Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.3
मूल श्लोक :
एवमेतद्यथात्थ त्वमात्मानं परमेश्वर
द्रष्टुमिच्छामि ते रूपमैश्वरं पुरुषोत्तमHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे पुरुषोत्तम आप अपनेआपको जैसा कहते हैं? यह वास्तवमें ऐसा ही है। हे परमेश्वर आपके ईश्वरसम्बन्धी रूपको मैं देखना चाहता हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
संस्कृत से वाक्प्रचार एवमेतत् (यह ठीक ऐसा ही है) के द्वारा अर्जुन तत्त्वज्ञान के सैद्धान्तिक पक्ष को स्वीकार करता है। समस्त नाम और रूपों में ईश्वर की व्यापकता की सिद्धि बौद्धिक दृष्टि से संतोषजनक थी। फिर भी बुद्धि को अभी भी प्रत्यक्षीकरण की प्रतीक्षा थी। इसलिए अर्जुन कहता है कि? मैं आपके ईश्वरीय रूप को देखना चाहता हूँ। हमारे शास्त्रों में ईश्वर का वर्णन इस प्रकार किया गया है कि वह ज्ञान? ऐश्वर्य? शक्ति? बल? वीर्य और तेज इन छ गुणों से सम्पन्न है।इस अवसर पर भगवान् ने अर्जुन को यह दर्शाने का निश्चय किया कि वे न केवल समस्त व्यष्टि रूपों में व्याप्त हैं वरन् वे वह समष्टिरूपी पात्र हैं? जिसमें ही समस्त नाम और रूपों का अस्तित्व है। भगवान् सर्वव्यापक होने के साथहीसाथ सर्वातीत भी हैं।यद्यपि कट्टर बुद्धिवाद के अत्युत्साह में आकर अर्जुन ने विश्वरूप दर्शन की अपनी मांग भगवान् के समक्ष रखी? किन्तु उसे तत्काल यह भान हुआ कि उसकी यह धृष्टता है और उसने सद्व्यवहार की मर्यादा का उल्लंघन किया है।अगले श्लोक में वह अधिक नम्रता से कहता है
English Translation By Swami Sivananda
(Now) O Supreme Lord, as Thou hast thus described Thyself, O Supreme Person, I wish to see Thy divine form.
Transliteration
evam etad yathāttha tvam ātmānaṃ parameśvara
draṣṭum icchāmi te rūpam aiśvaraṃ puruṣottamaअनुवाद
हे परमेश्वर! आप अपने विषय में जैसा कहते हैं, यह ठीक वैसा ही है। हे पुरुषोत्तम! मैं आपके उस ऐश्वर्ययुक्त रूप को प्रत्यक्ष देखना चाहता हूँ।
भावार्थ
अर्जुन भगवान कृष्ण के वचनों को पूर्णतः सत्य स्वीकार करते हैं, परंतु वे उनके विराट और ऐश्वर्यशाली रूप का प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहते हैं। वे कृष्ण को ‘परमेश्वर’ और ‘पुरुषोत्तम’ कहकर संबोधित करते हैं, जो उनकी सर्वोच्च सत्ता को दर्शाता है। यह जिज्ञासा किसी संशय के कारण नहीं, बल्कि भगवान की महिमा को साक्षात् देखने की उत्कट इच्छा से उत्पन्न हुई है।
Translation
O Supreme Lord, it is exactly as You have described Yourself. O Supreme Person, I desire to see Your divine, sovereign form.
Meaning
Arjuna accepts everything Krishna has said about Himself as absolute truth, yet he desires to perceive that divine majesty directly. By addressing Krishna as ‘Parameśvara’ (Supreme Lord) and ‘Puruṣottama’ (Supreme Person), Arjuna acknowledges His supreme status. This request is not born out of doubt, but from a longing to experience the Lord’s cosmic, sovereign form.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| एवम् | इस प्रकार / ऐसा ही |
| एतत् | यह |
| यथा | जैसे |
| आत्थ | कहा है आपने |
| त्वम् | आपने |
| आत्मानम् | अपने विषय में |
| परम-ईश्वर | हे परमेश्वर |
| द्रष्टुम् | देखने के लिए |
| इच्छामि | मैं इच्छा करता हूँ |
| ते | आपका |
| रूपम् | रूप |
| ऐश्वरम् | ऐश्वर्ययुक्त / दिव्य |
| पुरुष-उत्तम | हे पुरुषोत्तम |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| evam | thus / so |
| etat | this |
| yathā | as |
| āttha | have said |
| tvam | You |
| ātmānam | Yourself |
| parama-īśvara | O Supreme Lord |
| draṣṭum | to see |
| icchāmi | I wish |
| te | Your |
| rūpam | form |
| aiśvaram | divine / sovereign |
| puruṣa-uttama | O Supreme Person |