Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.38
मूल श्लोक :
त्वमादिदेवः पुरुषः पुराण स्त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
वेत्तासि वेद्यं च परं च धाम त्वया ततं विश्वमनन्तरूपHindi Translation By Swami Ramsukhdas
आप ही आदिदेव और पुराणपुरुष हैं तथा आप ही इस संसारके परम आश्रय हैं। आप ही सबको जाननेवाले? जाननेयोग्य और परमधाम हैं। हे अनन्तरूप आपसे ही सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
आदिदेव आत्मा ही आदिकर्ता है। चैतन्यस्वरूप आत्मा से ही सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी की उत्पत्ति हुई है। समष्टि मन और बुद्धि से अविच्छिन्न (मर्यादित? सीमित) आत्मा ही ब्रह्माजी कहलाता है।विश्व के परम आश्रय सम्पूर्ण विश्व परमात्मा में निवास करता है? इसलिए उसे यहाँ विश्व का परम आश्रय कहा गया है। जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है? विश्व शब्द से केवल स्थूल जगत् ही नहीं समझना चाहिए? वरन् पूर्व श्लोक में वर्णित सत् और असत् (व्यक्त और अव्यक्त) का सम्मिलित रूप ही विश्व कहलाता है।विश्व शब्द को इस प्रकार समझ लेने पर वेदान्त के विद्यार्थियों को इस जीवन का सम्पूर्ण अर्थ समझने में कोई कठिनाई नहीं होगी। हम शरीर? मन और बुद्धि की जड़ उपाधियों के द्वारा जगत् का अनुभव करते हैं। ये स्वत जड़ होने के कारण उनमें अपना चैतन्य नहीं है। आत्म चैतन्य के सम्बन्ध से ही वे चेतनवत् व्यवहार करने में सक्षम होती हैं।वस्तुत? इन जड़ पदार्थों अथवा उपाधियों की उत्पत्ति आत्मा से नहीं हो सकती? क्योंकि आत्मा अविकारी है। हम यह भी नहीं कह सकते कि जड़ जगत् की उत्पत्ति किसी अन्य स्वतन्त्र कारण से हुई है? क्योंकि आत्मा ही सर्वव्यापी? एकमेव अद्वितीय सत्य है। इसलिए? वेदान्त में कहा गया है कि यह विश्व परम सत्य ब्रह्म पर अध्यस्त (अध्यारोपित) है? जैसे भ्रान्तिकाल में प्रेत स्तम्भ में अध्यस्त होता है। इस प्रकार की भ्रान्ति में? वह स्तम्भ ही प्रेत और उसकी गति का तथा उससे उत्पन्न हुई प्रतिक्रियायों का विधान कहलायेगा। वस्तुत? स्तम्भ के अतिरिक्त भूत का कोई अस्तित्व या सत्यत्व नहीं है। इसी प्रकार यहाँ अर्जुन परमात्मा का निर्देश अत्यन्त सुन्दर प्रकार से विश्व के विधान कहकर करता है।आप ज्ञाता और ज्ञेय हैं चैतन्य ही वह तत्त्व है? जो हमारे अनुभवों को सत्यत्व प्रदान करता है। चैतन्य से प्रकाशित हुए बिना इस जड़ जगत् का ज्ञान सम्भव नहीं होता? इसलिए यहाँ चैतन्यस्वरूप भगवान् श्रीकृष्ण को ज्ञाता कहा गया है। आत्म साक्षात्कार हेतु उपदिष्ट सभी साधनाओं की प्रक्रिया यह है कि इन्द्रियादि के द्वारा विचलित होने वाला मन का ध्यान बाह्य विषयों से निवृत्त कर उसे आत्मस्वरूप में स्थिर किया जाय। जब यह मन वृत्तिशून्य हो जाता है? तब शुद्ध चैतन्य स्वरूप आत्मा का साक्षात् अनुभवगम्य बोध होता है। इसलिए आत्मा को यहाँ वेद्य अर्थात् जानने योग्य तत्त्व कहा गया है।सम्पूर्ण विश्व आपके द्वारा व्याप्त है जैसे समस्त मिष्ठानों में मधुरता व्याप्त है या तरंगों में जल व्याप्त है? वैसे ही विश्व में परमात्मा व्याप्त है। अभी कहा गया था कि अधिष्ठान के अतिरिक्त अध्यस्त वस्तु का कोई अस्तित्व नहीं होता। आत्मा ही वह अधिष्ठान है? जिस पर यह नानाविश्व सृष्टि की प्रतीति हो रही है। इसलिए यहाँ उचित ही कहा गया है कि आपके द्वारा यह विश्व व्याप्त है। यह केवल उपनिषद् प्रतिपादित उस सत्य की ही पुनरुक्ति है कि अनन्त ब्रह्म सबको व्याप्त करता है? परन्तु उसे कोई व्याप्त नहीं कर सकता है।
English Translation By Swami Sivananda
Thou art the primal God, the ancient Purusha, the supreme refuge of this universe, the knower, the knowable and the supreme Abode. By Thee is the universe pervaded, O Being of infinite forms.
Transliteration
tvamādidevaḥ puruṣaḥ purāṇa- stvamasya viśvasya paraṁ nidhānam
vettāsi vedyaṁ ca paraṁ ca dhāma tvayā tataṁ viśvamanantarūpaअनुवाद
आप आदिदेव और सनातन पुरुष हैं, आप इस संसार के परम आश्रय हैं। आप जानने वाले हैं, जानने योग्य हैं और परम धाम हैं। हे अनन्तरूप! आपसे यह सम्पूर्ण संसार व्याप्त है।
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण के विराट रूप की स्तुति करते हुए उन्हें सृष्टि का आदि कारण और परम आश्रय बताते हैं। वे कृष्ण को सर्वज्ञ (जानने वाला) और परम प्राप्य लक्ष्य (जानने योग्य) के रूप में स्वीकार करते हैं। अर्जुन यह अनुभव करते हैं कि यह अनंत रूपों वाला संसार पूर्णतः भगवान से ही व्याप्त और संचालित है।
Translation
You are the primal Deity, the ancient Purusha; You are the supreme refuge of this universe. You are the knower, the knowable, and the supreme abode. O Lord of infinite forms, the universe is pervaded by You.
Meaning
In this verse, Arjuna praises Lord Krishna’s cosmic form, recognizing Him as the original deity and the primeval soul. He acknowledges Krishna as the ultimate refuge of the universe, the knower of all, the object of all knowledge, and the supreme destination. Arjuna realizes that the entire cosmos, with its infinite forms, is pervaded by the Lord’s divine presence.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| त्वम् | आप |
| आदिदेवः | प्रथम देवता (आदिदेव) |
| पुरुषः | पुरुष |
| पुराणः | सनातन / प्राचीन |
| त्वम् | आप |
| अस्य | इस |
| विश्वस्य | संसार के |
| परम् | परम |
| निधानम् | आश्रयस्थान |
| वेत्ता | जानने वाले |
| असि | हैं |
| वेद्यम् | जानने योग्य |
| च | और |
| परम् | परम |
| च | और |
| धाम | धाम (स्थान) |
| त्वया | आपके द्वारा |
| ततम् | व्याप्त है |
| विश्वम् | संसार |
| अनन्तरूप | हे अनंत रूपों वाले |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| tvam | you |
| ādidevaḥ | the primal God |
| puruṣaḥ | the personality / soul |
| purāṇaḥ | ancient |
| tvam | you |
| asya | of this |
| viśvasya | universe |
| param | supreme |
| nidhānam | refuge / resting place |
| vettā | the knower |
| asi | you are |
| vedyam | the knowable (what is to be known) |
| ca | and |
| param | the supreme |
| ca | and |
| dhāma | abode |
| tvayā | by you |
| tatam | pervaded |
| viśvam | the universe |
| anantarūpa | O Lord of infinite forms |