Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.21
मूल श्लोक :
अमी हि त्वां सुरसङ्घाः विशन्ति केचिद्भीताः प्राञ्जलयो गृणन्ति
स्वस्तीत्युक्त्वा महर्षिसिद्धसङ्घाः स्तुवन्ति त्वां स्तुतिभिः पुष्कलाभिःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
वे ही देवताओंके समुदाय आपमें प्रविष्ट हो रहे हैं। उनमेंसे कई तो भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपके नामों और गुणोंका कीर्तन कर रहे हैं। महर्षियों और सिद्धोंके समुदाय कल्याण हो मङ्गल हो ऐसा कहकर उत्तमउत्तम स्तोत्रोंके द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अब तक अर्जुन ने विश्व रूप का जो वर्णन किया वह स्थिर था और एक साथ अद्भुत और उग्र भी था। यहाँ अर्जुन विश्वरूप में दिखाई दे रही गति और क्रिया का वर्णन करता है। ये सुरसंघ विराट् पुरुष में प्रवेश करके तिरोभूत हो रहे हैं।यदि सुधार के अयोग्य हुए कई लोग बलात् विश्वरूप की ओर खिंचे चले जाकर उसमें लुप्त हो जा रहे हों? और अन्य लोग प्रतीक्षा करते हुऐ इस प्रक्रिया को देख रहे हों? तो अवश्य ही वे भय से आतंकित हो जायेंगे। किसी निश्चित आपत्ति से आशंकित पुरुष? जब सुरक्षा का कोई उपाय नहीं देखता है? तब निराशा के उन क्षणों में वह सदा प्रार्थना की ओर प्रवृत्त होता है। इस मनोवैज्ञानिक सत्य को बड़ी ही सुन्दरता से यहाँ इन शब्दों में व्यक्त किया गया है कि कई एक भयभीत होकर हाथ जोड़कर आपकी स्तुति करते हैं।और यही सब कुछ नहीं है। महर्षियों और सिद्ध पुरुषों ऋ़े समूह? अपने ज्ञान की परिपक्वता से प्राप्त दैवी और आन्तरिक शान्ति के कारण? इस विराट् के दर्शन से अविचलित रहकर इस विविध रूपमय विराट् पुरुष का उत्तम (बहुल) स्तोत्रों के द्वारा स्तुतिगान करते हैं। वे सदा स्वस्तिवाचन अर्थात् सब के कल्याण की कामना करते हैं। अपने पूर्ण ज्ञान के कारण वे जानते हैं कि ईश्वर इस प्रकार का अति उग्र भयंकर रूप केवल उसी समय धारण करता है जब वह विश्व का सम्पूर्ण पुनर्निर्माण करना चाहता है। सिद्ध पुरुष यह भी जानते हैं कि विनाश के द्वारा निर्माण करने की इस योजना में किसी प्रकार की हानि नहीं होती है। इसलिए? वे इस विनाश की प्रक्रिया का स्वागत करते हुये जगत के लिये स्वर्णयुग की कामना करते हैं? जो इस सम्पूर्ण विनाश के पश्चात् निश्चय ही आयेगा।इस श्लोक में जगत् के प्राणियों का वर्गीकरण तीन भागों में किया गया है उत्तम? मध्यम और अधम। अधम प्राणी ऐसे ही नष्ट हो जाते हैं। वे मृत्यु की प्रक्रिया के सर्वप्रथम शिकार होते हैं और दुर्भाग्य से उन्हें इस क्रिया का भान तक नहीं होता कि वे उसका किसी प्रकार से विरोध कर सकें। मध्यम प्रकार के लोग विचारपूर्वक इस क्षय और नाश की प्रक्रिया को देखते हैं और उसके प्रति जागरूक भी होते हैं। वे अपने भाग्य के विषय में सोचकर आशंकित हो जाते हैं। वे यह नहीं जानते कि विनाश से वस्तुत कोई हानि नहीं होती? और समस्त प्राणियों के अपरिहार्य अन्त से भयकम्पित हो जाते हैं।परन्तु इनसे भिन्न उत्तम पुरुषों का एक वर्ग और भी है? जिन्हें समष्टि के स्वरूप एवं व्यवहार अर्थात् कार्यप्रणाली का पूर्ण ज्ञान होता है। उन्हें इस बात का भय कभी स्पर्श नहीं करता कि दैनिक जीवन में होने वाली घटनाएं उनके साथ भी घट सकती हैं। समुद्र के स्वरूप को पहचानने वालों को तरंगों के नाश से चिन्तित होने का कारण नहीं रहता है। इसी प्रकार? जब सिद्ध पुरुष उस महान विनाश को देखते हैं? जो एक मरणासन्न संस्कृति के पुनर्निमाण के पूर्व होता है? तब वे सत्य की इस महान शक्ति को पहचान कर ईश्वर निर्मित भावी जगत् के लिए शान्ति और कल्याण की कामना करते हैं। जिस किसी भी दृष्टि से हम इस काव्य का अध्ययन करते हैं? हम पाते हैं कि स्वयं व्यासजी कितने महान् मनोवैज्ञानिक हैं और उन्होंने कितनी सुन्दरता से यहाँ मानवीय व्यवहार के ज्ञान को एकत्र किया है? जिससे कि मनुष्य शीघ्र विकास करके अपने पूर्णत्व के लक्ष्य तक पहुँच सके।इस दर्शनीय दृश्य को देखकर स्वर्ग के देवताओं की क्या प्रतिक्रया हुई अर्जुन उसे बताते हुए कहता है
English Translation By Swami Sivananda
Verily, into Thee enter these hosts of gods; some extol Thee in fear with joined palms; saying 'may it be well', bands of great sages and perfected ones praise Thee with hymns complete.
Transliteration
amī hi tvāṃ surasaṅghāḥ viśanti kecidbhītāḥ prāñjalayo gṛṇanti
svastītyuktvā maharṣisiddhasaṅghāḥ stuvanti tvāṃ stutibhiḥ puṣkalābhiḥअनुवाद
वे देवताओं के समूह आप ही में प्रवेश कर रहे हैं, कुछ भयभीत होकर हाथ जोड़े हुए आपकी प्रार्थना कर रहे हैं। ‘कल्याण हो!’ ऐसा कहकर महर्षियों और सिद्धों के समूह उत्तम स्तोत्रों द्वारा आपकी स्तुति कर रहे हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण के विश्वरूप के प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं। वे देख रहे हैं कि स्वर्ग के देवता और सिद्ध पुरुष भगवान के इस विराट और उग्र रूप को देखकर विस्मित और भयभीत हैं। वे भगवान की शरण में जा रहे हैं और जगत के कल्याण की प्रार्थना करते हुए उनकी स्तुति कर रहे हैं।
Translation
Indeed, those hosts of demigods are entering into You; some, filled with fear, are praising You with joined palms. Saying, ‘May there be peace!’, crowds of great sages and perfected beings are praising You with sublime hymns.
Meaning
In this verse, Arjuna describes the impact of Lord Krishna’s cosmic form on celestial beings. He observes that hosts of demigods and perfected beings are entering into the Lord, some in awe and fear with folded hands. Pronouncing auspicious prayers for the universe, they glorify the Supreme Lord with beautiful hymns.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अमी | वे सब |
| ही | निश्चय ही |
| त्वाम् | आपमें |
| सुर-सङ्घाः | देवताओं के समूह |
| विशन्ति | प्रवेश कर रहे हैं |
| केचित् | कुछ |
| भीताः | भयभीत होकर |
| प्राञ्जलयः | हाथ जोड़े हुए |
| गृणन्ति | प्रार्थना कर रहे हैं |
| स्वस्ति | कल्याण हो |
| इति | ऐसा |
| उक्त्वा | कहकर |
| महर्षि-सिद्ध-सङ्घाः | महर्षियों और सिद्धों के समूह |
| स्तुवन्ति | स्तुति कर रहे हैं |
| त्वाम् | आपकी |
| स्तुतिभिः | स्तोत्रों द्वारा |
| पुष्कलाभिः | उत्कृष्ट / श्रेष्ठ |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| amī | those |
| hi | indeed |
| tvām | You |
| sura-saṅghāḥ | hosts of gods |
| viśanti | are entering |
| kecit | some |
| bhītāḥ | fearful |
| prāñjalayaḥ | with folded hands |
| gṛṇanti | are praising |
| svasti | may there be peace / auspiciousness |
| iti | thus |
| uktvā | saying |
| maharṣi-siddha-saṅghāḥ | assemblies of great sages and perfected souls |
| stuvanti | are praising |
| tvām | You |
| stutibhiḥ | with hymns |
| puṣkalābhiḥ | sublime / abundant |