Chapter 1 · अर्जुनविषादयोग
Bhagavad Gita 1.42
मूल श्लोक :
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
वर्णसंकर कुलघातियोंको और कुलको नरकमें ले जानेवाला ही होता है। श्राद्ध और तर्पण न मिलनेसे इन(कुलघातियों) के पितर भी अपने स्थानसे गिर जाते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अब अर्जुन वर्णसंकर के दुष्परिणामों को बताता है। जातियों के वर्णसंकर होने से अन्तर्बाह्य जीवन में नैतिक मूल्यों का ह्रास होता है और फलत परिवारिक व धार्मिक परम्परायें नष्ट हो जाती हैं।हिन्दू धर्म के अनुसार मृत पितरों को पिण्ड और जल अर्पित किया जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि पितर यह देखना चाहते हैं कि उनके द्वारा अत्यन्त परिश्रम से विकसित की गई और अपने पुत्रों आदि को सौपी गई सांस्कृतिक शुद्धता को वे किस सीमा तक बनाये रखते हैं और उसकी सुरक्षा किस प्रकार करते हैं। हमारे पूर्वजों द्वारा अथक परिश्रम से निर्मित उच्च संस्कृति को यदि हम नष्ट कर देते हैं तो वास्तव में हम उनका घोर अपमान करते हैं। यह कितनी आकर्षक और काव्यात्मक कल्पना है कि पितरगण अपने स्वर्ग के वातायन से देखते हैं कि उनके पुत्रादि अपनी संस्कृति की रक्षा करते हुये किस प्रकार का जीवन जीते हैं यदि वे यह देखेंगे क उनके द्वारा अत्यन्त श्रम से लगाये हुये उद्यानों को उनके स्वजनों ने उजाड़कर जंगल बना दिया है तो निश्चय ही उन्हें भूखप्यास के कष्ट के समान पीड़ा होगी। इस दृष्टि से अध्ययन करने पर यह श्लोक अत्यन्त उपयुक्त प्रतीत होता है। प्रत्येक पीढ़ी अपनी संस्कृति की आलोकित ज्योति भावी पीढ़ी के हाथों में सौंप देती है। नई पीढ़ी का यह कर्तव्य है कि वह इसे सावधानीपूर्वक आलोकित अवस्था में ही अपने आगे आने वाली पीढ़ी को भी सौंपे। संस्कृति की रक्षा एवं विकास करना हमारा पुनीत कर्तव्य है।ऋषि मुनियों द्वारा निर्मित भारतीय संस्कृति आध्यात्मिक है जिसकी सुरक्षा धार्मिक विधियों पर आश्रित होती है। इसलिये हिन्दुओं के लिए संस्कृति और धर्म एक ही वस्तु है। हमारे प्राचीन साहित्य में संस्कृति शब्द का स्वतन्त्र उल्लेख कम ही मिलता है। उसमें अधिकतर धार्मिक विधियों के अनुष्ठान पर ही बल दिया गया है।वास्तव में हिन्दू धर्म सामाजिक जीवन में आध्यात्मिक संस्कृति संरक्षण की एक विशेष विधि है। धर्म का अर्थ है उन दिव्य गुणों को अपने जीवन में अपनाना जिनके द्वारा हमारा शुद्ध आत्मस्वरूप स्पष्ट प्रकट हो। अत कुलधर्म का अर्थ परिवार के सदस्यों द्वारा मिलजुलकर अनुशासन और ज्ञान के साथ रहने के नियमों से है। परिवार में नियमपूर्वक रहने से देश के एक योग्य नागरिक के रूप में भी हम आर्य संस्कृति को जी सकते हैं।
English Translation By Swami Sivananda
Confusion of castes leads to hell the slayers of the family,
for their forefathers fall, deprived of the offerings of rice-ball and
water (libations).
Transliteration
saṅkaro narakāyaiva kulaghnānāṃ kulasya ca
patanti pitaro hyeṣāṃ luptapiṇḍodakakriyāḥअनुवाद
यह वर्णसंकर कुलघातियों को और कुल को नरक में ले जाने के लिए ही होता है। श्राद्ध और तर्पण (पिण्ड और जल दान) की क्रियाओं के लुप्त हो जाने से इन (कुलघातियों) के पितर भी (नरक में) गिर जाते हैं।
भावार्थ
अर्जुन श्रीकृष्ण को युद्ध के भयंकर परिणामों के बारे में बता रहे हैं। वे कहते हैं कि जब कुल का नाश होता है, तो वर्णसंकर संतानें उत्पन्न होती हैं, जो पूरे परिवार और उसे नष्ट करने वालों को नरक की ओर ले जाती हैं। इसके परिणामस्वरूप, पूर्वजों को दिए जाने वाले पिण्ड और जल दान की परंपराएं समाप्त हो जाती हैं, जिससे पितरों का भी पतन हो जाता है।
Translation
This unwanted progeny leads both the family and the destroyers of the family to hell. Deprived of the offerings of food and water, the ancestors of these destroyers also fall.
Meaning
Arjuna continues to explain the disastrous consequences of war to Lord Krishna. He argues that the destruction of the family leads to unwanted progeny, which drags both the family and its destroyers into hell. Consequently, the traditional offerings of food and water to the ancestors cease, causing the ancestors themselves to fall from their heavenly abodes.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| सङ्करः | वर्णसंकर |
| नरकाय | नरक के लिए |
| एव | ही |
| कुलघ्नानाम् | कुल का नाश करने वालों के |
| कुलस्य | कुल के |
| च | और |
| पतन्ति | गिर जाते हैं |
| पितरः | पूर्वज |
| हि | निश्चय ही |
| एषाम् | इनके |
| लुप्त | लुप्त हो जाने से |
| पिण्ड | पिण्ड |
| उदक | और जल की |
| क्रियाः | क्रियाएं |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| saṅkaraḥ | unwanted progeny |
| narakāya | for hell |
| eva | certainly |
| kulaghnānām | of the destroyers of the family |
| kulasya | of the family |
| ca | and |
| patanti | fall |
| pitaraḥ | ancestors |
| hi | certainly |
| eṣām | of them |
| lupta | deprived of |
| piṇḍa | offerings of food |
| udaka | water |
| kriyāḥ | performances |