श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग

Bhagavad Gita 11.18

मूल श्लोक :

त्वमक्षरं परमं वेदितव्यं    त्वमस्य विश्वस्य परं निधानम्
त्वमव्ययः शाश्वतधर्मगोप्ता    सनातनस्त्वं पुरुषो मतो मे

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

आप ही जाननेयोग्य परम अक्षर (अक्षरब्रह्म) हैं? आप ही इस सम्पूर्ण विश्वके परम आश्रय हैं? आप ही सनातनधर्मके रक्षक हैं और आप ही अविनाशी सनातन पुरुष हैं -- ऐसा मैं मानता हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

सभी बुद्धिमान् पुरुष अपने प्रत्येक अनुभव से किसी निष्कर्ष तक पहुँचने का प्रयत्न करते हैं? जो उनका ज्ञान कहलाता है। अर्जुन को भी ऐसा ही एक अनुभव हो रहा था? जो अपनी सम्पूर्णता में बुद्धि से अग्राह्य और शब्दों से अनिर्वचनीय था। परन्तु उसने जो कुछ देखा? उससे वह कुछ निष्कर्ष निकालने का प्रयत्न करता है। इस अनुभव को समझकर वह इस निष्कर्ष पर पहुँचता है कि इस विराट्स्वरूप के पीछे जो शक्ति या चैतन्य है? वही अविनाशी परम सत्य है।समुद्र में उत्पत्ति? स्थिति और लय को प्राप्त होने वाली समस्त तरंगांे का प्रभव या स्रोत समुद्र होता है। वही उन तरंगों का निधान है। निधान का अर्थ है जिसमें वस्तुएं निहित हों अर्थात् उनका आश्रय। इसी प्रकार अर्जुन भी इस बुद्धिमत्तापूर्ण निष्कर्ष पर पहुँचता है कि विराट् पुरुष ही सम्पूर्ण विश्व का निधान अर्थात् अधिष्ठान है। विश्व शब्द से केवल यह दृष्ट भौतिक जगत् ही नहीं समझना चाहिये। वेदान्त के अनुसार जो वस्तु दृष्ट अनुभूत या ज्ञात है? वह विश्व शब्द की परिभाषा में आती है? इस परिभाषा के अनुसार विषय तथा उनके ग्राहक करण इन्द्रिय? मन आदि सब विश्व है और पुरुष उसका निधान है।विकारी वस्तुओं के विकारों अर्थात् परिवर्तनों के लिए एक अविकारी अधिष्ठान की आवश्यकता होती है। यह परिवर्तनशील जगत् सदैव देश और काल की धुन पर नृत्य करता रहता है। परन्तु? घटनाओं की निरंतरता का अनुभव कर उनका एक सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने के लिए एक नित्य अपरिवर्तनशील ज्ञाता का होना अत्यावश्यक है। वह ज्ञाता किसी भी प्रकार से स्वयं उन घटनाओं में लिप्त नहीं होता है। ऐसा यह अविकारी चेतन तत्त्व ही वह सत्य आत्मा है? जो इतने विशाल विश्वरूप को धारण कर सकता है। इन विचारों को ध्यान में रखकर अर्जुन यह घोषणा करता है कि वह चेतन तत्त्व? जिसने स्वयं को इस आश्चर्यमय रूप में परिवर्तित कर लिया है? वही एकमेव अविनाशी अपरिवर्तनशील सत्य है? जो इस विकारी जगत् में सर्वत्र व्याप्त है।हिन्दुओं के मत के अनुसार धर्म का रक्षक स्वयं परमेश्वर है? और न कि एक र्मत्य राजा या पुरोहित वर्ग। हिन्दू लोग किसी ऐसे आकस्मिक देवदूत के अनुयायी नहीं हैं? जिसका क्षणिक ऐतिहासिक अस्तित्त्व था और जिसके जीवन का कार्य तत्कालीन पीढ़ी की यथासंभव सेवा करना था। हिन्दुओं के लिए सनातन सत्य पुरुष ही लक्ष्य है? गुरु है और मार्ग भी है। धर्म की रक्षा के लिए हमें विषैली गैस अथवा अणुबम जैसी किसी लौकिक शक्ति की आवश्यकता नहीं है।आप ही सनातन पुरुष हैं? ऐसा मेरा मत है  वेदान्त के एक रूपक के अनुसार स्थूल शरीर को एक राजनगरी के समान माना गया है और जिसके नौ द्वार हैं। प्रत्येक का नियंत्रण तथा रक्षण एकएक अधिष्ठातृ देवता के द्वारा किया जाता है। इस नवद्वार पुरी में निवास करने वाला चैतन्य तत्त्व पुरुष कहलाता है।इस श्लोक के संदर्भ में इसका अभिप्राय यह है कि हमारे जीवन की पहेली का समाधान इस सनातन पुरुष की प्राप्ति में ही है? न कि बाह्य जगत् के विषयों में। यह पुरुष ही विश्व का अधिष्ठान है? जो विश्वरूप को धारण कर सकता है? जिसको अर्जुन विस्मय भरी दृष्टि से देख रहा है।

English Translation By Swami Sivananda

Thou art the Imperishable, the Supreme Being, worthy to be known. Thou art the great treasure-house of this universe; Thou art the imperishable protector of the eternal Dhrama; Thou art the Primal Person, I deem.

Transliteration

tvamakṣaraṃ paramaṃ veditavyaṃ tvamasya viśvasya paraṃ nidhānam
tvamavyayaḥ śāśvatadharmagoptā sanātanastvaṃ puruṣo mato me

अनुवाद

आप ही जानने योग्य परम अक्षर (विनाशरहित ब्रह्म) हैं। आप ही इस ब्रह्मांड के परम आश्रय हैं। आप ही अविनाशी और सनातन धर्म के रक्षक हैं। मेरी सम्मति में आप ही सनातन पुरुष हैं।

भावार्थ

इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण के विश्वरूप को देखकर उनकी महिमा का गान कर रहे हैं। वे स्वीकार करते हैं कि कृष्ण ही उपनिषदों में वर्णित परम सत्य (अक्षर ब्रह्म) हैं, जिन्हें जानना ही जीवन का अंतिम लक्ष्य है। वे ही इस संपूर्ण सृष्टि के आधार और सनातन धर्म के शाश्वत रक्षक हैं।

Translation

You are the supreme imperishable Akshara to be realized. You are the ultimate support of this universe. You are the changeless protector of the eternal dharma. In my opinion, You are the primeval, everlasting Purusha.

Meaning

In this verse, Arjuna praises the cosmic form of Lord Krishna, recognizing Him as the supreme imperishable reality (Brahman) described in the Upanishads. He acknowledges Krishna as the ultimate resting place of the universe and the eternal guardian of the cosmic order (dharma). Arjuna declares his firm conviction that Krishna is the primeval, divine Being.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
त्वम्आप
अक्षरम्अविनाशी (अक्षर ब्रह्म)
परमम्परम
वेदितव्यम्जानने योग्य
त्वम्आप
अस्यइस
विश्वस्यब्रह्मांड के
परम्परम
निधानम्आश्रय / आधार
त्वम्आप
अव्ययःअविनाशी / विकाररहित
शाश्वत-धर्म-गोप्तासनातन धर्म के रक्षक
सनातनःशाश्वत / आदि-अंत से रहित
त्वम्आप
पुरुषःपरम पुरुष
मतःस्वीकार किए गए हैं / माने गए हैं
मेमेरे द्वारा (मेरी सम्मति में)

Word by word

WordMeaning
tvamYou
akṣaramthe imperishable
paramamsupreme
veditavyamto be known
tvamYou
asyaof this
viśvasyauniverse
paramthe supreme
nidhānambasis / resting place
tvamYou
avyayaḥimperishable / inexhaustible
śāśvata-dharma-goptāprotector of the eternal dharma
sanātanaḥeternal
tvamYou
puruṣaḥSupreme Person
mataḥconsidered / held
meby me