in dining
ekaḥalone
athavāor
apieven
acyutaO Infallible One
tat-samakṣamin the presence of those (friends)
tatfor all that
kṣāmayeask forgiveness
tvāmfrom You
ahamI
aprameyamwho are immeasurable