श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग

Bhagavad Gita 11.27

मूल श्लोक :

वक्त्राणि ते त्वरमाणा विशन्ति     दंष्ट्राकरालानि भयानकानि
केचिद्विलग्ना दशनान्तरेषु     संदृश्यन्ते चूर्णितैरुत्तमाङ्गैः

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हमारे मुख्य योद्धाओंके सहित भीष्म? द्रोण और वह कर्ण भी आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। राजाओंके समुदायोंके सहित धृतराष्ट्रके वे ही सबकेसब पुत्र आपके विकराल दाढ़ोंके कारण भयंकर मुखोंमें बड़ी तेजीसे प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमेंसे कईएक तो चूर्ण हुए सिरोंसहित आपके दाँतोंके बीचमें फँसे हुए दीख रहे हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

सत्य के अन्वेषण के अपने उद्देश्य के प्रति दृढ़ रहकर जो दर्शनशास्त्र? समष्टि को बिना किसी भय या पक्षपात के समझना चाहता है? वह प्रकृति के विनाशकारी पक्ष की उपेक्षा नहीं कर सकता। उपादान (कच्चे माल) के विनाश अर्थात् विकार के बिना किसी भी नवीन वस्तु का निर्माण नहीं हो सकता है। विश्व में जहाँ कहीं भी कोई अस्तित्व हैं वह परिवर्तन की पुनरावृत्ति मात्र है और इस परिवर्तन को निर्मित वस्तु की दृष्टि से देखने पर सृष्टि कहा जाता है और उपादान की दृष्टि से उसे ही विनाश कहते हैं।इस प्रकार हम देखते हैं कि हिन्दू धर्म के साहसी आर्य ऋषियों ने परम सत्य के सौन्दर्य की स्तुति के समय? केवल उसे सर्वज्ञ सृष्टिकर्ता या सर्वशक्तिमान पालनकर्त्ता के रूप में ही नहीं देखा? वरन् समस्त नामरूपों के सर्व समर्थ संहारकर्त्ता के रूप में भी उसका दर्शन और स्तुतिगान किया है। जिन धार्मिक मतों में अभी तक जीवन का उसकी सम्पूर्णता में निरीक्षण और विश्लेषण नहीं किया गया है? उन्हें उपर्युक्त कथन भयंकर प्रतीत हो सकता है।अर्जुन के वचन अर्थपूर्ण हैं। वह विश्वरूप को समस्त नामरूपों को स्वाहा करते हुए नहीं देखता? बल्कि उन नामरूपों को शीघ्रता से विराट् पुरुष के मुख में प्रवेश करते हुए देखता है। समुद्र को यदि हम देखें तो ज्ञात होगा कि तरंगों को अपने में समा लेने के लिए समुद्र स्वस्थान से ऊपर नहीं उठता? किन्तु वे तरंगें ही क्षणभर की क्रीड़ा के पश्चात् स्वत ही शीघ्रता से समुद्र में लुप्त हो जाती हैं। इसी प्रकार सत्य से व्यक्त हुई यह विविधता की सृष्टि सत्य की सतह पर अपनी क्रीड़ा के पश्चात् अवश्य ही? अपने प्रभवस्थान  पूर्ण पुरुष में शीघ्र गति से लीन हो जायेगी।अर्जुन? प्रकृति के विनाशकारी तत्त्व के जम्हाई लेते मुख में भीष्मद्रोणादि कौरवपक्षीय योद्धागणों तथा स्वपक्ष के भी प्रमुख योद्धाओं को वेग से प्रवेश करते हुये देखता है। यह दृश्य न केवल अर्जुन को उसके साहस को तोड़ते हुए भयभीत ही करता है? अपितु उसे भविष्य में झांककर देखने का आत्मविश्वास भी प्रदान करता है। यद्यपि सैनिक संख्या तथा शस्त्रास्त्रों की आपूर्ति की दृष्टि से कौरव अधिक शक्तिशाली थे? किन्तु उनका विनाश देखकर अर्जुन को धैर्य प्राप्त होता है। यह भावी घटनाओं का संकेत ही था। जब भगवान् विश्वरूप में प्रकट होते हैं? तब उस एकत्व की संकल्पना में न केवल आकाश (देश) संकुचित हो जाता है? बल्कि काल भी हमारे निरीक्षण का विषय बन जाता है।इसलिए? यदि अर्जुन ने उस विराट् रूप में? भूतकाल को वर्तमान से मिलकर भविष्य की ओर अग्रसर होते हुए देखा हो? तो इसमें कोई आश्चर्य़ नहीं है। सम्पूर्ण गीता ग्रन्थ में से प्रथम दो पृष्ठ पढ़ना अथवा उन्हें छोड़कर तीसरा पृष्ठ पढ़ना मेरी इच्छा पर निर्भर करता है। इसी प्रकार? जब अर्जुन के समक्ष सम्पूर्ण विश्वरूप ही उपस्थित था? तो वह एक दृष्टि में यत्रतत्रसर्वत्र देख सकता था और भूतवर्तमानभविष्य को भी। आधुनिक वैज्ञानिक भी इस तथ्य को स्वीकार करते हैं कि वस्तुत देश काल एक ही हैं? और वे परस्पर की दृष्टि से व्यक्त होते हैं।सत्यनिष्ठ एवं सत्य के साधक पुरुषों को इस बात का भय नहीं होता कि उनका सत्यान्वेषण उन्हें कौनसे सत्य तक पहुँचायेगा। यदि वह सत्य भयंकर है? तो वे उसे भी स्वीकार करते हैं। यह जगत् दो विरुद्ध धर्मियों का एक मिश्रण है। इसमें सुरूपता और कुरूपता? शुभ और अशुभ? कोमल और कठोर तथा मधुर और कटु सब कुछ विद्यमान है। इन समस्त रूपों में परमात्मा ही व्यक्त हो रहा है। अत? यदि हम अपनी रुचि के अनुसार परमात्मा के केवल सुन्दर? शुभ? कोमल और मधुर भावों को ही स्वीकार करते हैं? तो ईश्वर की यह पूजा अथवा सत्य का यह मूल्यांकन पूर्ण नहीं कहा जा सकता। पूर्वाग्रहरहित और अनासक्त व्यक्ति को ईश्वर के कुरूप? अशुभ? कठोर और कटु भावों को मान्यता देनी ही होगी। वह दर्शनशास्त्र ही पूर्ण है? जो यह बोध कराए कि यद्यपि परमात्मा ही इन सब नाम? रूप और गुणों में व्यक्त हो रहा है? तथापि वह अपने पारमार्थिक स्वरूप से? इन सब गुणों से सर्वथा अतीत है।इसलिए? शुद्ध वैज्ञानिक पद्धति से अर्जुन को विश्वरूप का विस्तृत विवरण देना पड़ता है? फिर वह विवरण कितना ही भयंकर और रक्त को जमाने वाला ही क्यों न हो। निसन्देह गीता में वास्तविकता का बोध है। काल के मुख को यहाँ भयानक और विकराल दाढ़ों वाला कहकर उसका यथार्थ चित्रण किया गया है।वे किस प्रकार प्रवेश कर रहे हैं अर्जुन कहता है

English Translation By Swami Sivananda

Some hurriedly enter Thy mouths with their terrible teeth, fearful to behold. Some are found sticking in the gaps between the teeth with their heads crushed to powder.

Transliteration

vaktrāṇi te tvaramāṇā viśanti daṃṣṭrākarālāni bhayānakāni
kecidvilagnā daśanāntareṣu saṃdṛśyante cūrṇitairuttamāṅgaiḥ

अनुवाद

वे सभी बड़ी तेजी से आपके भयानक और दाढ़ों के कारण विकराल मुखों में प्रवेश कर रहे हैं। उनमें से कुछ दांतों के बीच में फंसे हुए दिखाई दे रहे हैं, जिनके सिर चूर-चूर हो गए हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण के विश्वरूप के भयानक संहारक रूप का वर्णन कर रहे हैं। वे देख रहे हैं कि कौरव पक्ष के योद्धा और अन्य राजा अत्यंत वेग से भगवान के विकराल मुखों में समाते जा रहे हैं। कुछ योद्धा भगवान के दांतों के बीच फंसे हुए हैं और उनके सिर पूरी तरह से कुचले जा चुके हैं, जो काल के अनिवार्य प्रभाव को दर्शाता है।

Translation

They are rapidly entering Your fearful mouths, which are terrible with tusks. Some are seen stuck between Your teeth, with their heads crushed to powder.

Meaning

In this verse, Arjuna describes the terrifying, destructive aspect of Lord Krishna’s cosmic form. He witnesses the warriors of the opposing side rushing headlong into the Lord’s gaping, fearsome mouths. Some of them are seen caught between the teeth, with their heads crushed, symbolizing the inevitable and brutal destruction of the wicked by Time.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
वक्त्राणिमुखों में
तेआपके
त्वरमाणाःअत्यंत वेग से दौड़ते हुए
विशन्तिप्रवेश कर रहे हैं
दंष्ट्रादाढ़ों के कारण
करालानिविकराल / भयानक
भयानकानिभय उत्पन्न करने वाले
केचित्कुछ (योद्धा)
विलग्नाःफंसे हुए
दशन-अन्तरेषुदांतों के बीच में
संदृश्यन्तेदिखाई दे रहे हैं
चूर्णितैःचूर-चूर हुए
उत्तम-अङ्गैःसिरों के साथ

Word by word

WordMeaning
vaktrāṇimouths
teYour
tvaramāṇāḥrushing with haste
viśantiare entering
daṃṣṭrāwith tusks / teeth
karālāniterrible
bhayānakānifearful
kecitsome of them
vilagnāḥstuck
daśana-antareṣubetween the teeth
saṃdṛśyanteare seen
cūrṇitaiḥcrushed to powder
uttama-aṅgaiḥwith their heads