श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 11 · विश्वरूपदर्शनयोग

Bhagavad Gita 11.1

मूल श्लोक :

अर्जुन उवाच
मदनुग्रहाय परमं गुह्यमध्यात्मसंज्ञितम्
यत्त्वयोक्तं वचस्तेन मोहोऽयं विगतो मम

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

(टिप्पणी प0 573.1) अर्जुन बोले -- केवल मेरेपर कृपा करनेके लिये ही आपने जो परम गोपनीय अध्यात्मतत्त्व जाननेका वचन कहा? उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

पूर्व अध्याय में वर्णित भगवान् की विभूतियों को जानते से हुए अपने परम सन्तोष को? अर्जुन इस प्रारम्भिक श्लोक में व्यक्त करता है। अपने शिष्य पर केवल अनुग्रह करने और उसे मोहदशा से बाहर निकालने के लिए भगवान् ने जो इतना अधिक परिश्रम किया? अर्जुन उसकी भी प्रशंसा करता है। अनेकता में एकता का दर्शन करने का अर्थ संसार के दुख से सुरक्षित रहने के लिए रोग निरोधक टीका लगवाना है। अर्जुन की इस स्वीकारोक्ति से कि? मेरा मोह दूर हो गया है? व्यासजी? एक उत्तम विद्यार्थी पर पड़ने वाले पूर्व अध्याय के प्रभाव को बड़ी सुन्दरता से हमारे ध्यान में लाते हैं।मोह निवृत्ति? सत्य के ज्ञान का एक पक्ष है? न कि वह अपने आप में ज्ञान की प्राप्ति। अर्जुन अज्ञान के कारण नामरूपमय इस सृष्टि में अपना अलग और स्वतन्त्र अस्तित्व अनुभव कर रहा था। वह अब इस भेद के मोह से मुक्त हो चुका था। उसे वह दृष्टि मिल गयी? जिसके द्वारा वह इस भेदात्मक दृश्य जगत् में ही व्याप्त एक सत्ता को देख पाने में समर्थ हो जाता है। परन्तु फिर भी उसने अनेकता में एकता का प्रात्यक्षिक दर्शन नहीं किया था। यद्यपि सिद्धान्तत उसे इस एकत्व का ज्ञान स्वीकार्य था।राजपुत्र अर्जुन यह भलीभांति जानता है कि श्रीकृष्ण ने विभूतियोग का इतना विस्तृत वर्णन केवल उसके ऊपर अनुग्रह करने के लिए ही किया था। यह हमें इस बात का स्मरण कराता है कि किस प्रकार भगवान् अपने भक्तों के हृदय में स्थित उनके अज्ञानजनित अंधकार को नष्ट कर देते हैं।ये अध्यात्मविषयक वचन क्या थे अर्जुन कहता है

English Translation By Swami Sivananda

Arjuna said  By this word (explanation) of the highest secret concerning the Self which Thou hast spoken, for the sake of blessing me, my delusion is gone.

Transliteration

arjuna uvāca
madanugrahāya paramaṃ guhyam adhyātmasaṃjñitam
yat tvayoktaṃ vacas tena moho 'yaṃ vigato mama

अनुवाद

अर्जुन ने कहा — मुझ पर अनुग्रह करने के लिए आपके द्वारा जो परम गोपनीय अध्यात्म-विषयक वचन कहा गया है, उससे मेरा यह मोह नष्ट हो गया है

भावार्थ

इस अध्याय के आरम्भ में अर्जुन भगवान कृष्ण के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि भगवान के गोपनीय उपदेशों को सुनकर उनका अज्ञान और मोह पूरी तरह से दूर हो गया है। यह कथन अर्जुन द्वारा भगवान के दिव्य विश्वरूप को देखने की इच्छा प्रकट करने की पृष्ठभूमि तैयार करता है।

Translation

Arjuna said: Out of compassion for me, the supreme secret discourse concerning the Self which has been spoken by You, by that this delusion of mine is gone

Meaning

At the beginning of this chapter, Arjuna expresses his deep gratitude to Lord Krishna. He admits that his delusion and ignorance have been completely dispelled after hearing the confidential spiritual instructions regarding the Self. This acknowledgment sets the stage for Arjuna’s subsequent request to behold the Lord’s cosmic form.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
अर्जुनःअर्जुन
उवाचबोले
मत्-अनुग्रहायमुझ पर कृपा करने के लिए
परमम्परम
गुह्यम्गोपनीय
अध्यात्म-संज्ञितम्अध्यात्म नामक
यत्जो
त्वयाआपके द्वारा
उक्तम्कहा गया
वचःवचन
तेनउससे
मोहःमोह
अयम्यह
विगतःनष्ट हो गया है
मममेरा

Word by word

WordMeaning
arjunaḥArjuna
uvācasaid
mat-anugrahāyafor the sake of showing favor to me
paramamsupreme
guhyamconfidential
adhyātma-saṃjñitamknown as spiritual
yatwhich
tvayāby you
uktamspoken
vacaḥwords
tenaby that
mohaḥdelusion
ayamthis
vigataḥis gone
mamamy