श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग

Bhagavad Gita 11.20

मूल श्लोक :

द्यावापृथिव्योरिदमन्तरं हि     व्याप्तं त्वयैकेन दिशश्च सर्वाः
दृष्ट्वाऽद्भुतं रूपमुग्रं तवेदं     लोकत्रयं प्रव्यथितं महात्मन्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

हे महात्मन् यह स्वर्ग और पृथ्वीके बीचका अन्तराल और सम्पूर्ण दिशाएँ एक आपसे ही परिपूर्ण हैं। आपके इस अद्भुत और उग्ररूपको देखकर तीनों लोक व्यथित (व्याकुल) हो रहे हैं।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

विराट् पुरुष समस्त जगत् को व्याप्त किये हुए है? और देशकाल का भी अपना स्वतन्त्र अस्तित्व नहीं है। वे भी इस सत्य पर ही आश्रित हैं। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ वर्णित विषयवस्तु अनन्त है? सनातन है। इसीलिए यहाँ अर्जुन कहता है? अकेले आपके द्वारा स्वर्ग और पृथ्वी के मध्य का आकाश और समस्त दिशाएं व्याप्त हैं।विश्व की एकता को सरलता से ग्रहण नहीं किया जा सकता। जो जितना ही अधिक उसे समझता है? उसका वर्णन करने में उतना ही अधिक वह लड़खड़ाता है। इतने विशाल और भव्य सत्य को देखकर परिच्छिन्न बुद्धि का कम्पित हो जाना स्वाभाविक ही है।अर्जुन कहता है? इस अद्भुत और भयंकर रूप को देखकर तीनों लोक भय कम्पित हो रहे हैं। यह एक मनोवैज्ञानिक सत्य है कि प्रत्येक मनुष्य जगत् को उसी रूप में देखता है जैसा कि वह स्वयं होता है। यथा दृष्टि तथा सृष्टि। विराट् का दर्शन करके अर्जुन भयभीत हुआ और उस मनस्थिति में जब वह जगत् को देखता है? तो तीनों लोक भी विस्मित और भय कम्पित दिखाई देते हैं। व्यासजी की यह विशेषता है कि विशाल और गम्भीर विषयवस्तु के वर्णन में व्यस्त होते हुए भी वे मनुष्य के मूलभूत आचरण को भूलते नहीं हैं और उनके ये सूक्ष्म निरीक्षण ही इस अतुलनीय सौन्दर्य और अपरिमेय गम्भीर चित्र को वास्तविकता की आभा प्रदान करते हैं।

English Translation By Swami Sivananda

This space between the earth and the heaven and all the arters are filled by Thee alone; having seen this, Thy wonderful and teriible form, the three worlds are trembling with fear, O great-souled Being.

Transliteration

dyāvāpṛthivyoridamantaraṃ hi vyāptaṃ tvayaikena diśaśca sarvāḥ
dṛṣṭvā'dbhutaṃ rūpamugraṃ tavedaṃ lokatrayaṃ pravyathitaṃ mahātman

अनुवाद

स्वर्ग और पृथ्वी के बीच का यह संपूर्ण अंतराल और सभी दिशाएँ अकेले आपके द्वारा ही व्याप्त हैं हे महात्मन्! आपके इस अद्भुत और उग्र रूप को देखकर तीनों लोक अत्यंत भयभीत हो रहे हैं

भावार्थ

इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण के विश्वरूप की सर्वव्यापकता और उसके प्रभाव का वर्णन कर रहे हैं। वे देखते हैं कि भगवान का यह विराट रूप स्वर्ग, पृथ्वी और सभी दिशाओं में फैला हुआ है। इस अत्यंत उग्र और विस्मयकारी रूप को देखकर तीनों लोकों के प्राणी भय से व्याकुल हो रहे हैं।

Translation

The space between heaven and earth and all the directions are pervaded by You alone O Great Soul, seeing this wondrous and terrible form of Yours, the three worlds are trembling with fear

Meaning

In this verse, Arjuna describes the all-pervading nature of Lord Krishna’s cosmic form and its impact. He observes that this divine form fills the entire space between heaven and earth, as well as all directions. Seeing this terrifying yet wondrous manifestation, all the three worlds are trembling with fear and awe.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
द्यावापृथिव्योःस्वर्ग और पृथ्वी के
इदम्यह
अन्तरम्बीच का स्थान (अंतराल)
हिनिश्चय ही
व्याप्तम्व्याप्त है
त्वयाआपके द्वारा
एकेनअकेले
दिशःदिशाएँ
चऔर
सर्वाःसभी
दृष्ट्वादेखकर
अद्भुतम्अद्भुत
रूपम्रूप को
उग्रम्उग्र (भयानक)
तवआपका
इदम्यह
लोकत्रयम्तीनों लोक
प्रव्यथितम्अत्यंत भयभीत (व्याकुल)
महात्मन्हे महात्मन् (महान आत्मा वाले)

Word by word

WordMeaning
dyāvāpṛthivyoḥof heaven and earth
idamthis
antaramspace between
hiindeed
vyāptamis pervaded
tvayāby You
ekenaalone
diśaḥdirections
caand
sarvāḥall
dṛṣṭvāseeing
adbhutamwondrous
rūpamform
ugramterrible
tavaYour
idamthis
lokatrayamthe three worlds
pravyathitamare trembling with fear
mahātmanO Great Soul