Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.37
मूल श्लोक :
कस्माच्च ते न नमेरन्महात्मन् गरीयसे ब्रह्मणोऽप्यादिकर्त्रे
अनन्त देवेश जगन्निवास त्वमक्षरं सदसत्तत्परं यत्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे महात्मन् गुरुओंके भी गुरु और ब्रह्माके भी आदिकर्ता आपके लिये (वे सिद्धगण) नमस्कार क्यों नहीं करें क्योंकि हे अनन्त हे देवेश हे जगन्निवास आप अक्षरस्वरूप हैं आप सत् भी हैं? असत् भी हैं,और सत्असत्से पर भी जो कुछ है? वह भी आप ही हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
वे सिद्ध संघ आपको नमस्कार कैसे नहीं करें क्योंकि आप तो सृष्टिकर्ता ब्रह्माजी के भी आदिकर्त्ता हैं। आदिकारण वह है जो सम्पूर्ण कार्यजगत् को व्याप्त करके समस्त नाम और रूपों को धारण करता है? जैसे घटों का कारण मिट्टी और आभूषणों का कारण स्वर्ण है। अनन्तस्वरूप परमात्मा न केवल यह विश्व है? बल्कि समस्त देवों का ईश्वर भी है? क्योंकि उसी सर्वशक्तिमान् परमात्मा से समस्त देवताओं को तथा प्राकृतिक शक्तियों को सार्मथ्य प्राप्त होती है।इस चराचर जगत् को दो भागों सत् और असत् में विभाजित किया जा सकता है। यहाँ सत् शब्द से अर्थ उन वस्तुओं से है? जो इन्द्रिय? मन और बुद्धि के द्वारा जानी जा सकती हैं? अर्थात् जो स्थूल और सूक्ष्म रूप में व्यक्त हैं। स्थूल विषय? भावनाएं और विचार व्यक्त (सत्) कहलाते हैं। इस व्यक्त का जो कारण है? उसे असत् अर्थात् अव्यक्त कहते हैं। व्यक्ति की जीवन पद्धति को नियन्त्रित करने वाला यह अव्यक्त कारण उस व्यक्ति के संस्कार या वासनाएं ही हैं। यहाँ परमात्मा की दी हुई परिभाषा के अनुसार वह सत् और असत् दोनों ही है। और वह इन दोनों से परे भी है।आप इनसे परे भी हैं नाट्यगृह के रंगमंच पर हो रहा नाटक सुखान्त अथवा दुखान्त हो सकता है? परन्तु उन्हें प्रकाशित करने वाला प्रकाश उन दोनों से ही परे होता है। अंगूठी और कण्ठी ये दोनों? निसन्देह स्वर्ण के बने हैं? किन्तु स्वर्ण की परिभाषा यह नहीं दी जा सकती है कि वह अंगूठी या कण्ठी है। वह ये दोनों आभूषण तो हैं ही? परन्तु इन दोनों से परे भी है। इस दृष्टि से? समस्त नामरूपों का सारतत्त्व होने से परमात्मा व्यक्त और अव्यक्त दोनों ही है और अपने स्वरूप की दृष्टि से इन दोनों से परे अक्षर स्वरूप है। वह? अक्षरतत्त्व चैतन्य स्वरूप है? जो स्थूल और सूक्ष्म दोनों का ही प्रकाशक है। इसी अक्षर ने ही यह विराट्रूप धारण किया है? जिसकी स्तुति अर्जुन कर रहा है।प्रस्तुत खण्ड? विश्व के सभी धर्मों में उपलब्ध सार्वभौमिक प्रार्थनाओं का प्रतिनिधित्व करता है। किसी भी धर्म या जाति के लोगों को इसके प्रति कोई आक्षेप नहीं हो सकता? क्योंकि सनातन सत्य के विषय में जो कुछ भी प्रतिपादित सिद्धांत है? उसका ही सार यह खण्ड है। यह भक्त के हृदय को प्राय अप्रमेय की सीमा तक ऊँचा उठा सकता है। भक्त उसे साक्षात् अनुभव कर सकता है। अर्जुन भगवान् की स्तुति करते हुए कहता है
English Translation By Swami Sivananda
And why should they not, O great Soul, bow to Thee Who art greater (than all else), the primal cause even of the Creator (Brahma), O Infinite Being, O Lord of the gods, O Abode of the universe; Thou art the imperishable, the Being, the non-being and That which is the supreme (that which is beyond the Being and the non-being).
Transliteration
kasmācca te na nameranmahātman garīyase brahmaṇo'pyādikartre
ananta deveśa jagannivāsa tvamakṣaraṃ sadasattatparaṃ yatअनुवाद
और हे महात्मन! वे आपको नमस्कार क्यों न करें? आप ब्रह्मा के भी आदि-कर्ता और उनसे भी श्रेष्ठ हैं। हे अनन्त! हे देवेश! हे जगन्निवास! आप ही अक्षर (अविनाशी) हैं, सत् और असत् तथा उनसे परे जो परम तत्त्व है, वह भी आप ही हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप की महिमा का गान कर रहे हैं। वे कहते हैं कि सृष्टि के रचयिता ब्रह्मा जी के भी आदि-कारण होने के कारण सभी को भगवान के सम्मुख नतमस्तक होना ही चाहिए। भगवान ही सत् (व्यक्त), असत् (अव्यक्त) और इन दोनों से परे परम अक्षर ब्रह्म हैं।
Translation
And why should they not bow down to You, O Great Soul? You are greater even than Brahma, the original creator. O Infinite One, O Lord of the devas, O Refuge of the universe! You are the imperishable, the being, the non-being, and that which is beyond both.
Meaning
In this verse, Arjuna glorifies the cosmic form of Lord Krishna, explaining why the entire universe bows to Him. Since Krishna is the original creator of even Brahma (the secondary creator), He is the ultimate source of everything. He is described as the imperishable reality, encompassing both existence (sat) and non-existence (asat), as well as the supreme transcendental truth beyond them.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| कस्मात् | किस कारण से |
| च | और |
| ते | वे (सब) |
| न | नहीं |
| नमेरन् | नमस्कार करें |
| महात्मन् | हे महात्मन् |
| गरीयसे | गुरुतर / श्रेष्ठतर के लिए |
| ब्रह्मणः | ब्रह्मा के |
| अपि | भी |
| आदिकर्त्रे | आदि-रचयिता के लिए |
| अनन्त | हे अनन्त |
| देवेश | हे देवों के स्वामी |
| जगन्निवास | हे ब्रह्मांड के आश्रय |
| त्वम् | आप |
| अक्षरम् | अविनाशी |
| सत् | सत् (व्यक्त) |
| असत् | असत् (अव्यक्त) |
| तत्-परम् | उससे परे |
| यत् | जो |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| kasmāt | why |
| ca | and |
| te | they |
| na | not |
| nameran | should bow down |
| mahātman | O Great Soul |
| garīyase | to the one who is greater |
| brahmaṇaḥ | than Brahma |
| api | even |
| ādikartre | to the original creator |
| ananta | O Infinite One |
| deveśa | O Lord of the gods |
| jagannivāsa | O Refuge of the universe |
| tvam | You |
| akṣaram | the imperishable |
| sat | being (manifest) |
| asat | non-being (unmanifest) |
| tat-param | beyond that |
| yat | which |