Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.30
मूल श्लोक :
लेलिह्यसे ग्रसमानः समन्ता ल्लोकान्समग्रान्वदनैर्ज्वलद्भिः
तेजोभिरापूर्य जगत्समग्रं भासस्तवोग्राः प्रतपन्ति विष्णोHindi Translation By Swami Ramsukhdas
आप अपने प्रज्वलित मुखोंद्वारा सम्पूर्ण लोकोंका ग्रसन करते हुए उन्हों चारों ओरसे बारबार चाट रहे हैं और हे विष्णो आपका उग्र प्रकाश अपने तेजसे सम्पूर्ण जगत्को परिपूर्ण करके सबको तपा रहा है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
महाऊर्मि के कुछ श्लोकों की रचना के बाद व्यासजी पुन अपने पूर्व के विषय को प्रारम्भ करते हैं। जगत् के समस्त प्राणीवर्ग काल के मुख में प्रवेश करके नष्ट हुए जा रहे हैं। इस काल तत्त्व की क्षुधा कभी न शान्त होने वाली है। समस्त लोकों का ग्रसन करते हुए आप उनका आस्वाद ले रहे हैं।वस्तुत? यह श्लोक सृष्टि? स्थिति और संहार के तीन कर्ताओं के पीछे के सिद्धान्त को स्पष्ट करता है। यद्यपि हम इन तीनों की भिन्नभिन्न रूप से कल्पना करते हैं? किन्तु वास्तव में ये तीनों एक ही प्रक्रिया के तीन पहलू मात्र हैं। हम पहले भी विस्तार से देख चुके हैं कि सर्वत्र विद्यमान अस्तित्त्व का मूल रहस्य है रचनात्मक विध्वंस।चलचित्र गृह में विभिन्न चित्रों की एक रील को प्रकाशवृत्त के सामने चलाया जाता है। उसके सामने से दूर हुये चित्र को हम मृत कह सकते हैं और सम्मुख उपस्थित हुये को जन्मा हुआ मान सकते हैं। निरंतर हो रही जन्ममृत्यु की इस धारा के कारण सामने के परदे पर एक अखण्ड कथानक का आभास निर्माण होता है। देश और काल से अवच्छिन्न होकर वस्तुएं? प्राणी मात्र? घटनाएं और परिस्थितियाँ हमारे अनुभव में आकर चली जाती हैं और उनके इस आवागमन के सातत्य को हम अस्तित्त्व या जीवन कहते हैं।उपर्युक्त विचार को पारस्परिक त्रिमूर्ति ब्रह्मा? विष्णु और महेश की भाषा में पुराणों में व्यक्त किया गया है।इस ज्ञान की दृष्टि से जब अर्जुन उस प्रकाशस्वरूप देदीप्यमान समष्टि रूप को देखता है? तब वह उस विराट् के उग्र प्रकाश से प्राय अन्धवत् हो जाता है।क्योंकि आप उग्ररूप हैं? इसलिए
English Translation By Swami Sivananda
Thou lickest up, devouring all the worlds on every side with Thy flaming mouths. Thy fierce rays, filling the whole world with radiance, are burning, O Vishnu!
Transliteration
lelihyase grasamānaḥ samantāl lokānsamagrānvadanairjvaladbhiḥ
tejobhirāpūrya jagatsamagraṃ bhāsastavogrāḥ pratapanti viṣṇoअनुवाद
आप अपने प्रज्वलित मुखों द्वारा सभी लोकों को सब ओर से निगलते हुए चाट रहे हैं। हे विष्णु! आपका उग्र प्रकाश अपने तेजों से सम्पूर्ण जगत् को आपूरित करके तपा रहा है।
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के अत्यंत भयानक विश्वरूप का वर्णन कर रहे हैं। वे देखते हैं कि भगवान के अनेक प्रज्वलित मुख समस्त ब्रह्मांड को निगल रहे हैं और उनकी उग्र किरणें पूरे संसार को तपा रही हैं। यहाँ ‘विष्णु’ सम्बोधन सर्वव्यापी परमेश्वर के रूप को दर्शाता है जो संहारक रूप में प्रकट हुए हैं।
Translation
Devouring all the worlds from every side with Your flaming mouths, You are licking them up. Filling the entire universe with Your effulgence, Your fierce rays are scorching it, O Vishnu.
Meaning
In this verse, Arjuna describes the terrifying aspect of the Lord’s cosmic form. He witnesses the Lord devouring all the worlds with His blazing mouths and licking them from all sides. The fierce, all-pervading effulgence of the Lord (addressed here as Vishnu) is filling the entire universe and scorching it with intense heat.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| लेलिह्यसे | आप चाट रहे हैं |
| ग्रसमानः | निगलते हुए |
| समन्तात् | सब ओर से |
| लोकान् | लोकों को |
| समग्रान् | समस्त |
| वदनैः | मुखों द्वारा |
| ज्वलद्भिः | प्रज्वलित |
| तेजोभिः | तेज से / किरणों से |
| आपूर्य | भरकर |
| जगत् | जगत् को |
| समग्रम् | सम्पूर्ण |
| भासः | दीप्तियाँ / किरणें |
| तव | आपकी |
| उग्राः | उग्र / भयानक |
| प्रतपन्ति | तपा रही हैं |
| विष्णो | हे विष्णु |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| lelihyase | You are licking |
| grasamānaḥ | devouring |
| samantāt | from all sides |
| lokān | the worlds |
| samagrān | all |
| vadanaiḥ | by the mouths |
| jvaladbhiḥ | blazing |
| tejobhiḥ | with effulgence |
| āpūrya | filling |
| jagat | the universe |
| samagram | entire |
| bhāsaḥ | rays / light |
| tava | Your |
| ugrāḥ | fierce |
| pratapanti | are scorching |
| viṣṇo | O Vishnu |