श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग

Bhagavad Gita 11.32

मूल श्लोक :

श्री भगवानुवाच
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो     लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः
ऋतेऽपि त्वां न भविष्यन्ति सर्वे      येऽवस्थिताः प्रत्यनीकेषु योधाः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

श्रीभगवान् बोले -- मैं सम्पूर्ण लोकोंका क्षय करनेवाला बढ़ा हुआ काल हूँ और इस समय मैं इन सब लोगोंका संहार करनेके लिये यहाँ आया हूँ। तुम्हारे प्रतिपक्षमें जो योद्धालोग खड़े हैं? वे सब तुम्हारे युद्ध किये बिना भी नहीं रहेंगे।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

किसी वस्तु की एक अवस्था का नाश किये बिना उसका नवनिर्मांण नहीं हो सकता। निरन्तर नाश की प्रक्रिया से ही जगत् का निर्माण होता है। बीते हुये काल के शवागर्त से ही वर्तमान आज की उत्पत्ति हुई है। इस रचनात्मक विनाश के पीछे जो शक्ति दृश्य रूप में कार्य कर रही है वही मूलभूत शक्ति है जो प्राणियों के जीवन के ऊपर शासन कर रही है। भगवान् श्रीकृष्ण यहाँ स्वयं का परिचय लोक संहारक महाकाल के रूप में कराते हैं। इस रूप को धारण करने का उनका प्रयोजन उस पीढ़ी को नष्ट करना है? जो अपने जीवन लक्ष्य के सम्बन्ध में विपरीत धारणाएं तथा दोषपूर्ण जीवन मूल्यों को रखने के कारण जीर्णशीर्ण हो गई है।भगवान् का लोकसंहारकारी भाव उनके लोककल्याणकारी भाव का विरोधी नहीं है। कभीकभी विनाश करने में दया ही होती है। एक टूटे हुए पुल को या जीर्ण बांध को अथवा प्राचीन इमारत को तोड़ना उक्त बात के उदाहरण हैं। उन्हें तोड़कर गिराना दया का ही एक कार्य है? जो कोई भी विचारशील शासन समाज के लिए कर सकता है। यही सिद्धांत यहाँ पर लागू होता है।इस उग्र रूप को धारण करने में भगवान् का उद्देश्य उन समस्त नकारात्मक शक्तियों का नाश करना है जो राष्ट्र के सांस्कृतिक जीवन को नष्ट करने पर तुली हुई हैं। भगवान् के इस कथन से अर्जुन के विजय की आशा विश्वास में परिवर्तित हो जाती है। परन्तु भगवान् इस बात को भी स्पष्ट कर देते हैं कि पुनर्निर्माण के इस कार्य को करने के लिए वे किसी एक व्यक्ति या समुदाय पर आश्रित नहीं है। इस कार्य को करने में एक अकेला काल ही समर्थ है। वही समाज में इस पुनरुत्थान और पुनर्जीवन को लायेगा। सार्वभौमिक पुनर्वास के इस अतिविशाल कार्य में व्यष्टि जीवमात्र भाग्य के प्राणी हैं। उनके होने या नहीं होने पर भी काल की योजना निश्चित ही काय्ार्ान्वित होकर रहेगी। राष्ट्र के लिए यह पुनर्जीवन आवश्यक है मानव के पुनर्वास की मांग जगत् की है। भगवान् स्पष्ट कहते हैं कि? तुम्हारे बिना भी इन भौतिकवादी योद्धाओं में से कोई भी इस निश्चित विनाश में जीवित नहीं रह पायेगा।महाभारत की कथा के सन्दर्भ में? भगवान् के कथन का यह तात्पर्य स्पष्ट होता है कि कौरव सेना तो काल के द्वारा पहले ही मारी जा चुकी है? और पुनरुत्थान की सेना के साथ सहयोग करके अर्जुन? निश्चित सफलता का केवल साथ ही दे रहा है।इसलिए सर्वकालीन मनुष्य के प्रतिनिधि अर्जुन को यह उपदेश दिया जाता है कि वह निर्भय होकर अपने जीवन में कर्तव्य का पालन करे।

English Translation By Swami Sivananda

The Blessed Lord said  I am the full-grown world-destroying Time, now engaged in destroying the worlds. Even without thee, none of the warriors arrayed in the hostile armies shall live.

Transliteration

śrī-bhagavān uvāca
kālo'smi lokakṣayakṛt pravṛddho lokān samāhartum iha pravṛttaḥ
ṛte'pi tvāṁ na bhaviṣyanti sarve ye'vasthitāḥ pratyanīkeṣu yodhāḥ

अनुवाद

श्री भगवान ने कहा — मैं लोकों का नाश करने वाला महाकाल हूँ, जो इस समय लोकों को नष्ट करने के लिए प्रवृत्त हुआ हूँ। तुम्हारे (युद्ध न करने पर) भी, प्रतिपक्षी सेनाओं में स्थित ये सभी योद्धा जीवित नहीं बचेंगे।

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन को अपने विश्वरूप के भयानक संहारक रूप का परिचय देते हैं। वे स्पष्ट करते हैं कि वे काल (समय) हैं जो सब कुछ नष्ट कर देता है। अर्जुन युद्ध करे या न करे, विपक्ष की सेना में खड़े सभी योद्धाओं की मृत्यु पहले ही निश्चित हो चुकी है।

Translation

The Supreme Lord said: I am mighty Time, the destroyer of the worlds, now engaged here in wiping out the world. Even without you, none of all these warriors arrayed in the opposing armies shall survive.

Meaning

In this verse, Lord Krishna reveals His identity as all-destroying Time (Kala) in His cosmic form. He explains that the destruction of the warriors assembled on the battlefield is already predestined by cosmic order. Even if Arjuna chooses not to fight, none of the soldiers in the opposing armies will escape death.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
śrī-bhagavān uvācaश्री भगवान ने कहा
kālaḥकाल (समय/मृत्यु)
asmiमैं हूँ
loka-kṣaya-kṛtलोकों का नाश करने वाला
pravṛddhaḥअत्यंत बढ़ा हुआ (महाकाल)
lokānलोकों को
samāhartumनष्ट करने के लिए
ihaइस संसार में
pravṛttaḥप्रवृत्त हुआ हूँ
ṛteबिना
apiभी
tvāmतुम्हारे
naनहीं
bhaviṣyantiजीवित रहेंगे
sarveसभी
yeजो
avasthitāḥखड़े हैं
pratyanīkeṣuविपक्षी सेनाओं में
yodhāḥयोद्धा

Word by word

WordMeaning
śrī-bhagavān uvācathe Supreme Lord said
kālaḥtime
asmiI am
loka-kṣaya-kṛtthe destroyer of the worlds
pravṛddhaḥmighty / grown great
lokānthe worlds
samāhartumto destroy / to swallow up
ihahere
pravṛttaḥengaged
ṛtewithout
apieven
tvāmyou
nanot
bhaviṣyantiwill remain / will survive
sarveall
yewho
avasthitāḥarrayed / stationed
pratyanīkeṣuin the opposing armies
yodhāḥwarriors