श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 10 · विभूतियोग

Bhagavad Gita 10.36

मूल श्लोक :

द्यूतं छलयतामस्मि तेजस्तेजस्विनामहम्
जयोऽस्मि व्यवसायोऽस्मि सत्त्वं सत्त्ववतामहम्

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

छल करनेवालोंमें जूआ और तेजस्वियोंमें तेज मैं हूँ। जीतनेवालोंकी विजय? निश्चय करनेवालोंका निश्चय और सात्त्विक मनुष्योंका सात्त्विक भाव मैं हूँ।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

मैं द्यूत हूँ  गीता का उपदेश अपने समय के एक क्षत्रिय राजा योद्धा अर्जुन को दिया गया था। इसका उपदेश भगवान् श्रीकृष्ण ने? धर्मप्रचारक के महान् उत्साह के साथ? अर्जुन को उसके अपने ही धर्म का बोध कराने के लिए किया था इसलिए गीता का प्रयत्न हिन्दुओं को ही हिन्दू बनाने का है? उन्हें स्वधर्म का पुनर्बोध कराने का है। यह पुनर्बोध का कार्य तब तक सफलतापूर्वक नहीं किया जा सकता जब तक हमारे धर्मशास्त्रों का मर्म सामान्य जनता को उसकी ही भाषा में समझाया नहीं जाता। यहाँ दिया हुआ उदाहरण अर्जुन को तत्क्षण ही समझ में आने जैसा है। कारण यह है कि उसका सम्पूर्ण जीवन दुखों की एक शृंखला थी? जिसे उसे सहन करना पड़ा था? केवल अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की द्यूत खेलने के व्यसन के कारण। कोई अन्य दृष्टान्त अर्जुन के लिए इतना सुबोध नहीं हो सकता था।आधुनिक पीढ़ी को सम्भवत यह उदाहरण इतना अधिक सुबोध न प्रतीत होता हो? क्योंकि अब द्यूत का खेल अधिक लोकप्रिय नहीं रहा है। किन्तु उसके स्थान पर अन्य उदाहरण सरलता से पहचाने जा सकते हैं।मैं तेजस्वियों का तेज हूँ  विभूति के इस दृष्टान्त का उपयोग जो साधक ध्यानाभ्यास के लिए करना चाहेगा? उसे ज्ञात होगा कि यहाँ शास्त्र ने कुछ कहा ही नहीं है। तेजस्वी वस्तुओं का जो तेज है? उसमें उस वस्तु के गुण नहीं होते हैं। उस तेज में अपने स्वयं के गुण भी नहीं होते  तेज केवल एक अनुभव है। इस अनुभव को सहज सुगम बनाने के लिए? मन उस वस्तु के परिमाण और वैभव को प्रकाशित करता है? परन्तु अनुभूति तेज में उस वस्तु के उपादान भूत पदार्थ के कुछ भी गुण नहीं होते। संक्षेप में जैसा कि श्रीरामकृष्ण परमहंस ने एक बार कहा था निसन्देह सत्य एक प्रकाश है? परन्तु वह गुणरहित प्रकाश है।मैं विजय हूँ उद्यमशीलता हूँ और मैं साधुओं की साधुता हूँ  जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है? यहाँ भी ये गुण मन की उस स्थिति या दशा को बताते हैं? जो इस प्रकार के निरन्तर चिन्तन से निर्मित होती है। जब उद्यमशीलता और साधुता जैसे गुणों को बनाये रखा जाता है? तब मन अत्यन्त शान्त और स्थिर हो जाता है जिसमें चैतन्य आत्मा का प्रतिबिम्वित वैभव इतना स्पष्टऔर तेजस्वी होता है कि मानो वही स्वयं सत्य है। अत पूर्वकथित गुणों की प्रत्यारोपण की भाषा में भगवान् कहते हैं कि ये गुण ही मैं हूँ? जबकि वस्तुत ये अन्तकरण के धर्म हैं।हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि यहाँ अनेकता में एक परमात्मा की विद्यमानता दर्शाने के लिए जो 54 उदाहरण दिये गये हैं? वे सब एक निष्ठावान साधक को ध्यान के लिए बताये हुए अभ्यास हैं। यह कोई दृश्य पदार्थ का वर्णन नहीं समझना चाहिए। इन श्लोकों के तात्पर्यार्थ को जब तक साधक अपने निज के अनुभव से नहीं समझता? तब तक उसकी शिक्षा पूर्ण नहीं कही जा सकती।भगवान् और भी दृष्टान्त देते हुए कहते हैं

English Translation By Swami Sivananda

I am the gambling of the fraudulent; I am the splendour of the splendid; I am victory; I am determination (of those who are determined); I am the goodness of the good.

Transliteration

dyūtaṃ chalayatāmasmi tejastejasvināmaham
jayo'smi vyavasāyo'smi sattvaṃ sattvavatāmaham

अनुवाद

छल करने वालों में मैं जुआ हूँ और तेजस्वियों में मैं तेज हूँ मैं विजय हूँ, मैं निश्चय हूँ और सात्विक पुरुषों में मैं सत्त्व हूँ

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अपनी विभूतियों का वर्णन करते हुए कहते हैं कि छल करने वालों में वे जुआ (द्यूत क्रीड़ा) हैं, जो कि छल का सबसे बड़ा रूप है। वे तेजस्वी पुरुषों का तेज हैं, विजेताओं की विजय हैं, उद्योगी पुरुषों का निश्चय हैं और सात्विक पुरुषों का सत्त्व गुण हैं। इसका अर्थ यह है कि संसार में जो कुछ भी उत्कृष्ट, बलशाली या प्रभावकारी है, वह सब ईश्वर की ही शक्ति का अंश है।

Translation

Of those who deceive, I am gambling; of the splendid, I am the splendor I am victory, I am resolve, and I am the goodness of the good

Meaning

In this verse, Lord Krishna describes His divine manifestations, stating that among deceitful practices, He is gambling, which represents the ultimate form of deception. He is the splendor of the splendid, the victory of the victorious, the resolve of the industrious, and the goodness of the virtuous. This emphasizes that all extraordinary qualities, strengths, and efforts in the universe originate from His divine energy.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
द्यूतम्जुआ
छलयताम्छल करने वालों में
अस्मिहूँ
तेजःतेज
तेजस्विनाम्तेजस्वी पुरुषों का
अहम्मैं
जयःविजय
अस्मिहूँ
व्यवसायःनिश्चय (या प्रयत्न)
अस्मिहूँ
सत्त्वम्सत्त्व गुण (या बल)
सत्त्ववताम्सात्विक पुरुषों का
अहम्मैं

Word by word

WordMeaning
dyūtamgambling
chalayatāmof the deceitful
asmiI am
tejaḥthe splendor
tejasvināmof the splendid
ahamI
jayaḥvictory
asmiI am
vyavasāyaḥresolve (or effort)
asmiI am
sattvamgoodness (or strength)
sattvavatāmof the virtuous
ahamI