Chapter 10 · विभूतियोग
Bhagavad Gita 10.20
मूल श्लोक :
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव चHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे नींदको जीतनेवाले अर्जुन सम्पूर्ण प्राणियोंके आदि? मध्य तथा अन्तमें भी मैं ही हूँ और प्राणियोंके अन्तःकरणमें आत्मरूपसे भी मैं ही स्थित हूँ।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
भूतमात्र के हृदय में स्थित आत्मा मैं ही हूँ इस सामान्य कथन के साथ श्रीकृष्ण इस प्रकरण का प्रारम्भ करते हैं। वैज्ञानिक विचारपद्धति से शोधकार्य करने का एक सुप्रशिक्षित प्राध्यापक? अनुसंधान के अपने प्रिय विषय की चर्चा का प्रारम्भ एक संक्षिप्त व सारपूर्ण कथन के साथ करता है। तत्पश्चात् वह उस विषय का विस्तार से विचार करके युक्तियुक्त विवेचन के द्वारा अन्त में उसी प्रारम्भिक कथन के निष्कर्ष पर पहुँचता है। यहाँ पर भी हम देखेंगे कि इस अध्याय की समाप्ति पर भगवान् इसी विचार को और अधिक प्रभावशाली ढंग से दोहराते हैं कि मैं इस सम्पूर्ण जगत् को अपने एक अंशमात्र से धारण करके स्थित हूँ।इस श्लोक की पहली पंक्ति में भगवान् अपनी सर्वात्मकता दर्शाते हैं और दूसरी पंक्ति में इसी भाव को प्रकारान्तर से बताते हैं कि मैं समस्त भूतों का आदि? मध्य और अन्त हूँ। वस्तुत बाह्य चराचर जगत् मन की प्रक्षेपित सृष्टि है दूसरे शब्दों में बाह्य जगत् परिच्छिन्न मन के द्वारा किया गया अनन्त का अन्यथा दर्शन है। यह तथ्य आन्तरिक वैचारिक जगत् से सम्बन्धित भी समझा जा सकता है। प्रत्येक बुद्धिवृत्ति चैतन्य में प्रकट होकर उसी में लीन हो जाती है। चैतन्य के अभाव में वृत्ति की उत्पत्ति नहीं हो सकती। आगे भी इसी विचार को दोहराया गया है। भगवान् श्रीकृष्ण इस महान् सत्य को दोहराते कभी नहीं थकते हैं।इस चराचर जगत् में रहते हुए ईश्वरोपासना की साधनाओं को या पद्धति को अब बताते हैं।
English Translation By Swami Sivananda
I am the Self, O Gudakesa, seated in the hearts of all beings; I am the beginning, the middle and also the end of all beings.
Transliteration
aham ātmā guḍākeśa sarvabhūtāśayasthitaḥ
aham ādiś ca madhyaṃ ca bhūtānām anta eva caअनुवाद
हे गुडाकेश (अर्जुन)! मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित अंतर्यामी आत्मा हूँ तथा मैं ही समस्त प्राणियों का आदि, मध्य और अंत भी हूँ
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को अपनी मुख्य विभूतियों का वर्णन आरंभ करते हुए बताते हैं कि वे ही प्रत्येक जीव के भीतर स्थित आत्मा हैं। वे सृष्टि के आदि, मध्य और अंत के रूप में सर्वव्यापी हैं। इसका अर्थ है कि संसार की कोई भी वस्तु या जीव परमात्मा से पृथक नहीं है।
Translation
I am the Self, O Gudakesha, seated in the hearts of all creatures I am the beginning, the middle, and indeed the end of all beings
Meaning
In this verse, Lord Krishna begins describing His divine opulences to Arjuna, declaring that He is the innermost Self residing in the hearts of all living entities. He is the source, the sustaining middle, and the ultimate end of all existence. This emphasizes that nothing exists apart from the Supreme Divine.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अहम् | मैं |
| आत्मा | आत्मा (प्रत्येक जीव का स्वरूप) |
| गुडाकेश | हे गुडाकेश (नींद को जीतने वाले अर्जुन) |
| सर्व-भूत-आशय-स्थितः | समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित |
| अहम् | मैं |
| आदिः | आदि (उत्पत्ति का कारण) |
| च | और |
| मध्यम् | मध्य (स्थिति) |
| च | और |
| भूतानाम् | प्राणियों का |
| अन्तः | अंत (प्रलय) |
| एव | ही |
| च | भी |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| aham | I |
| ātmā | the Self |
| guḍākeśa | O Gudakesha (Arjuna, the conqueror of sleep) |
| sarva-bhūta-āśaya-sthitaḥ | seated in the hearts of all living beings |
| aham | I |
| ādiḥ | the beginning |
| ca | and |
| madhyam | the middle |
| ca | and |
| bhūtānām | of all beings |
| antaḥ | the end |
| eva | indeed |
| ca | also |