श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 10 · विभूतियोग

Bhagavad Gita 10.38

मूल श्लोक :

दण्डो दमयतामस्मि नीतिरस्मि जिगीषताम्
मौनं चैवास्मि गुह्यानां ज्ञानं ज्ञानवतामहम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

दमन करनेवालोंमें दण्डनीति और विजय चाहनेवालोंमें नीति मैं हूँ। गोपनीय भावोंमें मौन और ज्ञानवानोंमें ज्ञान मैं हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

मैं दमन करने वालों का दण्ड हूँ  शासक राजा और शासित प्रजा इन दोनों को ही अपने राज्य के विभिन्न जन समुदायों के रहनसहन के स्तर को ऊंचा उठाने के लिए साथसाथ परिश्रम करना होता है। शासक को यह देखना चाहिए कि वह विधिनियमों को लागू करके उनके द्वारा शासन करे। इस प्रकार के शासन के कार्य में उन असामाजिक तत्त्वों को दण्डित करना भी आवश्यक होता हैं? जो अपने स्वार्थ के वश में समाज के विद्यमान नियमों की अवहेलना करते हैं। सामान्य प्रजा शासन के प्रति आदर और निष्ठा होने के कारण शासकों के नियमों और दण्ड के अधीन द्मरहती है। परन्तु प्रश्न यह है कि वह कौन है? जो दुराचारियों को दण्डित करने का अधिकार राजा अथवा राष्ट्रपति को प्रदान करता है आधुनिक शासन प्रणालियों में व्यक्तियों को अपने हाथों में कानून लेने का कोई अधिकार नहीं है।राजा राजदण्ड को धारण करता है? जो उसकी सत्ता और दमन के अधिकार का चिह्न है। प्रजातान्त्रीय शासन प्रणाली में राष्ट्रपति या प्रधानमन्त्री को यह अधिकार जनता का बहुमत प्राप्त होने से मिलता है। मार्ग में खड़े हुए आरक्षी (पुलिसमेन) का गणवेश अपराधियों को गिरफ्तार करने के उसके अधिकार का सूचक होता है। राजदण्ड से रहित राजा? जनमत के बिना राष्ट्रपति और एक निलम्बित आरक्षी अपने पूर्व के अधिकारों से वंचित हो जाते हैं। अत यहाँ भगवान् कहते हैं कि मैं दमन करने वालों का दण्ड हूँ। समाज अनुमति सूचक चिह्न के बिना किसी भी एक व्यक्ति का समाज पर कोई अधिकार नहीं होता। क्योंकि? आखिर? राजा या राष्ट्रपति? पुलिस य्ाा न्यायाधीश ये सभी वस्तुत समाज के ही सदस्य होते हैं? परन्तु वे समाज के संरक्षक के रूप में जो कार्य करते हैं? वह विशेष अधिकार उन्हें अपने पद के कारण प्राप्त होता है।मैं विजयेच्छुओं की नीति हूँ  यहाँ नीति शब्द का अर्थ राजनीति से है । इतिहास के ग्रन्थों में यह तथ्य बारम्बार दोहराया गया है कि केवल शारीरिक शक्ति से शत्रु पर प्राप्त की गई विजय वास्तविक विजय कदापि नहीं होती। वस्तुत किसी भी राष्ट्र? समाज? समुदाय या व्यक्ति को केवल इसलिए विजयी नहीं मानना चाहिए कि उसने अपनी सैनिक तथा शारीरिक शक्ति से शत्रुओं को परास्त कर दिया है। वास्तविक व पूर्ण विजय वही है जिसमें विजेता पक्ष बुद्धिमत्तापूर्वक लागू की गई शासन की नीतियों के द्वारा पराजित पक्ष को अपनी संस्कृति एवं विचारधारा में परिवर्तित कर देता है। यदि विजेता? पराजित लोगों का सांस्कृतिक परिवर्तन कराने में अथवा स्वयं उनकी संस्कृति को ग्रहण करने में समर्थ नहीं है? तो उसकी विजय कदापि पूर्ण नहीं कही जा सकती। इतिहास के प्रत्येक विद्यार्थी के लिए यह एक खुला रहस्य है। सैनिक विजय के पश्चात् कुशल राजनीति के द्वारा ही पराजित पक्ष का वास्तविक धर्मान्तरण हो सकता है? और केवल तभी पराजित पक्ष पूर्णत विजेता के वश में हुआ कहा जा सकता है। अत यहाँ कहा गया है कि? विजयेच्छुओं की नीति मैं हूँ।मैं गोपनीय में मौन हूँ  किसी तथ्य की गोपनीयता बनाये रखने का एकमात्र उपाय है  मौन। किसी तथ्य के विषय में खुली चर्चा करने पर उसकी गोपनीयता ही समाप्त हो जाती है। इस प्रकार? किसी रहस्य का सारतत्त्व ही मौन है। यह भी ध्यान देने योग्य बात है कि अध्यात्मशास्त्र में आत्मज्ञान का वर्णन भी गुह्यतम अथवा राजगुह्य के रूप में किया गया है? क्योंकि सामान्यत यह ज्ञात नहीं है। इस महान् सत्य की अनुभूति की निरन्तरता बनाये रखने का उपाय भी आन्तरिक मौन ही है। सब गुह्यों में? भगवान् गहन गम्भीर और अखण्ड मौन हैंज्ञानवान का ज्ञान मैं हूँ  बुद्धिमानों में बुद्धिमत्ता ही स्वयं बुद्धिमान् नहीं हैं? किन्तु वह उससे भिन्न भी नहीं है। आत्मा यह देह नहीं? परन्तु हम यह भी नहीं कह सकते हैं कि देह सर्वव्यापी आत्मा से कोई भिन्न वस्तु है। जड़ उपाधियां और उसके अनुभव  ये सब विभूति की आभा हैं? जो आत्मा के आसपास आलोकवलय में चमकती रहती हैं। ज्ञाता का ज्ञान या बुद्धिमान् की बुद्धिमत्ता परमात्मा की विभूति की अभिव्यक्ति है? जो उन पुरुषों के संस्कारों का परिणाम है।अब तक विवेचन किये गये विषय का अत्यन्त सुन्दर उपसंहार करते हुए भगवान् कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

Of those who punish, I am the sceptre; among those who seek victory, I am statesmanship; and also among secrets, I am silence; knowledge among knowers I am.

Transliteration

daṇḍo damayatāmasmi nītirasmi jigīṣatām
maunaṃ caivāsmi guhyānāṃ jñānaṃ jñānavatāmaham

अनुवाद

दमन करने वालों का दण्ड मैं हूँ, विजय चाहने वालों की नीति मैं हूँ रहस्यों में मौन भी मैं ही हूँ और ज्ञानियों का ज्ञान मैं हूँ

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए शासन, नीति, रहस्य और ज्ञान के सर्वोत्तम रूपों को स्वयं का स्वरूप बताते हैं। वे दमन करने वालों की दण्ड-शक्ति हैं जो न्याय और व्यवस्था बनाए रखती है। वे विजय की इच्छा रखने वालों की नीति (नैतिक मार्ग) हैं, गुप्त रखने योग्य विषयों में मौन हैं, और ज्ञानियों का वास्तविक ज्ञान हैं।

Translation

Of those who punish, I am the rod of chastisement; of those who seek victory, I am statesmanship; of secrets, I am silence; and of the wise, I am the wisdom.

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes His divine manifestations by identifying Himself with the core essence of governance, strategy, secrecy, and wisdom. He is the power of punishment that maintains order, the moral policy of those seeking victory, the silence that guards secrets, and the actual wisdom of the wise.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
दण्डःदण्ड (सजा देने की शक्ति)
दमयताम्दमन करने वालों का
अस्मिहूँ
नीतिःनीति (न्यायपूर्ण मार्ग)
अस्मिहूँ
जिगीषताम्विजय चाहने वालों की
मौनम्मौन
चऔर
एवही
अस्मिहूँ
गुह्यानाम्रहस्यों का / गुप्त रखने योग्य बातों का
ज्ञानम्ज्ञान
ज्ञानवताम्ज्ञानियों का
अहम्मैं

Word by word

WordMeaning
daṇḍaḥpunishment (the rod of chastisement)
damayatāmof those who punish/subdue
asmiI am
nītiḥmorality/statesmanship
asmiI am
jigīṣatāmof those who seek victory
maunamsilence
caand
evaindeed
asmiI am
guhyānāmof secrets
jñānamthe wisdom
jñānavatāmof the wise
ahamI