Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.25
मूल श्लोक :
दंष्ट्राकरालानि च ते मुखानि दृष्ट्वैव कालानलसन्निभानि
दिशो न जाने न लभे च शर्म प्रसीद देवेश जगन्निवासHindi Translation By Swami Ramsukhdas
आपके प्रलयकालकी अग्निके समान प्रज्वलित और दाढ़ोंके कारण विकराल (भयानक) मुखोंको देखकर मुझे न तो दिशाओंका ज्ञान हो रहा है और न शान्ति ही मिल रही है। इसलिये हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न होइये।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
जैसा कि श्लोक में वर्णन किया गया है? अर्जुन ऐसे भयंकर रूप को देखकर अपना धैर्य और सुख खो रहा है। सर्वभक्षी? सबको एक रूपकर देने वाले काल का यह चित्र है। जब दृष्टि के समक्ष ऐसा विशाल दृश्य उपस्थित हो जाता है? और वह भी इतने आकस्मिक रूप से? तो विशालता का उसका परिमाण ही विवेकशक्ति का मानो गला घोंट देता है और क्षणभर के लिए वह व्यक्ति संवेदनाशून्य हो जाता है। भ्रान्तिजन्य दुर्व्यवस्था की दशा को यहाँ इन शब्दों में व्यक्त किया गया है कि? मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा हूँ। बात यहीं पर नहीं समाप्त होती। मैं न धैर्य रख पा रहा हूँ और न शान्ति,को भी।आत्यन्तिक विस्मय की इस स्थिति में आश्चर्यचकित मानव यह अनुभव करता है कि उसकी शारीरिक शक्ति? मानसिक क्षमतायें और बुद्धि की सूक्ष्मदर्शिता अपने भिन्नभिन्न रूप में तथा सामूहिक रूप में भी वस्तुत महत्त्वशून्य साधन हैं। छोटा सा अहंकार अपने मिथ्या अभिमान के आवरण और मिथ्या शक्ति के कवच को त्यागकर पूर्ण विवस्त्र हुआ स्वयं को नम्र भाव से समष्टि की शक्ति के समक्ष समर्पित कर देता है। परम दिव्य? समष्टि शक्ति के सम्मुख जिस व्यक्ति ने पूर्णरूप से अपने खोखले अभिमानों की अर्थशून्यता समझ ली है? उसके लिए केवल एक आश्रय रह जाता है? और वह है प्रार्थना।इस श्लोक के अन्त में अर्जुन प्रार्थना करता है? हे देवेश हे जगन्निवास आप प्रसन्न हो जाइये। इस प्रार्थना के द्वारा व्यासजी यह दर्शाते हैं कि मान और दम्भ से पूर्ण हृदय वाले व्यक्ति के द्वारा कभी भी वास्तविक प्रार्थना नहीं की जा सकती है। जब व्यक्ति इस विशाल समष्टि विश्व में अपनी तुच्छता समझता है? केवल तभी वह सच्चे हृदय से स्वत प्रार्थना करता है।अर्जुन इस युद्ध में अपनी विजय के प्रति सशंक था। 21वें श्लोक से प्रारम्भ किये गये इस प्रकरण का मुख्य उद्देश्य अर्जुन को भावी घटनाओं का कुछ बोध कराना है। उसे युद्ध के परिणाम के प्रति आश्वस्त करते हुए? अब भगवान् सीधे ही सेनाओं के योद्धाओं को काल के मुख में प्रवेश करते हुए दिखाते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Having seen Thy mouths fearful with teeth (blazing) like the fires of cosmic dissolution, I know not the four arters, nor do I find peace. Have mercy, O Lord of the gods, O abode of the universe.
Transliteration
daṃṣṭrākarālāni ca te mukhāni dṛṣṭvaiva kālānalasannibhāni
diśo na jāne na labhe ca śarma prasīda deveśa jagannivāsaअनुवाद
दाढ़ों के कारण विकराल और प्रलयकाल की अग्नि के समान आपके मुखों को देखकर ही मैं दिशाओं को नहीं जान पा रहा हूँ और न ही शांति पा रहा हूँ। हे देवेश! हे जगन्निवास! आप प्रसन्न होइए।
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के अत्यंत भयानक विश्वरूप को देखकर अपनी व्याकुलता प्रकट कर रहे हैं। भगवान के विकराल मुखों को देखकर अर्जुन भयभीत हो गए हैं और उन्हें दिशाओं का ज्ञान भी नहीं रह गया है। वे भगवान से अपने सौम्य रूप में लौटने और प्रसन्न होने की प्रार्थना करते हैं।
Translation
Seeing Your mouths, terrible with tusks and resembling the fire of cosmic destruction, I lose my sense of direction and find no peace. Be gracious, O Lord of lords, O Refuge of the universe!
Meaning
In this verse, Arjuna expresses his overwhelming fear and disorientation upon witnessing the terrifying aspect of Krishna’s cosmic form. The sight of the Lord’s destructive mouths, resembling the fire of dissolution, causes Arjuna to lose his bearings and inner peace. He desperately pleads for mercy and grace from the Supreme Lord who sustains the universe.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| दंष्ट्रा-करालानि | दाढ़ों के कारण भयानक |
| च | और |
| ते | आपके |
| मुखानि | मुखों को |
| दृष्ट्वा | देखकर |
| एव | ही |
| काल-अनल-सन्निभानि | प्रलयकाल की अग्नि के समान |
| दिशः | दिशाओं को |
| ना | नहीं |
| जाने | मैं जान पा रहा हूँ |
| ना | नहीं |
| लभै | मैं पा रहा हूँ |
| च | और |
| शर्म | सुख (शांति) |
| प्रसीद | प्रसन्न होइए |
| देव-ईश | हे देवों के स्वामी |
| जगत्-निवास | हे ब्रह्मांड के आश्रय |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| daṃṣṭrā-karālāni | terrible with tusks |
| ca | and |
| te | Your |
| mukhāni | mouths |
| dṛṣṭvā | having seen |
| eva | indeed |
| kāla-anala-sannibhāni | resembling the fire of cosmic destruction |
| diśaḥ | directions |
| na | not |
| jāne | I know |
| na | not |
| labhe | I find |
| ca | and |
| śarma | peace (comfort) |
| prasīda | be pleased |
| deva-īśa | O Lord of the gods |
| jagat-nivāsa | O refuge of the universe |