Chapter 1 · अर्जुनविषादयोग
Bhagavad Gita 1.41
मूल श्लोक :
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसङ्करःHindi Translation By Swami Ramsukhdas
हे कृष्ण अधर्मके अधिक बढ़ जानेसे कुलकी स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं और हे वार्ष्णेय स्त्रियोंके दूषित होनेपर वर्णसंकर पैदा हो जाते हैं।
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
अर्जुन अपने पूर्वकथित तर्क को आगे बढ़ाते हुए कहता है कि अधर्म के बढ़ने पर समाज में धीरधीरे नैतिकता का पतन हो जायेगा और वर्णसंकर जातियाँ उत्पन्न होंगी।वर्ण एक ऐसा शब्द है जिसका अर्थ विकृत हो जाने से वह आज के शिक्षित लोगों की तीखी आलोचना का विषय बन गया है। उनकी आलोचना उचित है यदि उसका विकृत अर्थ स्वीकृत हो। परन्तु आज वर्ण के नाम पर देश में जो कुछ होते हुये हम देख रहे हैं वह हिन्दू जीवन पद्धति का पतित रूप है। प्राचीन काल में वर्ण विभाग का आधार समाज के व्यक्तियों की मानसिक व बौद्धिक क्षमता और पक्वता होती थी।बुद्धिमान तथा अध्ययन अध्यापन एवं अनुसंधान में रुचि रखने वाले लोग ब्राह्मण कहलाते थे क्षत्रिय वे थे जिनमें राजनीति द्वारा राष्ट्र का नेतृत्व करने की सार्मथ्य थी और जो अपने ऊपर इस कार्य का उत्तरदायित्व लेते थे कि राष्ट्र को आन्तरिक और बाह्य आक्रमणों से बचाकर राष्ट्र में शांति और समृद्धि लायें। कृषि और वाणिज्य के द्वारा समाज सेवा करने वालों को वैश्य कहते थे। वे लोग जो उपयुक्त कर्मों में से कोई भी कर्म नहीं कर सकते थे शूद्र कहे जाते थे। उनका कर्तव्य सेवा और श्रम करना था। हमारे आज के समाजसेवक और अधिकारी वर्ग कृषक और औद्योगिक कार्यकर्त्ता आदि सभी उपर्युक्त वर्ण व्यवस्था में आ जाते हैं।वर्णव्यवस्था को जब हम उसके व्यापक अर्थ में समझते हैं तब हमें आज भी वह अनेक संगठनों के रूप में दिखाई देती है। अत वर्णसंकर के विरोध का अर्थ इतना ही है कि एक विद्युत अभियन्ता शल्यकक्ष में चिकित्सक का काम करता हुआ समाज को खतरा सिद्ध होगा तो किसी चिकित्सक को जल विद्युत योजना का प्रशासनिक एवं योजना अधिकारी नियुक्त करने पर समाज की हानि होगीसमाज में नैतिक पतन होने पर अनियन्त्रित वासनाओं में डूबे युवक और युवतियाँ स्वच्छन्दता से परस्पर मिलते हैं। कामना के वश में वे सामाजिक और सांस्कृतिक विकास का किंचित भी विचार नहीं करते। इसलिये अर्जुन को भय है कि वर्णसंकर के कारण समाज और संस्कृति का पतन होगा।
English Translation By Swami Sivananda
By the prevalence of impiety, O Krishna, the women of
the family become corrupt; and , women being corrupted, O Varshenya (descendant
of Vrishni), there arises intermingling of castes.
Transliteration
adharmābhibhavāt kṛṣṇa praduṣyanti kulastriyaḥ
strīṣu duṣṭāsu vārṣṇeya jāyate varṇasaṅkaraḥअनुवाद
हे कृष्ण! अधर्म के हावी होने से कुल की स्त्रियाँ दूषित हो जाती हैं। हे वार्ष्णेय (वृष्णिवंशी)! स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है।
भावार्थ
अर्जुन यह भय व्यक्त करते हैं कि कुल के नाश से अधर्म बढ़ेगा, जिससे परिवार की स्त्रियाँ पथभ्रष्ट हो जाएँगी। स्त्रियों के दूषित होने से अवांछित संतानें (वर्णसंकर) उत्पन्न होंगी, जो समाज के पतन का कारण बनेंगी। यह श्लोक सामाजिक व्यवस्था और पारिवारिक परंपराओं के प्रति अर्जुन की गहरी चिंता को दर्शाता है।
Translation
O Krishna, due to the predominance of irreligion, the women of the family become corrupt. O descendant of Vrishni, when women are corrupted, intermingling of castes is born.
Meaning
Arjuna expresses his fear that the destruction of the family will lead to a rise in irreligion, which in turn will corrupt the women of the family. When the women are corrupted, it leads to unwanted progeny and the mixing of castes (varna-sankara), destroying the social and spiritual fabric of society. This highlights Arjuna’s deep concern for social order and family traditions.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| अधर्म | अधर्म के |
| अभिभवात् | हावी होने से |
| कृष्ण | हे कृष्ण |
| प्रदुष्यन्ति | दूषित हो जाती हैं |
| कुल | कुल की |
| स्त्रियः | स्त्रियाँ |
| स्त्रीषु | स्त्रियों के |
| दुष्टासु | दूषित हो जाने पर |
| वार्ष्णेय | हे वृष्णिवंशी |
| जायते | उत्पन्न होता है |
| वर्ण | वर्णों का |
| सङ्करः | अवांछित मिश्रण (संकर) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| adharma | of irreligion |
| abhibhavāt | due to the predominance |
| kṛṣṇa | O Krishna |
| praduṣyanti | become corrupt |
| kula | of the family |
| striyaḥ | women |
| strīṣu | when women |
| duṣṭāsu | become corrupted |
| vārṣṇeya | O descendant of Vrishni |
| jāyate | is born |
| varṇa | of castes |
| saṅkaraḥ | unwanted mixing |