श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग

Bhagavad Gita 11.28

मूल श्लोक :

यथा नदीनां बहवोऽम्बुवेगाः     समुद्रमेवाभिमुखाः द्रवन्ति
तथा तवामी नरलोकवीरा     विशन्ति वक्त्राण्यभिविज्वलन्ति

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

जैसे नदियोंके बहुतसे जलके प्रवाह स्वाभाविक ही समुद्रके सम्मुख दौड़ते हैं? ऐसे ही वे संसारके महान् शूरवीर आपके प्रज्वलित मुखोंमें प्रवेश कर रहे हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

समुद्र से मिलन के लिए आतुर? उसकी ओर वेग से बहने वाली नदियों की उपमा इस श्लोक में दी गई है। जिस स्रोत से नदी का उद्गम होता है? वहीं से उसे अपना विशेष व्यक्तित्व प्राप्त हो जाता है। किसी भी एक बिन्दु पर वह नदी न रुकती है और न आगे बढ़ने से कतराती ही है। अल्पमति का पुरुष यह कह सकता है कि नदी की प्रत्येक बूँद समीप ही किसी स्थान विशेष की ओर बढ़ रही है। परन्तु यथार्थवादी पुरुष जानता है कि सभी नदियां समुद्र की ओर ही बहती जाती हैं? और वे जब तक समुद्र से मिल नहीं जाती तब तक मार्ग के मध्य न कहीं रुक सकती हैं और न रुकेंगी। समुद्र के साथ एकरूप हो जाने पर विभिन्न नदियों के समस्त भेद समाप्त हाे जाते हैं।नदी के जल की प्रत्येक बूंद समुद्र से ही आयी है। प्रथम मेघ के रूप में वह ऊपर पर्वतशिखरों तक पहुंची और वहाँ वर्षा के रूप में प्रकट हुईनदी तट के क्षेत्रों को जल प्रदान करके खेतों को जीवन और पोषण देकर वे बूंदें वेगयुक्त प्रवाह के साथ अपने उस प्रभव स्थान में मिल जाती हैं? जहाँ से उन्होंने यह करुणा की उड़ान भरी थी। इसी प्रकार अपने समाज की सेवा और संस्कृति का पोषण करने तथा विश्व के सौन्दर्य की वृद्धि में अपना योगदान देने के लिए समष्टि से ही सभी व्यष्टि जीव प्रकट हुए हैं? परन्तु उनमें से कोई भी व्यक्ति अपनी इस तीर्थयात्रा के मध्य नहीं रुक सकता है। सभी को अपने मूल स्रोत की ओर शीघ्रता से बढ़ना होगा। सम्ाुद्र को प्राप्त होने से नदी की कोई हानि नहीं होती है। यद्यपि मार्ग में उसे कुछ विशेष गुण प्राप्त होते हैं? जिनके कारण उसे एक विशेष नाम और आकार प्राप्त हो जाता है? तथपि उसका यह स्वरूप क्षणिक है। यह समुद्र के जल द्वारा शुष्क भूमि को बहुलता से समृद्ध करने के लिए लिया गया सुविधाजनक रूप है।इस श्लोक पर जितना अधिक हम विचार करेंगे उतना अधिक उसमें निहित आनन्द हमें प्राप्त होगा।किसलिये वे प्रवेश करते हैं अर्जुन बताता है कि

English Translation By Swami Sivananda

Verily, just as many torrents of rivers flow towards the ocean, even so these heroes in the world of men enter Thy flaming mouths.

Transliteration

yathā nadīnāṃ bahavo'mbuvegāḥ samudramevābhimukhāḥ dravanti
tathā tavāmī naralokavīrā viśanti vaktrāṇyabhivijvalanti

अनुवाद

जैसे नदियों के बहुत से जल-प्रवाह स्वाभाविक रूप से समुद्र की ओर ही दौड़ते हैं, वैसे ही वे मनुष्यलोक के वीर आपके प्रज्वलित मुखों में प्रवेश कर रहे हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विश्वरूप के भयानक संहारक रूप का वर्णन कर रहे हैं। जिस प्रकार नदियाँ अपने वेग से बहती हुई अंततः समुद्र में ही विलीन हो जाती हैं, उसी प्रकार पृथ्वी के सभी महान योद्धा काल रूपी भगवान के मुख में समाते जा रहे हैं। यह दृश्य संसार की नश्वरता और काल की सर्वग्राही शक्ति को दर्शाता है।

Translation

As the many rapid torrents of rivers flow headlong towards the ocean, so do these heroes of the world of men enter into Your blazing mouths.

Meaning

In this verse, Arjuna describes the terrifying, destructive aspect of Lord Krishna’s cosmic form. Just as rivers naturally and inevitably rush towards the ocean to merge into it, all the great warriors of the earth are helplessly drawn into the blazing mouths of the Lord. This metaphor illustrates the transient nature of human existence and the all-consuming power of time.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
यथाजैसे
नदीनाम्नदियों के
बहवःबहुत से
अम्बु-वेगाःजल के प्रवाह
समुद्रम्समुद्र की ओर
एवही
अभिमुखाःसामने मुख किए हुए
द्रवन्तिदौड़ते हैं / बहते हैं
तथावैसे ही
तवआपके
अमीये
नर-लोक-वीराःमनुष्यलोक के वीर योद्धा
विशन्तिप्रवेश कर रहे हैं
वक्त्राणिमुखों में
अभिविज्वलन्तिसब ओर से प्रज्वलित होते हुए

Word by word

WordMeaning
yathājust as
nadīnāmof the rivers
bahavaḥmany
ambu-vegāḥcurrents of water
samudramtowards the ocean
evacertainly
abhimukhāḥfacing towards
dravantiflow / glide
tathāsimilarly
tavaYour
amīthese
nara-loka-vīrāḥheroes of the human world
viśantiare entering
vaktrāṇimouths
abhivijvalantiblazing on all sides