श्रीमद् भगवद्गीता

Chapter 10 · विभूतियोग

Bhagavad Gita 10.19

मूल श्लोक :

श्री भगवानुवाच
हन्त ते कथयिष्यामि दिव्या ह्यात्मविभूतयः
प्राधान्यतः कुरुश्रेष्ठ नास्त्यन्तो विस्तरस्य मे

Hindi Translation By Swami Ramsukhdas

श्रीभगवान् बोले -- हाँ? ठीक है। मैं अपनी दिव्य विभूतियोंको तेरे लिये प्रधानतासे (संक्षेपसे) कहूँगा क्योंकि हे कुरुश्रेष्ठ मेरी विभूतियोंके विस्तारका अन्त नहीं है।

Hindi Commentary By Swami Chinmayananda

प्रस्तुत अध्याय को बृहत् आकार देने वाला भगवान् श्रीकृष्ण का यह विस्तृत एवं व्याख्यापूर्ण उत्तर? एकएक वस्तु और व्यक्ति में तथा उनके समूह में आत्मा की वास्तविक पहचान का वर्णन करता है। यहाँ विशेष ध्यान देने योग्य बात यह है कि अपनी विभूति और योग का वर्णन करते समय भगवान् श्रीकृष्ण निम्नलिखित दो बातों को बताने का विशेष ध्यान रखते हैं। (क) प्रत्येक वस्तु में अपना सर्वोच्च महत्त्व? (ख) उनके बिना किसी भी एक वस्तु या समूह का सामञ्जस्यपूर्ण अस्तित्व सम्भव नहीं हो सकता।इस खण्ड का प्रारम्भ जिस हन्त शब्द से होता है? वह अर्जुन के प्रति गीताचार्य के प्रेमपूर्ण सहानुभूति को दर्शाता है? तथा उससे अर्जुन में प्रतीत होने वाली अक्षमता के प्रति भगवान् की चिन्ता भी व्यक्त होती है? क्योंकि उस अक्षमता के कारण वह उस तत्त्व को नहीं अनुभव कर पा रहा था जो उसके अत्यन्त समीप है? उसका स्वरूप ही है। हन्त शब्द को इस खण्ड के प्रारम्भ का केवल सूचक मानने में उसमें निहित गूढ़ अभिप्राय का लोप हो जाने के कारण वह अर्थ स्वीकार्य नहीं हो सकता।समष्टि और व्यष्टि उपाधियों के द्वारा इस बहुविध सृष्टि के रूप में व्यक्त हुए आत्मा के विस्तार का अन्त नहीं हो सकता। इसलिए उसका वर्णन करना असंभव है? तथापि करुणासागर भगवान् श्रीकृष्ण अपने शरणागत् शिष्य अर्जुन के प्रति अपनी असीम अनुकम्पा के कारण इस असंभव कार्य को अपने हाथ में लेते हैं। वे स्वीकार करते हैं कि उनके विस्तार का कोई अन्त नहीं है फिर भी वे अर्जुन को अपनी प्रधान विभूतियाँ बतायेंगे।भौतिक जगत् में यह एक अनुभूत सत्य है कि सूर्यप्रकाश सभी वस्तुओं की सतह पर से परावर्तित होता है  चाहे वह पाषाण हो या दर्पण किन्तु दर्पण में उसका प्रतिबिम्ब या परावर्तन अधिक स्पष्ट और तेजस्वी होता है। भगवान् वचन देते हैं कि वे ऐसे दृष्टान्त देंगे जिनमें दिव्यता की अभिव्यक्ति के साक्षात् दर्शन हो सकते हैं।परन्तु? उन विभूतियों के वर्णन में प्रवेश करने के पूर्व एक मूलभूत सत्य को बताते हैं

English Translation By Swami Sivananda

The Blessed Lord said  Very well! Now I will declare to thee My divine glories in their prominence, O Arjuna; there is no end to their detailed description.

Transliteration

śrībhagavānuvāca
hanta te kathayiṣyāmi divyā hyātmavibhūtayaḥ
prādhānyataḥ kuruśreṣṭha nāstyanto vistarasya me

अनुवाद

श्री भगवान् ने कहा — हे कुरुश्रेष्ठ! अब मैं तुमसे अपनी उन दिव्य विभूतियों के विषय में कहूँगा जो मुख्य हैं, क्योंकि मेरे विस्तार का कोई अंत नहीं है

भावार्थ

इस श्लोक में भगवान कृष्ण अर्जुन के प्रश्न का उत्तर देना आरम्भ करते हैं। वे कहते हैं कि उनकी दिव्य विभूतियाँ अनंत हैं और उनका पूर्ण वर्णन करना असंभव है। इसलिए, वे केवल उन मुख्य और महत्वपूर्ण विभूतियों का वर्णन करेंगे जो अर्जुन के लिए समझने योग्य हैं।

Translation

The Supreme Lord said: O best of the Kurus, yes, I will declare to you My divine manifestations, keeping to those that are prominent, for there is no end to My extent

Meaning

In this verse, Lord Krishna begins to answer Arjuna’s request about His divine opulences. He explains that His manifestations are limitless and cannot be fully described. Therefore, He promises to reveal only His most prominent and essential glories.

शब्दार्थ

शब्दअर्थ
श्रीभगवान्श्री भगवान्
उवाचने कहा
हन्तहाँ / अब
तेतुम्हारे लिए
कथयिष्यामिमैं वर्णन करूँगा
दिव्याःअलौकिक / दिव्य
हिनिश्चय ही
आत्म-विभूतयःअपनी विभूतियों को
प्राधान्यतःमुख्य-मुख्य
कुरुश्रेष्ठहे कुरुश्रेष्ठ (अर्जुन)
ननहीं
अस्तिहै
अन्तःअंत
विस्तरस्यविस्तार का
मेमेरे

Word by word

WordMeaning
śrī-bhagavānthe Supreme Lord
uvācasaid
hantayes / now
teunto you
kathayiṣyāmiI shall speak
divyāḥdivine
hiindeed
ātma-vibhūtayaḥMy own opulences
prādhānyataḥprincipally / in terms of prominence
kuru-śreṣṭhaO best of the Kurus
nanot
astithere is
antaḥlimit / end
vistarasyaof the extent
meof Mine