Chapter 10 · विभूतियोग
Bhagavad Gita 10.42
मूल श्लोक :
अथवा बहुनैतेन किं ज्ञातेन तवार्जुन
विष्टभ्याहमिदं कृत्स्नमेकांशेन स्थितो जगत्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
अथवा हे अर्जुन तुम्हें इस प्रकार बहुतसी बातें जाननेकी क्या आवश्यकता है मैं अपने किसी एक अंशसे सम्पूर्ण जगत्को व्याप्त करके स्थित हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
यद्यपि मित्रता और स्नेह के उत्स्फूर्त भावावेश में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपनी विभूति (समष्टि रूप) और योग ( व्यष्टि रूप) को वर्णन करने का वचन दिया था? परन्तु एकएक उदाहरण देते समय उन्होंने अपने को इस कार्य के लिए सर्वथा असमर्थ पाया। अनन्त तत्त्व के अनन्त विस्तार का वर्णन कैसे संभव हो सकता है असमर्थता के कारण उन्हें विषाद है किन्तु पुन अपने शिष्य के प्रति अत्यन्त प्रेम के कारण? भगवान् श्रीकृष्ण सम्पूर्ण अध्याय का सार इस अन्तिम श्लोक में बताते हैं।इस बहुत जानने से तुम्हारा क्या प्रयोजन है वास्तव मे देखा जाय? तो अनन्त तत्त्व को प्रत्येक परिच्छिन्न रूप में दर्शाने का प्रयत्न व्यर्थ ही है? क्योंकि वह असंभव है। मिट्टी को समस्त विद्यमान घटों में तथा जल को सम्पूर्ण तरंगों में एकएक करके दिखाना असंभव है। केवल इतना ही किया जा सकता है कि कुछ उदाहरणों के द्वारा विद्यार्थियों को तत्त्व का दर्शन करने की कला को सिखाया जाय। गणित के अध्यापन में इसी पद्धति का उपयोग किया जाता है।मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंश मात्र से धारण करके स्थित हूँ वेदान्त में जगत् शब्द में वे समस्त अनुभव समाविष्ट है? जो हम अपनी इन्द्रियों? मन और बुद्धि के द्वारा प्राप्त करते हैं। संक्षेप में जिन वस्तुओं को हम दृश्य रूप में जानते हैं? वे सभी जगत् शब्द की परिभाषा में आते हैं। इसमें दृश्य पदार्थ? भावनाएं? विचार और उनको ग्रहण करने वाली इन्द्रियादि उपाधियाँ भी सम्मिलित हैं।इस श्लोक की दूसरी पंक्ति में भगवान् श्रीकृष्ण आत्मस्वरूप की दृष्टि से कहते हैं कि यह सम्पूर्ण जगत् उनके एक अंश मात्र में धारण किया हुआ है। इस कथन का एक और दार्शनिक अभिप्राय यह है कि सत्य का अधिकांश भाग इस जगत् तथा उसके विकारों से सर्वथा निर्लिप्त है यद्यपि सर्वत्र समान रूप से व्याप्त अखण्ड सत्य में इस प्रकार अंशों का भेद नहीं किया जा सकता? तथापि लौकिक परिच्छिन्न भाषा के शब्दों द्वारा पारमार्थिक सत्य को निर्देशित करने की यह एक औपनिषदीय पद्धति है।conclusion तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषस्तु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे,श्रीकृष्णार्जुनसंवादे विभूतियोगो नाम दशमोऽध्याय।।इस प्रकार श्रीकृष्णार्जुनसंवाद के रूप में ब्रह्मविद्या और योगशास्त्र स्वरूप श्रीमद्भगवद्गीतोपनिषद् का विभूतियोग नामक दंसवा अध्याय समाप्त होता है।
English Translation By Swami Sivananda
But, of what avail to thee is the knowledge of all these details, O Arjuna? I exist, supporting this whole world by one part of Myself.
Transliteration
athavā bahunaitena kiṃ jñātena tavārjuna
viṣṭabhyāhamidaṃ kṛtsnamekāṃśena sthito jagatअनुवाद
अथवा हे अर्जुन! इस बहुत से ज्ञान से तुम्हें क्या प्रयोजन है? मैं इस संपूर्ण जगत् को अपने केवल एक अंश से धारण करके स्थित हूँ
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण अपनी विभूतियों के वर्णन का उपसंहार करते हैं। वे अर्जुन से कहते हैं कि मेरे अनंत रूपों और ऐश्वर्यों को अलग-अलग जानने की कोई विशेष आवश्यकता नहीं है। इस संपूर्ण ब्रह्मांड का अस्तित्व मेरे केवल एक लघु अंश मात्र से ही टिका हुआ है, जो मेरी अनंत शक्ति को दर्शाता है।
Translation
Or, what is the use of all this detailed knowledge to you, O Arjuna? I exist, supporting this entire universe with only a single fraction of Myself
Meaning
In this verse, Lord Krishna concludes the description of His divine opulences. He tells Arjuna that there is no need to know all His manifestations in detail. The entire universe is sustained and pervaded by just a single fraction of His divine power, illustrating His infinite nature.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अथवा | या फिर |
| बहुना | बहुत अधिक |
| एतेन | इस (विस्तृत ज्ञान) से |
| किम् | क्या (प्रयोजन) |
| ज्ञातेन | जानने से |
| तव | तुम्हारा |
| अर्जुन | हे अर्जुन |
| विष्टभ्य | व्याप्त करके (धारण करके) |
| अहम् | मैं |
| इदम् | इस |
| कृत्स्नम् | संपूर्ण |
| एक-अंशेन | एक अंश मात्र से |
| स्थितः | स्थित हूँ |
| जगत् | जगत् को |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| athavā | or |
| bahunā | detailed / much |
| etena | by this |
| kim | what (use) |
| jñātena | by knowing |
| tava | of you |
| arjuna | O Arjuna |
| viṣṭabhya | supporting / pervading |
| aham | I |
| idam | this |
| kṛtsnam | entire |
| eka-aṃśena | by a single fraction |
| sthitaḥ | exist / am situated |
| jagat | universe |