Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.29
मूल श्लोक :
यथा प्रदीप्तं ज्वलनं पतङ्गा विशन्ति नाशाय समृद्धवेगाः
तथैव नाशाय विशन्ति लोका स्तवापि वक्त्राणि समृद्धवेगाःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
जैसे पतंगे मोहवश अपना नाश करनेके लिये बड़े वेगसे दौड़ते हुए प्रज्वलित अग्निमें प्रविष्ट होते हैं? ऐसे ही ये सब लोग मोहवश अपना नाश करनेके लिये ही बड़े वेगसे दौड़ते हुए आपके मुखोंमें प्रविष्ट हो रहे हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अव्यक्त से व्यक्त हुई सृष्टि के बीच की एकता को? समुद्र से उत्पन्न हुई नदियों की उपमा के द्वारा अत्यन्त सुन्दर शैली द्वारा पूर्व श्लोक में दर्शाया गया है। समुद्र से उत्पन्न होकर समस्त नदियां पुन उसी में समा जाती हैं।कोई भी उपमा अपने आप में पूर्ण नहीं हो सकती है। नदियों के दृष्टान्त में एक अपूर्णता यह रह जाती है कि नदी को स्वयं की चेतना नहीं होने के कारण समुद्र मिलन में उसकी स्वेच्छा नहीं प्रदर्शित होती। कोई शंका कर सकता है कि सम्भवत चेतन प्राणी अपने स्वतन्त्र विवेक के कारण अचेतन जल के समान व्यवहार नहीं करेंगे। यहाँ यह दर्शाने के लिए कि जीवधारी प्राणी भी अपने स्वभाव से विवश हुए मृत्यु के मुख की ओर बरबस खिंचे चले जाते हैं? यह दृष्टान्त दिया गया है कि जैसे पतंगें अत्यन्त वेग से स्वनाश के लिए प्रज्वलित अग्नि के मुख में प्रवेश करते हैं। व्यासजी को सम्पूर्ण प्रकृति ही धर्मशास्त्र की खुली पुस्तक प्रतीत होती है। वे अनेक घटनाओं एवं उदाहरणों के द्वारा इन्हीं मूलभूत तथ्यों को समझाते हैं कि अव्यक्त का व्यक्त अवस्था में प्रक्षेपण ही सृष्टि की प्रक्रिया है? और व्यक्त का अपने अव्यक्त स्वरूप में मिल जाना ही नाश या मृत्यु है। जब हम इस भयंकर या राक्षसी प्रतीत होने वाली मृत्यु को यथार्थ दृष्टिकोण से समझने का प्रयत्न करते हैं? तब वह छद्मवेष को त्यागकर अपने प्रसन्न और प्रफुल्ल मुख को प्रकट,करती है।अर्जुन के मानसिक तनाव का मुख्य कारण यह था कि उसने कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि पर होने वाले बहुत बड़े नाश का शीघ्रतावश त्रुटिपूर्ण मूल्यांकन कर लिया था। उसके उपचार का एकमात्र उपाय यही था कि उसकी दृष्टि उस ऊँचाई तक उठाई जाये? जहाँ से वह? एक ही दृष्टिक्षेप में? मृत्यु की इस अपरिहार्य प्रकृतिक घटना को देख और समझ सके। श्रीकृष्ण ने उसका यही उपचार किया। किसी भी घटना का समीप से पूर्ण अध्ययन करने पर उसके भयानक फनों के विषदन्त दूर हो जाते हैं जब मनुष्य की विवेकशील बुद्धि अज्ञान से आवृत्त हो जाती है? केवल तभी उसके आसपास होने वाली घटनाएं उसका गला घोंटकर उसे धराशायी कर देती हैं। जैसे नदियां समुद्र में तथा पतंगे अग्नि के मुख में तेजी से प्रवेश करते हैं? वैसे ही सभी रूप अव्यक्त में विलीन हो जाते हैं। मृत्यु की घटना को इस प्रकार समझ लेने पर मनुष्य उससे भयमुक्त होकर अपने जीवन का सामना कर सकता है? क्योंकि उसके लिए सम्पूर्ण जीवन का अर्थ परिवर्तनों की एक अखण्ड धारा हो जाती है।इसलिए? काल की क्रीड़ा के रूप में मृत्यु एक डंकरहित घटना बन जाती है। अगले श्लोक में इस मृत्यु को उसके सम्पूर्ण भयंकर सौन्दर्य के साथ गौरवान्वित किया गया है
English Translation By Swami Sivananda
As moths hurriedly rush into a blazing fire for (their own) destruction, so also these creatures hurriedly rush into Thy mouths for (their own) destruction.
Transliteration
yathā pradīptaṃ jvalanaṃ pataṅgā viśanti nāśāya samṛddhavegāḥ
tathaiva nāśāya viśanti lokā stavāpi vaktrāṇi samṛddhavegāḥअनुवाद
जैसे पतंगे अपने विनाश के लिए अत्यंत तीव्र वेग से प्रज्वलित अग्नि में प्रवेश करते हैं, वैसे ही ये सब लोग भी अपने विनाश के लिए अत्यंत तीव्र वेग से आपके मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विश्वरूप के भयानक संहारक रूप का वर्णन कर रहे हैं। जैसे पतंगे अज्ञानवश जलती हुई आग की ओर आकर्षित होकर नष्ट हो जाते हैं, वैसे ही ब्रह्मांड के समस्त प्राणी और योद्धा काल रूपी भगवान के मुखों में समाते जा रहे हैं। यह दृश्य सृष्टि के अनिवार्य अंत और काल की सर्वभक्षी शक्ति को दर्शाता है।
Translation
Just as moths rush with great speed into a blazing fire to their destruction, so too do these worlds enter with great speed into your mouths to their destruction.
Meaning
In this verse, Arjuna describes the terrifying, destructive aspect of Lord Krishna’s cosmic form. Just as moths are irresistibly drawn to a blazing fire only to be consumed by it, all these living beings and warriors are rushing headlong into the Lord’s mouths to their demise. This imagery highlights the inevitable destruction of all material existence by the power of time.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| यथा | जैसे |
| प्रदीप्तम् | प्रज्वलित |
| ज्वलनम् | अग्नि को |
| पतङ्गाः | पतंगे |
| विशन्ति | प्रवेश करते हैं |
| नाशाय | विनाश के लिए |
| समृद्ध-वेगाः | अत्यंत तीव्र वेग वाले |
| तथा | वैसे |
| एव | ही |
| नाशाय | विनाश के लिए |
| विशन्ति | प्रवेश कर रहे हैं |
| लोकाः | लोग (प्राणी) |
| तव | आपके |
| अपि | भी |
| वक्त्राणि | मुखों में |
| समृद्ध-वेगाः | अत्यंत तीव्र वेग वाले |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| yathā | just as |
| pradīptam | blazing |
| jvalanam | fire |
| pataṅgāḥ | moths |
| viśanti | enter |
| nāśāya | for destruction |
| samṛddha-vegāḥ | with great speed |
| tathā | so |
| eva | indeed |
| nāśāya | for destruction |
| viśanti | enter |
| lokāḥ | the people (worlds) |
| tava | your |
| api | also |
| vaktrāṇi | mouths |
| samṛddha-vegāḥ | with great speed |