Chapter 10 · विभूतियोग
Bhagavad Gita 10.18
मूल श्लोक :
विस्तरेणात्मनो योगं विभूतिं च जनार्दन
भूयः कथय तृप्तिर्हि श्रृण्वतो नास्ति मेऽमृतम्Hindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे जनार्दन आप अपने योग (सामर्थ्य) को और विभूतियोंको विस्तारसे फिर कहिये क्योंकि आपके अमृतमय वचन सुनतेसुनते मेरी तृप्ति नहीं हो रही है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
दर्शनशास्त्र के तथा अन्य किसी विषय के विद्यार्थी में भी? सर्वप्रथम प्रखर जिज्ञासा का होना अत्यावश्यक है। विषय को जानने और समझने की इस जिज्ञासा के बिना कोई भी ज्ञान दृढ़ नहीं होता है और न विद्यार्थी के लिए वह लाभदायक ही हो सकता है। आत्मविकास के आध्यात्मिक ज्ञान में यह बात विशेष रूप से लागू होती है क्योंकि अन्य ज्ञानों के समान? न केवल इसे ग्रहण और धारण ही ऋ़रना है? वरन् यह आत्मज्ञान होने पर उसे अपने जीवन में दृढ़ता से जीना भी होता है। इसलिए श्रवण की इच्छा को एक श्रेष्ठ और आदर्श गुण माना गया है? जो वेदान्त के उत्तम अधिकारी के लिए अनिवार्य है। इस गुण के होने से ज्ञानमार्ग में प्रगति तीव्र गति से होती है।पाण्डुपुत्र अर्जुन इस श्रेष्ठ गुण से सम्पन्न था जो कि उसके इस कथन से स्पष्ट होता है कि आपके अमृतमय वचनों को सुनकर मेरी तृप्ति नहीं होती है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि वेदान्त का शुद्धिकारी प्रभाव रुचिपूर्वक श्रवण करने वाले सभी बुद्धिमान विद्यार्थियों पर पड़ता है। एक सच्चे ज्ञानी गुरु के मुख से आत्मतत्त्व का उपदेश सुनकर प्रारम्भ में शिष्य को होने वाला आनन्द क्षणिक उल्लास ही देता है? जो स्थिर नहीं रह पाता। जब वह शिष्य प्रवचन के बाद अकेला रह जाता है? तब उसका मन पुन अनेक कारणों से अशान्त हो सकता है। और फिर भी? कितना ही क्षणिक आनन्द क्यों न हो? उसमें अर्जुन के समान नवदीक्षित विद्यार्थियों को आकर्षित करने की सार्मथ्य होती है? जिसके कारण उनकी उस विषय के प्रति रुचि एक व्यसन के समान बढ़ती ही जाती है। वेदान्त प्रवचनों के श्रवणार्थ इस अधिकाधिक अभिरुचि को यहाँ स्पष्ट दर्शाया गया है। यद्यपि यह साधना है? साध्य नहीं? तथापि? निसन्देह यह एक शुभ प्रारम्भ है। जिन लोगों को तत्त्वज्ञान के बौद्धिक अध्ययन से ही सन्तोष का अनुभव होता हो? वे भी निश्चय ही उन सहस्रों लोगों से श्रेष्ठतर हैं? जो दिव्य आत्मस्वरूप को दर्शाने वाले एक भी आध्यात्मिक प्रवचन को नहीं सुन सकते? या सह नहीं सकतेएक अथक धर्म प्रचारक के रूप में भगवान् श्रीकृष्ण अत्यन्त धैर्य के साथ? अर्जुन से कहते हैं
English Translation By Swami Sivananda
Tell me again in detail, O Krishna, of Thy Yogic power and glory; for I am not satiated with what I have heard of Thy life-giving and nectar-like speech.
Transliteration
vistareṇātmano yogaṃ vibhūtiṃ ca janārdana
bhūyaḥ kathaya tṛptirhi śṛṇvato nāsti me'mṛtamअनुवाद
हे जनार्दन! आप अपनी योगशक्ति को और ऐश्वर्य को फिर से विस्तारपूर्वक कहिए, क्योंकि आपके अमृतमयी वचनों को सुनते हुए मेरी तृप्ति नहीं हो रही है
भावार्थ
इस श्लोक में अर्जुन भगवान कृष्ण से उनकी दिव्य विभूतियों और योगशक्ति का पुनः विस्तार से वर्णन करने की प्रार्थना कर रहे हैं। अर्जुन कहते हैं कि भगवान के अमृत के समान वचनों को सुनते हुए उनका मन कभी तृप्त नहीं होता और वे और अधिक सुनना चाहते हैं। यह भक्त की भगवान की महिमा सुनने की असीम पिपासा को दर्शाता है।
Translation
O Janardana, please describe again in detail Your mystic power and opulences, for I am not satiated by hearing Your nectar-like words
Meaning
In this verse, Arjuna requests Lord Krishna to describe His divine opulences and mystic powers once again in detail. Arjuna expresses that he is never satiated by hearing the nectar-like words of the Lord. This highlights a devotee’s endless desire to hear and contemplate the glories of the Supreme.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| विस्तरेण | विस्तारपूर्वक |
| आत्मनः | अपनी |
| योगम् | योगशक्ति को |
| विभूतिम् | ऐश्वर्य को |
| च | और |
| जनार्दन | हे जनार्दन (कृष्ण) |
| भूयः | पुनः / फिर से |
| कथय | कहिए |
| तृप्तिः | तृप्ति / संतोष |
| ही | क्योंकि |
| शृण्वतः | सुनते हुए |
| न | नहीं |
| अस्ति | है |
| मे | मेरी |
| अमृतम् | अमृतमयी वचनों से |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| vistareṇa | in detail |
| ātmanaḥ | Your own |
| yogam | mystic power |
| vibhūtim | opulence |
| ca | and |
| janārdana | O Janardana (Krishna) |
| bhūyaḥ | again |
| kathaya | describe |
| tṛptiḥ | satiation |
| hi | for / indeed |
| śṛṇvataḥ | hearing |
| na | not |
| asti | there is |
| me | my |
| amṛtam | nectar-like words |