Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग
Bhagavad Gita 11.11
मूल श्लोक :
दिव्यमाल्याम्बरधरं दिव्यगन्धानुलेपनम्
सर्वाश्चर्यमयं देवमनन्तं विश्वतोमुखम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
जिसके अनेक मुख और नेत्र हैं? अनेक तहरके अद्भुत दर्शन हैं? अनेक दिव्य आभूषण हैं और हाथोंमें उठाये हुए अनेक दिव्य आयुध हैं तथा जिनके गलेमें दिव्य मालाएँ हैं? जो दिव्य वस्त्र पहने हुए हैं? जिनके ललाट तथा शरीरपर दिव्य चन्दन आदि लगा हुआ है? ऐसे सम्पूर्ण आश्चर्यमय? अनन्तरूपवाले तथा चारों तरफ मुखवाले देव(अपने दिव्य स्वरूप) को भगवान्ने दिखाया।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
जब कोई चित्रकार अपने कलात्मक विचार को रंगों के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयत्न करता है? तो वह प्रारम्भ में एक पट्ट पर अपने विषयवस्तु की अस्पष्ट रूपरेखा खींचता है। तत्पश्चात्? एकएक इंच में वह रंगों को भर कर चित्र को और अधिक स्पष्ट करता जाता है। अन्त में वह चित्र उस चित्रकार के सन्देश का गीत गाते हुये प्रतीत होता है। इसी प्रकार? साहित्य के कुशल चित्रकार व्यासजी के द्वारा चित्रित इस शब्दचित्र का यह श्लोक संजय के शब्दों में भगवान् के विश्वरूप की रूपरेखा खींचता है।संजय के समक्ष जो दृश्य प्रस्तुत हुआ है? वह सामान्य बुद्धि के पुरुष के द्वारा सरलता से ग्रहण करने योग्य कदापि नहीं कहा जा सकता। इस वैभवपूर्ण एवं शक्तिशाली दृश्य को देखकर सामान्य पुरुष तो भय और विस्मय से भौचक्का ही रह जायेगा। सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड कोई मन के द्वारा कल्पना किया जाने योग्य विषय नहीं है और न ही बुद्धि उसको ग्रहण कर सकती है। इसलिए? जब गीतोपदेश के मध्य यह दृश्य उपस्थित हो जाता है? तब संजय भी वर्णन करते हुए कुछ हकलाने लगता है।दिव्य माला और वस्त्रों को धारण किये हुए? दिव्य गन्ध का लेपन किये हुए? सर्वाश्चर्यमय? विश्वतोमुख भगवान् इत्यादि शब्द चित्रकार के उन वक्र चिह्नों के प्रतीक हैं जिनके लगाने पर विराट् रूप का चित्र उसकी रूपरेखा में पूर्ण होता है।संजय आगे वर्णन करता है
English Translation By Swami Sivananda
Wearing divine garlands (necklaces) and apparel, anointed with divine unguents, the all-wonderful, resplendent (Being) endless with faces on all sides.
Transliteration
divyamālyāmbaradharaṃ divyagandhānulepanam
sarvāścaryamayaṃ devamanantaṃ viśvatomukhamअनुवाद
दिव्य मालाओं और वस्त्रों को धारण किए हुए, दिव्य गंध (अनुलेप) का लेप किए हुए, सब प्रकार के आश्चर्यों से युक्त, प्रकाशमय, असीम और सब ओर मुख वाले (विराट रूप को अर्जुन ने देखा)
भावार्थ
इस श्लोक में संजय धृतराष्ट्र को भगवान कृष्ण के परम विराट रूप की अद्भुत महिमा का वर्णन कर रहे हैं। अर्जुन ने जिस विश्वरूप के दर्शन किए, वह दिव्य आभूषणों, मालाओं और सुगंधों से सुसज्जित था। वह रूप असीम था, जिसका कोई अंत नहीं था, और वह सभी दिशाओं में देख रहा था अर्थात् सर्वव्यापी था।
Translation
Wearing celestial garlands and garments, anointed with divine perfumes, full of all wonders, resplendent, infinite, and facing in all directions.
Meaning
In this verse, Sanjaya describes the awe-inspiring cosmic form of Lord Krishna to Dhritarashtra. The universal form witnessed by Arjuna was adorned with celestial ornaments, garlands, and divine fragrances. It was limitless, infinite, and possessed faces looking in all directions, representing the omnipresence of the Supreme Lord.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| दिव्य | अलौकिक / दिव्य |
| माल्य | मालाओं को |
| अम्बर | और वस्त्रों को |
| धरम् | धारण किए हुए |
| दिव्य | दिव्य |
| गन्ध | सुगंधियों का |
| अनुलेपनम् | लेप किए हुए |
| सर्व | सब प्रकार के |
| आश्चर्य-मयम् | आश्चर्यों से युक्त |
| देवम् | प्रकाशमान / परमेश्वर को |
| अनन्तम् | अन्तहीन / असीम |
| विश्वतः-मुखम् | सब ओर मुख वाले |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| divya | divine |
| mālya | garlands |
| ambara | and garments |
| dharam | wearing |
| divya | divine |
| gandha | fragrances |
| anulepanam | anointed with |
| sarva | all |
| āścarya-mayam | full of wonders |
| devam | the resplendent Lord |
| anantam | infinite |
| viśvataḥ-mukham | facing in all directions |