Chapter 10 · विभूतियोग
Bhagavad Gita 10.5
मूल श्लोक :
अहिंसा समता तुष्टिस्तपो दानं यशोऽयशः
भवन्ति भावा भूतानां मत्त एव पृथग्विधाःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
बुद्धि? ज्ञान? असम्मोह? क्षमा? सत्य? दम? शम? सुख? दुःख? भव? अभाव? भय? अभय? अहिंसा? समता? तुष्टि? तप? दान? यश और अपयश -- प्राणियोंके ये अनेक प्रकारके और अलगअलग (बीस) भाव मेरेसे ही होते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
प्रस्तुत प्रकरण के विचार को ही आगे बढ़ाते हुए कि परमात्मा ही सम्पूर्ण विश्व का उपादान और निमित्त कारण है? भगवान् श्रीकृष्ण इन दो श्लोकों में उन विविध गुणों को गिनाते हैं? जो मनुष्य के मन और बुद्धि में व्यक्त होते हैं।साधारणत? सृष्टि शब्द से केवल हम भौतिक जगत् ही समझते हैं। परन्तु उपर्युक्त समस्त गुण उसके व्यापक एवं सर्वग्राहक अर्थ को सूचित करते हैं। उनसे यह स्पष्ट ज्ञात होता है कि जगत् शब्द के अर्थ में हमारे मानसिक और बौद्धिक जीवन भी सम्मिलित हैं।पुन सभी मनुष्यों और प्राणियों का वर्गीकरण इन्हीं गुणों के आधार पर किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति अपने गुण या स्वभाव के वशीभूत है। यथा मन तथा मनुष्य। ध्यान देने योग्य बात यह है कि यहाँ केवल शुभ दैवी गुणों का ही गणना की गई है। संस्कृत व्याख्याकारों की पारम्परिक शैली का अनुकरण करते हुए? श्लोक में प्रयुक्त च शब्द की व्याख्या यह की जा सकती है कि उसके द्वारा विरोधी अशुभ गुणों को भी यहाँ सूचित किया गया है। तथापि भगवान् केवल शुभ गुणों को ही स्पष्टत बताते हैं? क्योंकि जिस व्यक्ति में इन गुणों का अधिकता होती है? उसमें आत्मा की शुद्धता एवं दिव्यता के दर्शन होते हैं।इन विभिन्न प्रकार की भावनाओं एवं विचारों से प्रेरित होकर प्रत्येक व्यक्ति अपनेअपने संस्कारों के अनुसार कर्म में प्रवृत्त होता है। इस प्रकार यहाँ विविध प्रकार के जीवन दृष्टिगोचर होते है। ये समस्त गुण? मुझसे ही प्रकट होते हैं। स्तम्भ में प्रतीत हुआ प्रेत चाहे प्रेम से मन्दस्मित करे या क्रोध से खिसियाये अथवा प्रतिशोध की भावना से धमकाये? उसका मन्द स्मित या धमकाना इत्यादि गुणों का केवल एक अधिष्ठान है स्तम्भ। आत्मचैतन्य के बिना बुद्धि? ज्ञान आदि गुणों का न अस्तित्व है और न भान।इन गुणों के द्वारा सम्पूर्ण प्राणियों का तथा उनके अनुभवों का प्राय पूर्ण वर्गीकरण किया गया है। इसलिए जैसा कि शंकराचार्य कहते हैं? ये दो श्लोक आत्मा का सर्वलोकमहेश्वर होना सिद्ध करते हैं।
English Translation By Swami Sivananda
Non-injury, eanimity, contentment, austerity, beneficence, fame, ill-fame (these) different kinds of alities of beings arise from Me alone.
Transliteration
ahiṃsā samatā tuṣṭistapo dānaṃ yaśo'yaśaḥ
bhavanti bhāvā bhūtānāṃ matta eva pṛthagvidhāḥअनुवाद
अहिंसा, समता, संतोष, तप, दान, कीर्ति और अपकीर्ति — प्राणियों के ये विविध प्रकार के भाव मुझसे ही उत्पन्न होते हैं।
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण समझाते हैं कि मनुष्यों के भीतर पाए जाने वाले सभी मानसिक और नैतिक गुण, चाहे वे सकारात्मक हों या नकारात्मक, उनके ही संकल्प से उत्पन्न होते हैं। अहिंसा, समता, संतोष, तपस्या, दान, यश और अपयश जैसी सभी भावनाएं और अवस्थाएं परमेश्वर की ही शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। यह दर्शाता है कि सृष्टि की प्रत्येक मानसिक अवस्था का मूल स्रोत केवल भगवान ही हैं।
Translation
Non-violence, equanimity, contentment, austerity, charity, fame, and infamy — these diverse qualities of living beings arise from Me alone.
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains that all the various mental and moral qualities found in living beings, whether positive or negative, originate from Him alone. Attributes such as non-violence, equanimity, contentment, austerity, charity, fame, and infamy are different manifestations of His divine energy. This emphasizes that the Supreme Lord is the ultimate source of all psychological states and conditions in existence.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अहिंसा | अहिंसा (किसी को न सताना) |
| समता | समता (समभाव) |
| तुष्टिः | संतोष |
| तपः | तपस्या |
| दानम् | दान |
| यशः | कीर्ति (यश) |
| अयशः | अपकीर्ति (अपयश) |
| भवन्ति | होते हैं |
| भावाः | भाव (गुण) |
| भूतानाम् | प्राणियों के |
| मत्तः | मुझसे |
| एव | ही |
| पृथक्-विधाः | विविध प्रकार के |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| ahiṃsā | non-violence |
| samatā | equanimity |
| tuṣṭiḥ | contentment |
| tapaḥ | austerity |
| dānam | charity |
| yaśaḥ | fame |
| ayaśaḥ | infamy |
| bhavanti | arise |
| bhāvāḥ | qualities |
| bhūtānām | of living beings |
| mattaḥ | from Me |
| eva | alone |
| pṛthagvidhāḥ | of diverse kinds |