Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.13
मूल श्लोक :
तत्रैकस्थं जगत्कृत्स्नं प्रविभक्तमनेकधा
अपश्यद्देवदेवस्य शरीरे पाण्डवस्तदाHindi Translation By Swami Ramsukhdas
उस समय अर्जुनने देवोंके देव भगवान्के शरीरमें एक जगह स्थित अनेक प्रकारके विभागोंमें विभक्त सम्पूर्ण जगत्को देखा।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अर्जुन ने भगवान के उस ईश्वरीय रूप में देखा कि किस प्रकार सम्पूर्ण जगत् अपनी विविधता के साथ लाकर एक स्थान पर स्थित कर दिया गया था। हम देख चुके हैं कि विराट् पुरुष की संकल्पना ऐसे मन के द्वारा देखा गया दृश्य है जो देश और काल के माध्यम में कार्य नहीं कर रहा है अर्थात् देश और काल की कल्पना लोप हो चुकी है।अनेक को एक में देखने का जो दृश्य है? वह उतना इन्द्रियगोचर नहीं है जितना कि बुद्धिग्राह्य है। यह नहीं कि सम्पूर्ण विश्व संकुचित होकर भगवान् श्रीकृष्ण के देह परिमाण का हो गया है। यदि अर्जुन को जगत् के एकत्व का अपेक्षित बोध हो और यदि वह उस ज्ञान की दृष्टि से विश्व को देख सके? तो यही पर्याप्त है।आधुनिक विज्ञान से भी इसके समान दृष्टांत उद्धृत किया जा सकता है। रसायनशास्त्र में द्रव्यों का वर्गीकरण करके उनका अध्ययन किया जाता है। जगत् की रसायन वस्तुओं का अध्ययन करने से ज्ञात होता है कि जगत् में लगभग एक सौ तीन तत्व है। और अधिक सूक्ष्म अध्ययन से वैज्ञानिक लोग परमाणु तक पहँचे? अब उसका भी विभाजन करके पाया गया कि परमाणु भी इलेक्ट्रॉन? प्रोटॉन और न्यूट्रॉन से बना है। परमाणु के इस स्वरूप से सुपरिचित वैज्ञानिक जब बहुविध जगत् की ओर देखता है? तब उसे यह जानना सरल होता है कि ये सभी पदार्थ परमाणुओं से बने हैं। इसी प्रकार? यहाँ जब अर्जुन को श्रीकृष्ण की अहैतुकी कृपाप्रसाद से यह विशेष ज्ञान्ा प्राप्त हुआ? तब वह भगवान् के शरीर में ही सम्पूर्ण विश्व को देखने में समर्थ हो गया।इस दृश्य को देखकर अर्जुन के शरीर और मन पर होने वाली प्रतिक्रियाओं को संजय ने ध्यानपूर्वक देखा और उनका विवरण सुनाते हुए वह कहता है
English Translation By Swami Sivananda
There, in the body of the God of gods, Arjuna then saw the whole universe resting in one, with its many groups.
Transliteration
tatraikasthaṃ jagatkṛtsnaṃ pravibhaktamanekadhā
apaśyaddevadevasya śarīre pāṇḍavastadāअनुवाद
वहाँ (उस समय) पाण्डुपुत्र अर्जुन ने देवों के देव भगवान् श्रीकृष्ण के शरीर में अनेक प्रकार से विभक्त हुए सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड को एक स्थान पर स्थित देखा
भावार्थ
संजय धृतराष्ट्र को बताते हैं कि दिव्य दृष्टि प्राप्त करने के बाद अर्जुन ने भगवान कृष्ण के विश्वरूप में क्या देखा। अर्जुन ने देखा कि अनेक भागों में विभाजित यह सम्पूर्ण चराचर ब्रह्माण्ड भगवान के एक ही शरीर में समाया हुआ है। यह दृश्य भगवान की अनंत महिमा और उनकी सर्वव्यापकता को प्रकट करता है।
Translation
There, at that time, Arjuna saw the entire universe, divided into many parts, gathered together in one place within the body of the God of gods.
Meaning
Sanjaya describes to Dhritarashtra what Arjuna witnessed after receiving the divine vision. Arjuna saw the entire cosmos, with all its diverse divisions and manifold creations, existing united in one single place within the universal body of Lord Krishna. This emphasizes the supreme nature of the Lord as the source and container of all existence.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तत्र | वहाँ (उस शरीर में) |
| एकस्थम् | एक स्थान पर स्थित |
| जगत् | ब्रह्माण्ड को |
| कृत्स्नम् | सम्पूर्ण |
| प्रविभक्तम् | विभक्त (अनेक भागों में बँटा हुआ) |
| अनेकधा | अनेक प्रकार से |
| अपश्यत् | देखा |
| देवदेवस्य | देवों के देव (श्रीकृष्ण) के |
| शरीरे | शरीर में |
| पाण्डवः | पाण्डुपुत्र अर्जुन ने |
| तदा | तब (उस समय) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| tatra | there |
| ekastham | situated in one place |
| jagat | the universe |
| kṛtsnam | entire |
| pravibhaktam | divided |
| anekadhā | into many parts |
| apaśyat | saw |
| devadevasya | of the God of gods |
| śarīre | in the body |
| pāṇḍavaḥ | Arjuna (the son of Pandu) |
| tadā | then |