Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.24
मूल श्लोक :
नभःस्पृशं दीप्तमनेकवर्णं व्यात्ताननं दीप्तविशालनेत्रम्
दृष्ट्वा हि त्वां प्रव्यथितान्तरात्मा धृतिं न विन्दामि शमं च विष्णोHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे विष्णो आपके अनेक देदीप्यमान वर्ण हैं? आप आकाशको स्पर्श कर रहे हैं? आपका मुख फैला हुआ है? आपके नेत्र प्रदीप्त और विशाल हैं। ऐसे आपको देखकर भयभीत अन्तःकरणवाला मैं धैर्य और शान्तिको भी प्राप्त नहीं हो रहा हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अर्जुन द्वारा अनुभव किया गया यह आसाधारण अद्भुत और उग्र दृश्य किसी एक स्थान पर केन्द्रित नहीं किया जा सकता था। वस्तुत? वह सर्वव्यापकता की सीमा तक फैला हुआ था। परन्तु? अर्जुन ने अपनी आन्तरिक दृष्टि में उसे एक परिच्छिन्न रूप और निश्चित आकार में देखा। अरूप गुणों (जैसे स्वतन्त्रता? प्रेम? राष्ट्रीयता इत्यादि) को जब भी हम बौद्धिक दृष्टि से समझते हैं? तब हम उसे एक निश्चित आकार प्रदान करते हैं? जो स्वयं के ज्ञान के लिए ही होता है? परन्तु कदापि इन्द्रियगोचर नहीं होता। इसी प्रकार? यद्यपि विराट् रूप तो विश्वव्यापी है? परन्तु अर्जुन को ऐसा अनुभव होता है? मानो? उसका कोई आकार विशेष है। किन्तु? पुन जब वह इस अनुभूत दृश्य का वर्णन करने का प्रयत्न करता है? तो उसके वचन उसकी ही भावनाओं को व्यक्त नहीं कर पाते और उसका अपना प्रयोजन ही सिद्ध नहीं हो पाता है।अर्जुन देखता है कि समस्त लोक उस विराट् पुरुष को देखकर भयभीत हो रहे हैं? जिसमें? बहुत मुख? नेत्र? बहुत बाहु? उरु और पैरों वाले? बहुत उदरों वाले आदि रूप हैं और वह कहता है? मैं भी भयभीत हो रहा हूँ। यह भी सबने अनुभव किया होगा कि यदि हम किसी उत्तेजित जनसमुदाय के मध्य अथवा सत्संग में होते हैं? तब वहाँ के वातावरण का हमारे मन पर भी उसी प्रकार का प्रभाव पड़ता है। सब लोक भयभीत हुये हैं? और अर्जुन स्वीकार करता है कि? मैं भी व्याकुल हो रहा हूँ।अपनी ही स्वीकारोक्ति के बाद उसे यह भय लगना एक क्षत्रिय पुरुष के लिए अपमानजनक और कायरता का लक्षण जान पड़ा। इसलिए? अपने भय को उचित सिद्ध करने के लिए वह उस भयंकर रूप को अनन्तरूप अर्थात् रूपविहीन बताते हुए कहता है कि विश्वरूप अपने में सबको समेटे हुए है। यह विराट् रूप आकाश को स्पर्श कर रहा है। असंख्य वर्णों से वह दीप्तमान हो रहा है। उसके विशाल आग्नेय नेत्र चमक रहे हैं। उसका मुख सबका भक्षण कर रहा है। यह सब सम्मिलित रूप में देवताओं के साहस को भी डगमगा देने वाला है। अर्जुन यह भी स्वीकार करता है कि इस रूप के दर्शन से मैं भयभीत हूँ मुझे न धैर्य प्राप्त हो रहा है और न शान्ति। यहाँ ध्यान देने की बात है कि इस प्रकार के संवेदनाशून्य भय की स्थिति में वह विश्वरूप को? हे विष्णो कहकर सम्बोधित करता है।जैसा कि मैनें प्रारम्भ में कहा है अर्जुन की अर्न्तदृष्टि में अत्यन्त स्पष्ट अनुभव हो रहा विराट् रूप? वस्तुत अनन्त परमात्मा का इस विश्व के नाम और रूपों के असीम विस्तार की दृष्टि से किया गया वर्णन है। गीता के विद्यार्थियों को इन सूक्ष्म विचारधाराओं का विस्मरण नहीं होने देना चाहिए जिन्हें व्यासजी ने परिश्रमी और लगनशील साधकों के लाभ के लिए गुप्त रख छोड़ा है अपने भय का कारण बताते हुए अर्जुन कहता है
English Translation By Swami Sivananda
On seeing Thee (the Cosmic Form) touching the sky, shining in many colours, with mouths wide open, with large fiery eyes, I am terrified at heart and find neither courage nor peace, O Vishnu.
Transliteration
nabhaḥspṛśaṃ dīptamanekavarṇaṃ vyāttānanaṃ dīptaviśālanetram
dṛṣṭvā hi tvāṃ pravyathitāntarātmā dhṛtiṃ na vindāmi śamaṃ ca viṣṇoअनुवाद
हे विष्णु! आकाश को स्पर्श करने वाले, देदीप्यमान, अनेक वर्णों से युक्त, खुले हुए मुखों वाले और चमकती हुई विशाल आँखों वाले आपको देखकर भयभीत अन्तःकरण वाला मैं न तो धैर्य धारण कर पा रहा हूँ और न ही शान्ति पा रहा हूँ
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के अत्यंत भयानक और विराट रूप को देखकर अपनी व्याकुलता व्यक्त कर रहे हैं। भगवान का यह रूप आकाश को छू रहा है और उनके अनेक मुख तथा विशाल नेत्र धधक रहे हैं। इस दृश्य को देखकर अर्जुन का हृदय भय से काँप उठता है और वे अपना मानसिक संतुलन तथा धैर्य खो बैठते हैं।
Translation
O Vishnu! Seeing You touching the sky, glowing, multi-colored, with wide-open mouths and burning, large eyes, my innermost soul is terrified, and I find neither courage nor peace
Meaning
In this verse, Arjuna expresses his deep distress and terror upon witnessing the cosmic form of Lord Krishna. The form is so immense that it touches the sky, with blazing colors, gaping mouths, and huge, fiery eyes. Overwhelmed by this awe-inspiring and terrifying sight, Arjuna loses his inner composure, courage, and peace of mind.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| नभः-स्पृशम् | आकाश को छूने वाले |
| दीप्तम् | देदीप्यमान (चमकते हुए) |
| अनेक-वर्णम् | अनेक रंगों वाले |
| व्यात्त-आननम् | खुले हुए मुखों वाले |
| दीप्त-विशाल-नेत्रम् | चमकती हुई बड़ी आँखों वाले |
| दृष्ट्वा | देखकर |
| हि | निश्चय ही |
| त्वाम् | आपको |
| प्रव्यथित-अन्तरात्मा | भयभीत अन्तःकरण वाला (मैं) |
| धृतिम् | धैर्य को |
| न | नहीं |
| विन्दामि | प्राप्त कर रहा हूँ |
| शमम् | शान्ति को |
| च | और |
| विष्णो | हे विष्णु |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| nabhaḥ-spṛśam | touching the sky |
| dīptam | glowing |
| aneka-varṇam | multi-colored |
| vyātta-ānanam | with wide-open mouths |
| dīpta-viśāla-netram | with blazing large eyes |
| dṛṣṭvā | seeing |
| hi | indeed |
| tvām | You |
| pravyathita-antarātmā | my terrified innermost soul |
| dhṛtim | courage |
| na | not |
| vindāmi | I find |
| śamam | peace |
| ca | and |
| viṣṇo | O Vishnu |