Chapter 1 · अर्जुनविषादयोग
Bhagavad Gita 1.39
मूल श्लोक :
कथं न ज्ञेयमस्माभिः पापादस्मान्निवर्तितुम्
कुलक्षयकृतं दोषं प्रपश्यद्भिर्जनार्दनHindi Translation By Swami Ramsukhdas
यद्यपि लोभके कारण जिनका विवेकविचार लुप्त हो गया है? ऐसे ये दुर्योधन आदि कुलका नाश करनेसे होनेवाले दोषको और मित्रोंके साथ द्वेष करनेसे होनेवाले पापको नहीं देखते? तो भी हे जनार्दन कुलका नाश करनेसे होनेवाले दोषको ठीकठीक जाननेवाले हमलोग इस पापसे निवृत्त होनेका विचार क्यों न करें
Hindi Commentary By Swami Chinmayananda
निसंदेह सत्ता और धन के लालच से अन्धे हुए कौरव यह देखने में असमर्थ थे कि इस युद्ध के कारण सम्पूर्ण सामाजिक ढाँचे का कितना विनाश होने वाला है। उनकी महत्त्वाकांक्षा ने उनके विवेक और भावना को इस प्रकार आच्छादित कर दिया था कि युद्ध में अपने ही बान्धवों की हत्याओं की क्रूरता को भी वे नहीं समझ पा रहे थे।अर्जुन के कथन से लगता है कि उसने अपना विवेक खोया नहीं था और इस भ्रातृहन्ता युद्ध के द्वारा होने वाले भावी सामाजिक विनाश को वह स्पष्ट देख रहा था। उसका प्रस्तुत तर्क कुछ इस प्रकार का है। यदि हमारा कोई मित्र मद्यपान के कारण स्वयं को भूलकर अभद्र व्यवहार करता है तो उस समय उसका प्रतिकार करना और भी अधिक विचित्र बात होगी। हमको समझना चाहिये कि उस मित्र ने अपना विवेक खो दिया है और वह स्वयं ही नहीं जानता कि वह क्या कर रहा है। ऐसे समय हमारे लिये उचित है कि उसकी अशिष्टता पर ध्यान न देकर उसे क्षमा कर दें।इसी प्रकार अर्जुन का तर्क है कि यदि दुर्योधन और उसके मित्र अन्धे होकर अन्यायपूर्ण आक्रमण करते हैं तो क्या पाण्डवों को शान्ति की वेदी पर स्वयं का बलिदान करते हुये युद्ध से विरत हो जाना उचित नहीं है यह धारणा स्वयं में कितनी खतरनाक है इसको हम तब समझेंगे जब गीता के आगामी परिच्छेदों में तत्त्वज्ञान के महत्त्वपूर्ण अंश को देखेंगे जो भारतीय जीवन का सारतत्त्व है। अधर्म का सक्रिय प्रतिकार ही एक मुख्य सिद्धांत है जिसका भगवान् श्रीकृष्ण ने गीता में प्रतिपादन किया है।
English Translation By Swami Sivananda
Why should not we who clearly see evil in the destruction
of families, learn to turn away from this sin, O Janardana (Krishna)?
Transliteration
kathaṃ na jñeyamasmābhiḥ pāpādasmānnivartitum
kulakṣayakṛtaṃ doṣaṃ prapaśyadbhirjanārdanaअनुवाद
हे जनार्दन! कुल के नाश से होने वाले दोष को स्पष्ट देखने वाले हम लोगों को इस पाप से निवृत्त होने का विचार क्यों नहीं करना चाहिए?
भावार्थ
अर्जुन भगवान कृष्ण से तर्क करते हैं कि यद्यपि कौरव लोभ के कारण अंधे हो गए हैं, लेकिन पांडव ऐसा नहीं कर सकते। वे स्पष्ट रूप से देख सकते हैं कि परिवार और वंश का नाश करना एक महान पाप है। इसलिए, ज्ञान और विवेक होने के कारण, उन्हें इस विनाशकारी युद्ध से पीछे हटने के बारे में सोचना चाहिए।
Translation
O Janardana, why should we, who clearly see the evil caused by the destruction of the family, not know to turn away from this sin?
Meaning
Arjuna argues with Lord Krishna that even if the Kauravas are blinded by greed, the Pandavas cannot act in the same way. They can clearly see that destroying one’s family and lineage is a great sin. Therefore, possessing this knowledge and wisdom, they must consider turning away from this destructive war.
शब्दार्थ
| शब्द | अर्थ |
|---|---|
| कथम् | कैसे |
| न | नहीं |
| ज्ञेयम् | जानना चाहिए |
| अस्माभिः | हमारे द्वारा |
| पापात् | पाप से |
| अस्मात् | इस |
| निवर्तितुम् | निवृत्त होने के लिए |
| कुलक्षयकृतम् | कुल के नाश से होने वाले |
| दोषम् | दोष को |
| प्रपश्यद्भिः | स्पष्ट देखने वालों के द्वारा |
| जनार्दन | हे जनार्दन (कृष्ण) |
Word by word
| Word | Meaning |
|---|---|
| katham | why |
| na | not |
| jñeyam | should be known |
| asmābhiḥ | by us |
| pāpāt | from sin |
| asmāt | this |
| nivartitum | to turn away |
| kulakṣayakṛtam | caused by the destruction of the family |
| doṣam | the evil |
| prapaśyadbhiḥ | by those who see clearly |
| janārdana | O Janardana (Krishna) |