श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग

Bhagavad Gita 11.19

मूल श्लोक :

अनादिमध्यान्तमनन्तवीर्य     मनन्तबाहुं शशिसूर्यनेत्रम्
पश्यामि त्वां दीप्तहुताशवक्त्रम्      स्वतेजसा विश्वमिदं तपन्तम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

आपको मैं आदि? मध्य और अन्तसे रहित? अनन्त प्रभावशाली? अनन्त भुजाओंवाले? चन्द्र और सूर्यरूप नेत्रोंवाले? प्रज्वलित अग्निके समान मुखोंवाले और अपने तेजसे संसारको संतप्त करते हुए देख रहा हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

अर्जुन की सूक्ष्म दृष्टि ने जैसा देखा और बुद्धि ने जैसा समझा? उसे वह जगत् की वस्तुओं की भाषा में वर्णन करने का प्रयत्न करता है। मैं आपको आदि? अन्त और मध्य से रहित? अनन्त सार्मथ्य से युक्त? अनन्त बाहुओं वाला देखता हूँ। व्यास के प्रभावशाली काव्य द्वारा चित्रित यह शब्दचित्र ऐसा आभास निर्माण करता है कि मानों इस कविता की विषयवस्तु बाह्यजगत् की कोई दृश्य वस्तु हैं। अनेक चित्रकार उसे कागज पर रंगों के द्वारा चित्रित करना चाहते हैं। परन्तु वेदान्त के बुद्धिमान् विद्यार्थी को उनका अज्ञान स्पष्ट दिखाई देता है। आदि? मध्य और अन्त रहित ऐसी अनन्त वस्तु कभी सीमित फलक वाले चित्र की मर्यादा में व्यक्त नहीं की जा सकती। परन्तु? अनन्तबाहु इस शब्द को सुनकर प्रेरित हुए चित्रकार उसे तत्काल चित्रित करने का प्रयत्न करते हैं। वस्तुत? कवि के इन्द्रियातीत अनुभव की दृष्टि के समक्ष जगत् की सभी दृश्यावलियों से सर्वथा भिन्न और अनुपम जो विराट् दृश्य उपस्थित है? वास्तव में उसे केवल गम्भीर अध्ययनकर्ता सूक्ष्मदर्शी विद्यार्थी ही समझ,सकते हैं।यहाँ अनन्तबाहु का अर्थ केवल यह है कि परमात्मा ही वह चेतन तत्त्व है? जो समस्त बाहुओं को कार्य करने और सफलता पाने की आवश्यक सार्मथ्य प्रदान करता है।जो प्रकाश तत्त्व बाह्य वस्तुओं को प्रकाशित करता है वही हमारे नेत्रों पर भी अनुग्रह करता हुआ उन्हें वस्तु के दर्शन करने की योग्यता प्रदान करता है। यहाँ किया गया वर्णन समष्टि की दृष्टि से है? क्योंकि जगत् में हम सूर्य या चन्द्रमा के प्रकाश में वस्तुओं को देखते हैं? उन्हें यहाँ वेदान्त की शास्त्रीय भाषा में विराटपुरुष के नेत्र कहा गया है। हुताशवक्त्रम् (दीप्त अग्निरूपी मुखवाला)  हुताश का अर्थ है अग्नि। वाणी का अधिष्ठाता देवता अग्नि है। इसीलिए? सभी भाषाओं में इस प्रकार के वाक्प्रचार प्रसिद्ध हैं कि उनमें गरमागरम बहस हुई? उसके उस वाक्य ने चिनगारी का काम किया इत्यादि। मुख ही भक्षण का तथा वाणी का स्थान होने से यहाँ अग्नि को विराटपुरुष का मुख कहा गया है।अपने तेज से विश्व को तपाते हुए आत्मा चैतन्य स्वरूप ही हो सकता है? क्योंकि प्राणीमात्र के समस्त अनुभवों को सर्वदा चैतन्य ही प्रकाशित करता है। यह चैतन्य न केवल वस्तुओं को प्रकाशित करता है? वरन् सूर्य के द्वारा समस्त विश्व के जीवन के लिए आवश्यक उष्णता भी प्रदान करता है। इस कथन से यह सिद्ध हो जाता है कि बाह्य जगत् का निरीक्षण और अध्ययन करने के पश्चात् ही हिन्दू ऋषियों ने अपनी दृष्टि को अन्तर्मुखी बनाया था। ऐसा प्रतीत होता है कि वे यह जानते थे कि किसी एक विशेष तापमान पर ही पृथ्वी पर जीवन संभव है उससे न्यून या अधिक तापमान होने पर जीवन लुप्त हो जायेगा।सत्य का यह प्रकाश उसका स्वस्वरूप है? और न कि किसी अन्य स्रोत से प्राप्त किया हुआ है। स्वतेजसा शब्द से यह बात स्पष्ट की गई है। उसी से जीवन धारण किया हुआ है।अर्जुन आगे कहता है

English Translation By Swami Sivananda

I see Thee without beginning, middle or end, infinite in power, of endless arms, the sun and the moon being Thy eyes, the burning fire Thy mouth, heating the whole universe with Thy radiance.

Transliteration

anādimadhyāntamanantavīryam anantabāhuṃ śaśisūryanetram
paśyāmi tvāṃ dīptahutāśavaktram svatejasā viśvamidaṃ tapantam

अनुवाद

मैं आपको आदि, मध्य और अंत से रहित, अनंत सामर्थ्य से युक्त, अनंत भुजाओं वाले, चन्द्रमा और सूर्य रूपी नेत्रों वाले, प्रज्वलित अग्नि के समान मुख वाले और अपने तेज से इस संपूर्ण जगत को संतप्त करते हुए देख रहा हूँ।

भावार्थ

इस श्लोक में अर्जुन भगवान श्रीकृष्ण के विराट रूप का अत्यंत विस्मयकारी वर्णन कर रहे हैं। वे देखते हैं कि इस परम रूप की न तो कोई शुरुआत है, न मध्य और न ही कोई अंत। भगवान का तेज इतना प्रचंड है कि वह संपूर्ण ब्रह्मांड को तपा रहा है, जो उनकी असीम शक्ति और सर्वव्यापकता को दर्शाता है।

Translation

I see You without beginning, middle, or end, of infinite power, with manifold arms, with the sun and moon as Your eyes, with Your mouth like a blazing sacrificial fire, heating this entire universe by Your own radiance.

Meaning

In this verse, Arjuna describes the awe-inspiring cosmic form of Lord Krishna. He perceives this supreme form as having no beginning, middle, or end, symbolizing eternity. The intense radiance emanating from the Lord is described as heating the entire universe, highlighting His limitless power and omnipresence.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अनादि-मध्य-अन्तम्आदि, मध्य और अंत से रहित
अनन्त-वीर्यम्अनंत पराक्रम वाले
अनन्त-बाहुम्अनंत भुजाओं वाले
शशि-सूर्य-नेत्रम्चन्द्रमा और सूर्य रूपी नेत्रों वाले
पश्यामिमैं देखता हूँ
त्वाम्आपको
दीप्त-हुताश-वक्त्रम्प्रज्वलित अग्नि के समान मुख वाले
स्व-तेजसाअपने तेज से
विश्वम्जगत को
इदम्इस
तपन्तम्तपाते हुए

Word by word

WordMeaning
anādi-madhya-antamwithout beginning, middle, or end
ananta-vīryamof infinite power
ananta-bāhumwith infinite arms
śaśi-sūrya-netramhaving the moon and sun as eyes
paśyāmiI see
tvāmYou
dīpta-hutāśa-vaktramhaving a mouth like blazing fire
sva-tejasāby Your own radiance
viśvamthe universe
idamthis
tapantamheating