Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.31
मूल श्लोक :
आख्याहि मे को भवानुग्ररूपो नमोऽस्तु ते देववर प्रसीद
विज्ञातुमिच्छामि भवन्तमाद्यं न हि प्रजानामि तव प्रवृत्तिम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
मुझे यह बताइये कि उग्ररूपवाले आप कौन हैं हे देवताओंमें श्रेष्ठ आपको नमस्कार हो। आप प्रसन्न होइये। आदिरूप आपको मैं तत्त्वसे जानना चाहता हूँ क्योंकि मैं आपकी प्रवृत्तिको नहीं जानता।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
इस अवसर पर अर्जुन? भगवान् श्रीकृष्ण की शक्ति की पवित्रता एवं दिव्यता को समझ पाता है। उससे अनुप्रमाणित हुआ सम्मान के साथ नतमस्तक होकर उन्हें प्रणाम करता है? जिन्हें अब तक वह केवल वृन्दावन के गोपाल के रूप में ही पहचानता था। यद्यपि वह बुद्धिमान था? परन्तु उसके समक्ष उपस्थित हुआ यह दृश्य उसके लिए बहुत अधिक विशाल था। उसे पूर्णरूप से देखना और उसका विश्लेषण करके उसे आत्मसात् करना अत्यन्त कठिन था। अब केवल वह यही कर सकता है कि अपने आप को भगवान् के चरणों में समर्पित करके उन्हीं से विनती करे कि? आप मुझे बताइये कि आप कौन हैंअपनी जिज्ञासा को और अधिक ठोस आकार देकर अर्जुन सूचित करता है कि वह अपने प्रश्न का उत्तर शीघ्र ही चाहता है? मैं आपको जानना चाहता हूँ। यह सुविदित तथ्य है कि अध्यात्मशास्त्र के ग्रन्थों में सत्य के ज्ञान के लिए प्रखर जिज्ञासा को अत्यन्त महत्व का स्थान दिया गया है? क्योंकि वही वास्तव में साधकों की प्रेरणा होती है। परन्तु यहाँ अर्जुन का मन अपनी तात्कालिक समस्या या चुनौती के कारण व्याकुल था? इसलिये ऐसा नहीं कहा जा सकता है कि वह? वास्तव में? इस दृश्य के वास्तविक दिव्य सत्य को जानना चाहता है। उसकी यह जिज्ञासा अपनी भावनाओं से अतिरंजित है और उसके साथ ही उसमें युद्ध परिणाम को जानने की व्याकुलता भी है। यह बात्ा उसके इन शब्दों में स्पष्ट होती है कि? मैं आपके प्रयोजन को नहीं जान पा रहा हूँ। उसकी जिज्ञासा का अभिप्राय यह है कि? इस भयंकर रूप को धारण करके अर्जुन को कौरवों का विनाश दिखाने में भगवान् का क्या उद्देश्य है जब वह किसी घटना के घटने की तीव्रता से कामना कर रहा है और उसके समक्ष ऐसे लक्षण उपस्थित होते हैं? जो युद्ध में उसकी निश्चित विजय की भविष्यवाणी कर रहे हैं?तो वह दूसरों से उसकी पुष्टि चाहता है। यहाँ अर्जुन उसी घटना को देख रहा है? जिसे वह घटित होते देखना चाहता है अत वह स्वयं भगवान् के मुख से ही उसकी पुष्टि चाहता है। इसलिये उसका यह प्रश्न है।सत्य की ही एक अभिव्यक्ति है विनाश। भगवान् उसी रूप में अपना परिचय कराते हुए घोषणा करते हैं कि
English Translation By Swami Sivananda
Tell me, who Thou art, so fierce of form. Salutations to Thee, O God Supreme: have mercy. I desire to know Thee, the original Being. I know not indeed Thy working.
Transliteration
ākhyāhi me ko bhavānugrarūpo namo'stu te devavara prasīda
vijñātumiacchāmi bhavantamādyaṃ na hi prajānāmi tava pravṛttimअनुवाद
मुझे बताइए कि उग्र रूप वाले आप कौन हैं? हे देवश्रेष्ठ! आपको नमस्कार हो, प्रसन्न होइए। मैं आप आदिपुरुष को विशेष रूप से जानना चाहता हूँ, क्योंकि मैं आपकी चेष्टा को नहीं समझ पा रहा हूँ।
भावार्थ
भगवान श्रीकृष्ण के अत्यंत भयानक विश्वरूप को देखकर अर्जुन भयभीत हो जाते हैं और उनसे प्रार्थना करते हैं। वे भगवान से उनके इस संहारक रूप का रहस्य और उनके वास्तविक प्रयोजन को प्रकट करने की याचना कर रहे हैं। अर्जुन यह समझने में असमर्थ हैं कि इस महाविनाशकारी रूप के पीछे भगवान की क्या लीला है।
Translation
Tell me, who are you of this fierce form? Salutations to you, O Chief of Gods! Be gracious. I wish to know you, the Primal One, for I do not understand your activity.
Meaning
Terrified by the fierce, all-devouring cosmic form of Lord Krishna, Arjuna pleads for an explanation. He bows down to the Supreme Lord, asking Him to reveal His true identity and the purpose behind this destructive manifestation. Arjuna confesses his inability to comprehend the divine plan and activities of the Primal Being in this terrifying aspect.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| आख्याहि | बताइए |
| मे | मुझे |
| कः | कौन |
| भवान् | आप |
| उग्र-रूपः | उग्र रूप वाले |
| नमः | नमस्कार |
| अस्तु | हो |
| ते | आपको |
| देव-वर | हे देवश्रेष्ठ |
| प्रसीद | प्रसन्न होइए |
| विज्ञातुम् | विशेष रूप से जानने के लिए |
| इच्छामि | चाहता हूँ |
| भवन्तम् | आपको |
| आद्यम् | आदिपुरुष को |
| न | नहीं |
| हि | क्योंकि |
| प्रजानामि | मैं भली-भांति जानता हूँ |
| तव | आपकी |
| प्रवृत्तिम् | चेष्टा को या प्रवृत्ति को |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| ākhyāhi | tell |
| me | to me |
| kaḥ | who |
| bhavān | you |
| ugra-rūpaḥ | of fierce form |
| namaḥ | salutations |
| astu | let there be |
| te | unto you |
| deva-vara | O best of gods |
| prasīda | be gracious |
| vijñātum | to know |
| icchāmi | I wish |
| bhavantam | you |
| ādyam | the primal one |
| na | not |
| hi | indeed |
| prajānāmi | I understand |
| tava | your |
| pravṛttim | activity or purpose |