Chapter 10 · विभूतियोग
Bhagavad Gita 10.10
मूल श्लोक :
तेषां सततयुक्तानां भजतां प्रीतिपूर्वकम्
ददामि बुद्धियोगं तं येन मामुपयान्ति तेHindi Translation By Swami Ramsukhdas
उन नित्यनिरन्तर मेरेमें लगे हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करनेवाले भक्तोंको मैं वह बुद्धियोग देता हूँ? जिससे उनको मेरी प्राप्ति हो जाती है।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
जब तक सबसे श्रेष्ठ आनन्ददायक वस्तु या लक्ष्य को नहीं पाया गया है जिसमें हमारा मन पूर्णतया रम सके? तब तक बाह्य विषयों? भावनाओं तथा विचारों के जगत् के साथ हुए तादात्म्य से हमारी सफलतापूर्वक निवृत्ति नहीं हो सकती। आनन्दस्वरूप आत्मा में ध्यानाकर्षण करने की ऐसी सार्मथ्य है और इसलिए? जिस मात्रा या सीमा तक इस आत्मस्वरूप में मन स्थित होता है? उसी मात्रा में वह दुखदायी मिथ्या बंधनों की पकड़ से मुक्त हो जाता है। इस वेदान्तिक सत्य का भगवान् श्रीकृष्ण इस वाक्य में वर्णन करते हैं? जो मेरा भक्तिपूर्वक भजन करते हैं।प्रिय के साथ तादात्म्य का ही अर्थ है प्रेम। आत्मा के साथ हुए तादात्म्य के अनुपात में ही जीव भक्त कहलाता है और जब वह सततयुक्त हो जाता है? तभी वह वास्तविक रूप में हृदयस्थित अपनी अव्यक्त दिव्यता को अभिव्यक्त कर पाता है।ऐसे भक्त जो निरन्तर भक्ति? सन्तोष और आनन्द के वातावरण में सतत आत्मा का चिन्तन करते हैं उन भक्तों को स्वयं भगवान् ही वह बुद्धियोग देते हैं? जिसके द्वारा वे भगवान् को ही प्राप्त होते हैं।बुद्धियोग का पहले भी वर्णन किया जा चुका है। आत्मा के अनन्त स्वरूप पर निदिध्यासन से सम्यक् ज्ञान प्राप्त करना ही बुद्धियोग है। प्रस्तुत संदर्भ में उसकी व्याख्या इस प्रकार की जा सकती है कि उपर्युक्त पद्धति से साधनाभ्यास करने वाले साधक को सत्य का बौद्धिक ग्रहण होता है। निसंदेह हमारा वह अभिप्राय कदापि नहीं है कि परिच्छिन्न बुद्धि के द्वारा कभी अनन्त वस्तु का ग्रहण किया जा सकता है। हम केवल लौकिक जगत् के एक सुपरिचित वाक्प्रचार का उपयोग ही कर रहे हैं। जब तक बुद्धि से ग्रहण किया गया एक अनुभव किसी अन्य अनुभव से बाधित नहीं होता? तब तक उस पूर्व अनुभव को प्रामाणिक और संदेह रहित माना जाता है। आत्मा का अनुभव्ा कदापि बाधित नहीं हो सकता? क्योंकि वह अनुभवकर्ता का ही स्वरूप है। ऐसा दृढ़ ज्ञान केवल उन साधकों को ही प्राप्त होता है जिनमें आत्मानुसंधान करने की परिपक्वता एवं स्थिरता आ जाती है।इस प्रकार? उक्त ध्यानाभ्यास के द्वारा सत्य पर पड़े आवरण और तज्जनित विक्षेपों की सर्वथा निवृत्ति हो जाती है? तब वह साधक समाधि का साक्षात् अनुभव करता है? जो बुद्धियोग की परिसमाप्ति और पूर्णता है।इस बुद्धियोग के द्वारा भगवान् अपने भक्तों के लिए निश्चित रूप से क्या करते हैं? इसका वर्णन अगले श्लोक में है --
English Translation By Swami Sivananda
To them who are ever steadfast, worshipping Me with love, I give the Yoga of discrimination by which they come to Me.
Transliteration
teṣāṃ satatayuktānāṃ bhajatāṃ prītipūrvakam
dadāmi buddhiyogaṃ taṃ yena māmupayānti teअनुवाद
उन निरंतर मुझसे जुड़े हुए और प्रेमपूर्वक मेरा भजन करने वाले भक्तों को मैं वह बुद्धियोग प्रदान करता हूँ जिसके द्वारा वे मुझको ही प्राप्त होते हैं
भावार्थ
इस श्लोक में भगवान कृष्ण बताते हैं कि जो भक्त निरंतर उनके ध्यान में मग्न रहते हैं और प्रेमपूर्वक उनकी सेवा करते हैं, उन्हें वे स्वयं दिव्य बुद्धि प्रदान करते हैं। यह बुद्धियोग कोई सांसारिक ज्ञान नहीं है, बल्कि वह आध्यात्मिक विवेक है जो साधक को परमात्मा से जोड़ता है। इसी आंतरिक प्रेरणा और ज्ञान के प्रकाश से भक्त अंततः भगवान को प्राप्त कर लेता है।
Translation
To those who are constantly united with Me and worship Me with love I give that yoga of understanding by which they come to Me
Meaning
In this verse, Lord Krishna explains that to those devotees who are constantly absorbed in Him and worship Him with pure love, He personally bestows the yoga of discrimination (buddhi-yoga). This divine intellect is not mere worldly knowledge, but the spiritual wisdom that guides them from within. Through this grace, they are able to overcome all obstacles and ultimately attain union with the Supreme.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| तेषाम् | उनका (उन लोगों को) |
| सतत-युक्तानाम् | जो निरंतर मुझसे जुड़े हुए हैं |
| भजताम् | भजन करने वालों को |
| प्रीति-पूर्वकम् | प्रेमपूर्वक |
| ददामि | मैं देता हूँ |
| बुद्धि-योगम् | बुद्धि का योग (विवेक) |
| तम् | वह |
| येन | जिसके द्वारा |
| माम् | मुझको |
| उपयान्ति | प्राप्त करते हैं |
| ते | वे |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| teṣām | of them |
| satata-yuktānām | who are constantly united/devoted |
| bhajatām | of those who worship |
| prīti-pūrvakam | with love / lovingly |
| dadāmi | I give |
| buddhi-yogam | the yoga of understanding / intellect |
| tam | that |
| yena | by which |
| mām | to Me |
| upayānti | they come / attain |
| te | they |